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अमेरिका और ईरान की जंग मजहबी नही सियासी : बरेलवी उलमा
Sat, 08 Aug 2026 01:14 AM IST
बरेली ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, बरेली
संवाद न्यूज एजेंसी, बरेली
Updated Sat, 08 Aug 2026 01:14 AM IST
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बरेली। अमेरिका और ईरान की जंग सियासी है। इसे मजहबी जंग नहीं कहा जा सकता। अगर ईरान को मजहब-ए-इस्लाम की इतनी ही फिक्र होती तो पहले मस्जिद-ए-अक्सा, फलस्तीन और अफगानिस्तान के लिए लड़ता। ये बातें उर्स-ए-रजवी के दूसरे दिन शुक्रवार को इस्लामिया मैदान पर आयोजित तहफ्फुज मजहब ओ मसलक कॉन्फ्रेंस को खिताब करते हुए मुफ्ती सलीम नूरी बरेलवी ने कहीं।
उन्होंने कहा कि मुल्क और खुद की मजबूती के लिए हमें उच्च शिक्षा हासिल करनी होगी। मुसलमानों को अपने क्षेत्र में अच्छे स्कूलों की स्थापना करनी होगी। हमारे मदरसों को आंतकवाद का अड्डा कहकर बदनाम किया जा रहा है, जबकि मदरसों में हमेशा देश प्रेम का पाठ पढ़ाया गया है। देश के राष्ट्रपति रहे डाॅ. राजेंद्र प्रसाद, एपीजे अब्दुल कलाम आदि ने भी मदरसों से ही शिक्षा हासिल की थी। मुसलमान ऐसे धरना-प्रदर्शन से दूर रहें, जिसका कोई अगुवा न हो। हमारे कई नौजवान बेगुनाह होने के बावजूद वर्षों से जेलों में बंद है।
स्मार्टफोन नहीं, बेटियों के हाथ में दें कानून-ए-शरीयत जैसी किताबें
कारी यूसुफ रजा संभली ने कहा कि मुसलमान शरई दायरे में रहकर अपनी बेटियों को अच्छी तालीम और तरबियत दें। उनके हाथों में मोबाइल फोन की जगह कानून-ए-शरीयत जैसी किताबें दें, ताकि वे समझ सकें कि भलाई किसमें है? यह काॅन्फ्रेंस दरगाह प्रमुख मौलाना सुब्हान रजा खान की सरपरस्ती, सज्जादानशीन मुफ्ती अहसन मियां की सदारत व सैयद आसिफ मियां की देखरेख में हुई।
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उन्होंने कहा कि मुल्क और खुद की मजबूती के लिए हमें उच्च शिक्षा हासिल करनी होगी। मुसलमानों को अपने क्षेत्र में अच्छे स्कूलों की स्थापना करनी होगी। हमारे मदरसों को आंतकवाद का अड्डा कहकर बदनाम किया जा रहा है, जबकि मदरसों में हमेशा देश प्रेम का पाठ पढ़ाया गया है। देश के राष्ट्रपति रहे डाॅ. राजेंद्र प्रसाद, एपीजे अब्दुल कलाम आदि ने भी मदरसों से ही शिक्षा हासिल की थी। मुसलमान ऐसे धरना-प्रदर्शन से दूर रहें, जिसका कोई अगुवा न हो। हमारे कई नौजवान बेगुनाह होने के बावजूद वर्षों से जेलों में बंद है।
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स्मार्टफोन नहीं, बेटियों के हाथ में दें कानून-ए-शरीयत जैसी किताबें
कारी यूसुफ रजा संभली ने कहा कि मुसलमान शरई दायरे में रहकर अपनी बेटियों को अच्छी तालीम और तरबियत दें। उनके हाथों में मोबाइल फोन की जगह कानून-ए-शरीयत जैसी किताबें दें, ताकि वे समझ सकें कि भलाई किसमें है? यह काॅन्फ्रेंस दरगाह प्रमुख मौलाना सुब्हान रजा खान की सरपरस्ती, सज्जादानशीन मुफ्ती अहसन मियां की सदारत व सैयद आसिफ मियां की देखरेख में हुई।
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