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मां जालिपा के दर्शन करने आए थे आल्हा-ऊदल
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शाहजहांपुर। हरदोई-शाहजहांपुर सीमा पर बसे सेहरामऊ दक्षिणी में प्रख्यात माता जालिपा देवी का प्राचीन मंदिर आसपास के जनपदों में भी लोगों की आस्था का केंद्र है। मान्यता है कि यहां आल्हा-ऊदल मां जालिपा के दर्शन करने आए थे।
सेहरामऊ दक्षिणी शहर के पूर्वी छोर पर सड़क के दक्षिण की ओर एक ऊंचे टीले पर स्थापित मां जालिपा देवी का मंदिर कई सौ वर्षों का इतिहास समेटे हुए है। टीले पर मठिया के रूप में एक छोटे से मंदिर में माता रानी की मूर्ति है। भीड़ से मूर्ति को बचाने के लिए सामने लकड़ी-लोहे की रैलिंग लगा दी गई है। मंदिर इतना छोटा है कि उसके अंदर अधिकतम पांच-सात लोग ही एक बार में पूजा कर सकते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में इस मंदिर का महत्व कुछ अधिक है, इसलिए यहां पूरे दिन महिलाओं की भीड़ जुटी रहती है। सामान्य दिनों में माता के दर्शनार्थ भक्तों की संख्या में भले ही कुछ कमी रहती हो, लेकिन नवरात्र में यह संख्या कई गुना बढ़ जाती है।
मंदिर में मौजूद महिलाओं ने बताया कि नवरात्र में माता की आरती आटे से बनाए गए दीपक से करने की परंपरा है, जिसका कुछ अलग ही महत्व है। नवरात्र में भक्त आटे के दीपक घर से बनवाकर लाते है तो तमाम महिलाएं और लड़कियां वहीं दीपक बनाती हैं और माता की आरती करती हैं। यहां प्रतिवर्ष आषाढ़ मास में अमावस्या के बाद पहले सोमवार को भव्य मेला लगता है। बच्चों के मुंडन, अन्नप्रासन आदि संस्कार भी खूब होते हैं। पुजारी सियाराम बताते हैं कि यह मंदिर हजारों वर्ष पुराना है और यहां कभी आल्हा-ऊदल माता के दर्शन करने आए थे। इससे अनुमान लगाया जाता है कि मंदिर बहुत पुराना है।
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जालिपा माता का हुआ था प्राकट्य
वैसे तो मंदिर के इतिहास के बारे में कोई जानकारी किसी के पास नहीं है, लेकिन मेेरे पिताजी पुजारी राम भरोसे बताते थे कि माता जालिपा देवी की मूर्ति की स्थापना अलग से नहीं कराई गई है, बल्कि माता रानी का यहीं प्राकट्य हुआ है, ऐसा माना जाता है। मंदिर में सच्चे मन से मनौती मांगने पर भक्तों की हर मनोकामना पूरी होती है और भक्त मनौती पूरी होने पर प्रसाद के साथ घंटा भी चढ़ाते हैं। - सियाराम, पुजारी माता जालिपा मंदिर
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सेहरामऊ दक्षिणी शहर के पूर्वी छोर पर सड़क के दक्षिण की ओर एक ऊंचे टीले पर स्थापित मां जालिपा देवी का मंदिर कई सौ वर्षों का इतिहास समेटे हुए है। टीले पर मठिया के रूप में एक छोटे से मंदिर में माता रानी की मूर्ति है। भीड़ से मूर्ति को बचाने के लिए सामने लकड़ी-लोहे की रैलिंग लगा दी गई है। मंदिर इतना छोटा है कि उसके अंदर अधिकतम पांच-सात लोग ही एक बार में पूजा कर सकते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में इस मंदिर का महत्व कुछ अधिक है, इसलिए यहां पूरे दिन महिलाओं की भीड़ जुटी रहती है। सामान्य दिनों में माता के दर्शनार्थ भक्तों की संख्या में भले ही कुछ कमी रहती हो, लेकिन नवरात्र में यह संख्या कई गुना बढ़ जाती है।
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मंदिर में मौजूद महिलाओं ने बताया कि नवरात्र में माता की आरती आटे से बनाए गए दीपक से करने की परंपरा है, जिसका कुछ अलग ही महत्व है। नवरात्र में भक्त आटे के दीपक घर से बनवाकर लाते है तो तमाम महिलाएं और लड़कियां वहीं दीपक बनाती हैं और माता की आरती करती हैं। यहां प्रतिवर्ष आषाढ़ मास में अमावस्या के बाद पहले सोमवार को भव्य मेला लगता है। बच्चों के मुंडन, अन्नप्रासन आदि संस्कार भी खूब होते हैं। पुजारी सियाराम बताते हैं कि यह मंदिर हजारों वर्ष पुराना है और यहां कभी आल्हा-ऊदल माता के दर्शन करने आए थे। इससे अनुमान लगाया जाता है कि मंदिर बहुत पुराना है।
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जालिपा माता का हुआ था प्राकट्य
वैसे तो मंदिर के इतिहास के बारे में कोई जानकारी किसी के पास नहीं है, लेकिन मेेरे पिताजी पुजारी राम भरोसे बताते थे कि माता जालिपा देवी की मूर्ति की स्थापना अलग से नहीं कराई गई है, बल्कि माता रानी का यहीं प्राकट्य हुआ है, ऐसा माना जाता है। मंदिर में सच्चे मन से मनौती मांगने पर भक्तों की हर मनोकामना पूरी होती है और भक्त मनौती पूरी होने पर प्रसाद के साथ घंटा भी चढ़ाते हैं। - सियाराम, पुजारी माता जालिपा मंदिर