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बच्चों का खेल छुड़ा रहा है बड़ों के पसीने
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बरेली। कोरोना के दौर में दो साल तक मोबाइल फोन पर पढ़ाई ने बच्चों को ऑनलाइन गेम की ऐसी लत लगा दी कि अब उसे छुड़ाने में उनके अभिभावकों के पसीने छूट रहे हैं। मां-बाप की टोकाटाकी और डांट से बचने के लिए तमाम बच्चों ने मोबाइल गेम एप्लीकेशन को चोरी-छिपे मोबाइल में इंस्टाल करने और खेल पूरा होते ही उसे अनइंस्टाल करने का रास्ता ढूंढ लिया है। अभिभावक अब बच्चों की आदत छुड़ाने के लिए मनोचिकित्सकों के चक्कर काट रहे हैं।
मनोचिकित्सकों के मुताबिक पिछले दो सालों में बच्चों के तनाव, परीक्षा के डर, चिड़चिड़ेपन और बेवजह झगड़ा करने के काफी केस आए हैं लेकिन पिछले कुछ समय से बच्चों के ऑनलाइन गेम पीछे दीवानगी की हद तक जाने के मामले पढ़े हैं। कई केस अभिभावकों की सख्ती के बावजूद बच्चों के चोरी-छिपे ऑनलाइन गेम खेलने के हैं। मां-बाप की डांट से बचने के लिए बच्चे मोबाइल में चुपचाप गेम इंस्टाल करते हैं और गेम पूरा होने के बाद उन्हें अनइंस्टाल कर देते हैं। मनोचिकित्सक डॉ. हेमा खन्ना ने बताया कि ऐसे कई केसों में बच्चों की काउंसलिंग करनी पड़ी है। इसके बाद बच्चों में सुधार भी देखने को मिला।
सख्ती की तो चिड़चिड़ा हो गया बेटा
रामपुर बाग के एक दंपती अपने इकलौते बेटे को लेकर मनोचिकित्सक के पास पहुंचे। बताया, वह कक्षा दो में पढ़ाई कर रहा है। कोविड काल में दो साल तक मोबाइल से पढ़ाई की। उन्होंने पढ़ाई के लिए उसे एक नया मोबाइल खरीदकर दिया था। अब कक्षाएं आफलाइन होने के बाद उससे मोबाइल वापस लिया तो वह चिड़चिड़ाने लगा है। बाद में पता चला कि वह चोरी-छिपे मोबाइल पर गेम खेलता है। उन्होंने उसकी डांट लगाई तो उसने मोबाइल में चुपचाप गेम इंस्टाल करने और खेलने के बाद उसे अनइंस्टाल करने का रास्ता ढूंढ लिया। उन्हें इसका आभास हुआ तो मोबाइल की हिस्ट्री और डाटा खर्च पर नजर रखने लगे। सख्ती की तो बच्चा चिड़चिड़ा हो गया।
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रात में उठकर गेम खेलने लगी बेटी
सिविल लाइंस के एक कारोबारी की दस साल की बेटी कक्षा चार में पढ़ती है। उनका कहना है कि कोविड काल से पहले उनकी बेटी मोबाइल और गेम से दूर ही थी। कोविड काल में पढ़ाई ऑनलाइन हुई तो उसे मोबाइल की लत लग गई। उस समय पढ़ाई के दौरान वह कभी कभार गेम कुछ देर खेलती थी तो अनुमति दे देते थे लेकिन अब उसे इसकी आदत पड़ गई है। ऑफलाइन कक्षाएं शुरू होने के बाद आदत छुड़ाने के लिए मोबाइल देना बंद किया तो बेटी को अक्सर में रात में जागकर गेम खेलते देखा। डांटा तो कभी खाना न खाकर, समय से न सोकर और छोटी छोटी बात में चिड़चिड़ेपन से नाराजगी जतानी शुरू कर दी।
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मनोचिकित्सकों के मुताबिक पिछले दो सालों में बच्चों के तनाव, परीक्षा के डर, चिड़चिड़ेपन और बेवजह झगड़ा करने के काफी केस आए हैं लेकिन पिछले कुछ समय से बच्चों के ऑनलाइन गेम पीछे दीवानगी की हद तक जाने के मामले पढ़े हैं। कई केस अभिभावकों की सख्ती के बावजूद बच्चों के चोरी-छिपे ऑनलाइन गेम खेलने के हैं। मां-बाप की डांट से बचने के लिए बच्चे मोबाइल में चुपचाप गेम इंस्टाल करते हैं और गेम पूरा होने के बाद उन्हें अनइंस्टाल कर देते हैं। मनोचिकित्सक डॉ. हेमा खन्ना ने बताया कि ऐसे कई केसों में बच्चों की काउंसलिंग करनी पड़ी है। इसके बाद बच्चों में सुधार भी देखने को मिला।
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सख्ती की तो चिड़चिड़ा हो गया बेटा
रामपुर बाग के एक दंपती अपने इकलौते बेटे को लेकर मनोचिकित्सक के पास पहुंचे। बताया, वह कक्षा दो में पढ़ाई कर रहा है। कोविड काल में दो साल तक मोबाइल से पढ़ाई की। उन्होंने पढ़ाई के लिए उसे एक नया मोबाइल खरीदकर दिया था। अब कक्षाएं आफलाइन होने के बाद उससे मोबाइल वापस लिया तो वह चिड़चिड़ाने लगा है। बाद में पता चला कि वह चोरी-छिपे मोबाइल पर गेम खेलता है। उन्होंने उसकी डांट लगाई तो उसने मोबाइल में चुपचाप गेम इंस्टाल करने और खेलने के बाद उसे अनइंस्टाल करने का रास्ता ढूंढ लिया। उन्हें इसका आभास हुआ तो मोबाइल की हिस्ट्री और डाटा खर्च पर नजर रखने लगे। सख्ती की तो बच्चा चिड़चिड़ा हो गया।
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रात में उठकर गेम खेलने लगी बेटी
सिविल लाइंस के एक कारोबारी की दस साल की बेटी कक्षा चार में पढ़ती है। उनका कहना है कि कोविड काल से पहले उनकी बेटी मोबाइल और गेम से दूर ही थी। कोविड काल में पढ़ाई ऑनलाइन हुई तो उसे मोबाइल की लत लग गई। उस समय पढ़ाई के दौरान वह कभी कभार गेम कुछ देर खेलती थी तो अनुमति दे देते थे लेकिन अब उसे इसकी आदत पड़ गई है। ऑफलाइन कक्षाएं शुरू होने के बाद आदत छुड़ाने के लिए मोबाइल देना बंद किया तो बेटी को अक्सर में रात में जागकर गेम खेलते देखा। डांटा तो कभी खाना न खाकर, समय से न सोकर और छोटी छोटी बात में चिड़चिड़ेपन से नाराजगी जतानी शुरू कर दी।