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मनोरोगियों के आजाद होने की फिर दिखी उम्मीद
ब्यूरो, अमर उजाला बरेली
Updated Tue, 19 Jul 2016 01:35 AM IST
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ऐसे मनोरोगी जो अब केवल नाम के मनोरोगी हैं। ये ठीक हैं और घर जाने का सपना देख रहे हैं। वकील गौरव बंसल की याचिका और सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही से इनको आजाद होने की उम्मीद फिर दिखी है। बरेली के मानसिक अस्पताल में 200 रोगियों का इलाज चल रहा है। इसमें 60 पूरी तरह स्वस्थ हैं। इनमें 50 महिलाएं हैं और 10 पुरुष है। ये अस्पताल में कुछ न कुछ काम करते रहते हैं।
सुरेंद्र मौर्य (काल्पनिक नाम) कानपुर से हैं। उनको अपनी सारी बातें याद है। साढ़े तीन साल पहले बहन और पिता उनको यहां छोड़कर गए थे। उसके बाद कोई लेने नहीं आया। अब फोन पर बात होती है, कहते हैं कि लेने आएंगे। लेकिन कोई नहीं आता। सुरेंद्र मौर्य दिल्ली में रेस्टोरेंट सेल्फ एक्सीक्यूटिव के पद पर कार्यरत थे। बताते हैं कि पारिवारिक झगड़ा हुआ तो उन्हाेंने अपने हाथ की नस काट ली थी। इसके बाद वह दो माह तक दिमागी रूप से बीमार रहे। घर से बाहर घूमते थे और यहां- वहां आते जाते थे। झगड़ा होता था तो बहन और पिता ने अस्पताल छोड़ दिया। कहते हैं कि अब घर की याद आती है। आकाश शर्मा हल्द्वानी से हैं और पिछले 20 साल से यहां हैं। मिर्जापुर के वाटर ट्रीटमेंट प्लांट में आपरेटर थे और घर के इकलौते। नौकरी के दौरान दिक्कतें हुई तो घर चले गए। वहां पिता ने शादी करा दी। शादी के तीन माह तक बीवी के साथ रहे फिर झगड़ा शुरू हो गया। पिता ने अस्पताल में भर्ती करा दिया। इस दौरान पिता और मां का निधन हो गया। बीवी 20 साल में सिर्फ 3 बार मिलने आई। घर बेच दिया और अब कहां है पता नहीं। इसलिए कोई लेने नहीं आता। डॉक्टराें ने ऐसे 10 पुरुष मरीजाें को सही बताया है।
महिलाएं करती हैं सिलाई कढ़ाई
महिला वार्ड में 70 से अधिक मरीज हैं। इनमें 60 मरीज ठीक हैं। महिला वार्ड में किसी पुरुष को जाने की अनुमति नहीं है। इसलिएं इनसे बात नहीं हो सकी। यहां ठीक महिलाएं सिलाई कढ़ाई करती हैं। टेलर मास्टर महिला हैं जो उन्हें सिखाती हैं। स्वेटर भी यह महिलाएं बुनना जानती हैं। सब्जी काटने का काम भी इन्हें दिया जाता है।
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जो मरीज ठीक हो चुके हैं उनके पुनर्वास के लिए उन्हें खेती व अन्य कार्य सिखाया जाता है। यहां 60 से अधिक मरीज ठीक हो चुके हैं। किसी के पते गलत हैं तो कोई घर से वापस आ जाता है। डीएम के मार्फत शासन को पत्र भी लिखा है।
डॉ. पीके मांगलिक, निदेशक, मानसिक अस्पताल
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सुरेंद्र मौर्य (काल्पनिक नाम) कानपुर से हैं। उनको अपनी सारी बातें याद है। साढ़े तीन साल पहले बहन और पिता उनको यहां छोड़कर गए थे। उसके बाद कोई लेने नहीं आया। अब फोन पर बात होती है, कहते हैं कि लेने आएंगे। लेकिन कोई नहीं आता। सुरेंद्र मौर्य दिल्ली में रेस्टोरेंट सेल्फ एक्सीक्यूटिव के पद पर कार्यरत थे। बताते हैं कि पारिवारिक झगड़ा हुआ तो उन्हाेंने अपने हाथ की नस काट ली थी। इसके बाद वह दो माह तक दिमागी रूप से बीमार रहे। घर से बाहर घूमते थे और यहां- वहां आते जाते थे। झगड़ा होता था तो बहन और पिता ने अस्पताल छोड़ दिया। कहते हैं कि अब घर की याद आती है। आकाश शर्मा हल्द्वानी से हैं और पिछले 20 साल से यहां हैं। मिर्जापुर के वाटर ट्रीटमेंट प्लांट में आपरेटर थे और घर के इकलौते। नौकरी के दौरान दिक्कतें हुई तो घर चले गए। वहां पिता ने शादी करा दी। शादी के तीन माह तक बीवी के साथ रहे फिर झगड़ा शुरू हो गया। पिता ने अस्पताल में भर्ती करा दिया। इस दौरान पिता और मां का निधन हो गया। बीवी 20 साल में सिर्फ 3 बार मिलने आई। घर बेच दिया और अब कहां है पता नहीं। इसलिए कोई लेने नहीं आता। डॉक्टराें ने ऐसे 10 पुरुष मरीजाें को सही बताया है।
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महिलाएं करती हैं सिलाई कढ़ाई
महिला वार्ड में 70 से अधिक मरीज हैं। इनमें 60 मरीज ठीक हैं। महिला वार्ड में किसी पुरुष को जाने की अनुमति नहीं है। इसलिएं इनसे बात नहीं हो सकी। यहां ठीक महिलाएं सिलाई कढ़ाई करती हैं। टेलर मास्टर महिला हैं जो उन्हें सिखाती हैं। स्वेटर भी यह महिलाएं बुनना जानती हैं। सब्जी काटने का काम भी इन्हें दिया जाता है।
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जो मरीज ठीक हो चुके हैं उनके पुनर्वास के लिए उन्हें खेती व अन्य कार्य सिखाया जाता है। यहां 60 से अधिक मरीज ठीक हो चुके हैं। किसी के पते गलत हैं तो कोई घर से वापस आ जाता है। डीएम के मार्फत शासन को पत्र भी लिखा है।
डॉ. पीके मांगलिक, निदेशक, मानसिक अस्पताल