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भारत सबका.. समन्वित संकल्पना से ही तय होगा भविष्य
सार
संघ प्रमुख ने किया साफ, भविष्य के भारत पर संघ का दृष्टिकोण क्यों जरूरी
1857 में भारत की स्वाधीनता की कल्पना करने वाले सभी महापुरुष राष्ट्रवादी
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मोहन भागवत
- फोटो : अमर उजाला, बरेली
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विस्तार
बरेली। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत ने भारत को हिंदुओं का देश बताने के साथ स्पष्ट किया कि भारत सबका है और उसका भविष्य सभी की समन्वित संकल्पना से ही तय होगा। उन्होंने कहा कि कोई एक संगठन या व्यक्ति भविष्य के भारत की कल्पना तो कर सकता है लेकिन सामूहिक आधार के बगैर उसे प्रत्यक्ष नहीं पाया जा सकता। भविष्य के भारत के लिए सामूहिक आधार तैयार करना ही संघ का लक्ष्य है।
रुहेलखंड विश्वविद्यालय के स्टेडियम में अपने व्याख्यान में संघ प्रमुख ने कहा कि भविष्य का भारत सिर्फ कल्पना करने का काम नहीं है। कल्पना करने के साथ पूर्णगामी दृष्टिकोण से भी सोचना पड़ेगा। वर्तमान और भूतकाल का भी ध्यान रखना पड़ेगा। सौभाग्य यह है कि यह विचार जब पहली बार उभरा, वह समय ज्यादा पुराना नहीं है। 1857 में पूरे भारत ने सोचा था कि हम अब स्वतंत्र होंगे। अनेक अनुभवों के बाद हम 1947 में स्वतंत्र हो पाए। उन्होंने कहा कि तब हमारे जो पूर्वज थे, वह इतिहास को बहुत अच्छी तरह पहचानने और समझने वाले थे। भारत के वर्तमान के साथ भविष्य के लिए प्रयासरत थे। ये महापुरुष अनेक विचारधाराओं के थे लेकिन उन्होंने मिलकर भारत के भविष्य की कल्पना की थी। आज की परिभाषा में राष्ट्रवादी शब्द को विवादित बना दिया गया है लेकिन इन महापुरुषों को समाजवादी और साम्यवादी के साथ राष्ट्रवादी भी कहा जा सकता है।
संघ प्रमुख ने ‘भारत का भविष्य’ पर अपने व्याख्यान का कारण साफ करते हुए कहा कि संघ के बारे में बहुत सारी गलतफहमियां हैं, गलतफहमियां पैदा भी की जाती हैं। 2017 में दिल्ली के कार्यकर्ताओं ने संघ के बारे में अधिकृत रूप से बताने के लिए इसी शीर्षक से कार्यक्रम शुरू किया और उसमें उन्हें ही बोलने को कहा गया था। उनका अनुभव रहा कि उस व्याख्यान के बाद कई गलतफहमियां ठीक हो गईं। यह व्याख्यानमाला उसी शुरुआत का हिस्सा है।
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संघ प्रमुख ने कहा कि 1940 के पहले राष्ट्र के मामले में सब एक थे, उसके बाद ही बिखरना शुरू हुए। 1936 में प्रकाशित अपनी किताब में रजनी पामदत्त ने साफ लिखा था कि दुनिया मानती है कि अंग्रेजों के भारत में आने से विकास हुआ और प्रजातंत्र आया लेकिन यह गलत बात है। वेदकाल से अब तक का भारत का इतिहास देखने से स्पष्ट होता है कि अंग्रेजो ंके बिना भी हम भारत को आधुनिकता में ढाल सकते थे। हालांकि बाद में उनकी भाषा बदल गई। फिर भी 1972 में इस पुस्तक को रिप्रिंट कर उसे जैसे का तैसा छापा गया। अच्युतनंदन ने भी कहा था कि भारत को एक राष्ट्र न मानने की उनकी भूल हुई। कम से कम आदि शंकराचार्य के समय से भारत एक राष्ट्र है। रविंद्र नाथ ठाकुर ने अपनी एक प्रसिद्ध कविता में रूढ़ी कुरूतियों से पूर्ण मुक्त, प्रज्ञा से विचार करने वाला, सतत उत्कृष्ट गाथा के लिए प्रयासरत और निर्भय एकात्म भारत की कल्पना की है। गांधी जी ने भी सात पापों से मुक्त देश की कल्पना की। देश के संविधान में भी भारत की कल्पना की गई है। संविधान जब लोगों को अर्पण किया गया तो बाबा साहब ने संसद में दो भाषण दिए थे जिनमें भविष्य के भारत की कल्पना है। ये सारी कल्पनाएं उस समय के भारत की सहमति का प्रतीक हैं। संघ प्रमुख ने कहा कि हमें इन्हीं महापुरुषों के सपने को साकार करना चाहिए, अलग से सोचने की कोई जरूरत नहीं है। संघ की कल्पना इनसे रत्ती भर अलग नहीं है। शब्द अलग हैं, लेकिन भाव वही है।
बरेली। संघ प्रमुख ने कहा कि भारत के साथ इस्राइल स्वतंत्र हुआ। जर्मनी और जापान भी दूसरे विश्वयुद्ध से निकलकर हमारे साथ चलना सीखे, मगर हमसे कितना आगे निकल गए। मुट्ठी भर जनसंख्या और रेगिस्तान वाले इस्राइल जिस दिन अपनी स्वतंत्रता की घोषणा की, उसी दिन से लड़ाई प्रारंभ हो गई। चारों तरफ के आठ देशों ने मिलकर धावा बोला। स्वंतत्रता के पहले 30 वर्षों में पांच लड़ाइयां करनी पड़ीं। लेकिन हर लड़ाई जीतकर उन्होेंने अपनी भूमि का पूर्ण विस्तार किया। परिश्रम से रेगिस्तान को नंदन वन बना दिया। आज रेगिस्तान का देश इस्राइल फल और फूल एक्सपोर्ट करता है और दुनिया में धाक ऐसी है कि उसके किसी आदमी को हाथ लगाया तो नतीजे भुगतने तय हैं। जापान एक समय दुनिया के बाजारों का राजा बन बैठा। यूरोप के देशों में जर्मनी सबसे प्रमुख बन गया है। हम करोड़ों गुणवान लोगों की जनसंख्या वाले देश, स्वतंत्रता की लड़ाई जीती तो देश के खजाने में 16 हजार करोड़ रुपये थे, इंग्लैंड से 30 हजार करोड़ मिलने थे। सारी जनता एकमत थी फिर हम क्यों पीछे रह गए।
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रुहेलखंड विश्वविद्यालय के स्टेडियम में अपने व्याख्यान में संघ प्रमुख ने कहा कि भविष्य का भारत सिर्फ कल्पना करने का काम नहीं है। कल्पना करने के साथ पूर्णगामी दृष्टिकोण से भी सोचना पड़ेगा। वर्तमान और भूतकाल का भी ध्यान रखना पड़ेगा। सौभाग्य यह है कि यह विचार जब पहली बार उभरा, वह समय ज्यादा पुराना नहीं है। 1857 में पूरे भारत ने सोचा था कि हम अब स्वतंत्र होंगे। अनेक अनुभवों के बाद हम 1947 में स्वतंत्र हो पाए। उन्होंने कहा कि तब हमारे जो पूर्वज थे, वह इतिहास को बहुत अच्छी तरह पहचानने और समझने वाले थे। भारत के वर्तमान के साथ भविष्य के लिए प्रयासरत थे। ये महापुरुष अनेक विचारधाराओं के थे लेकिन उन्होंने मिलकर भारत के भविष्य की कल्पना की थी। आज की परिभाषा में राष्ट्रवादी शब्द को विवादित बना दिया गया है लेकिन इन महापुरुषों को समाजवादी और साम्यवादी के साथ राष्ट्रवादी भी कहा जा सकता है।
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संघ प्रमुख ने ‘भारत का भविष्य’ पर अपने व्याख्यान का कारण साफ करते हुए कहा कि संघ के बारे में बहुत सारी गलतफहमियां हैं, गलतफहमियां पैदा भी की जाती हैं। 2017 में दिल्ली के कार्यकर्ताओं ने संघ के बारे में अधिकृत रूप से बताने के लिए इसी शीर्षक से कार्यक्रम शुरू किया और उसमें उन्हें ही बोलने को कहा गया था। उनका अनुभव रहा कि उस व्याख्यान के बाद कई गलतफहमियां ठीक हो गईं। यह व्याख्यानमाला उसी शुरुआत का हिस्सा है।
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स्वतंत्रता के पहले सब एक थे, 1940 के बाद बदल गई कम्युनिस्टों की भाषा
भविष्य के भारत पर संघ के शब्द अलग लेकिन भाव गांधी जी, बाबा साहब और उनसे पहले के महापुरुषों की कल्पना से रत्ती भर अलग नहींसंघ प्रमुख ने कहा कि 1940 के पहले राष्ट्र के मामले में सब एक थे, उसके बाद ही बिखरना शुरू हुए। 1936 में प्रकाशित अपनी किताब में रजनी पामदत्त ने साफ लिखा था कि दुनिया मानती है कि अंग्रेजों के भारत में आने से विकास हुआ और प्रजातंत्र आया लेकिन यह गलत बात है। वेदकाल से अब तक का भारत का इतिहास देखने से स्पष्ट होता है कि अंग्रेजो ंके बिना भी हम भारत को आधुनिकता में ढाल सकते थे। हालांकि बाद में उनकी भाषा बदल गई। फिर भी 1972 में इस पुस्तक को रिप्रिंट कर उसे जैसे का तैसा छापा गया। अच्युतनंदन ने भी कहा था कि भारत को एक राष्ट्र न मानने की उनकी भूल हुई। कम से कम आदि शंकराचार्य के समय से भारत एक राष्ट्र है। रविंद्र नाथ ठाकुर ने अपनी एक प्रसिद्ध कविता में रूढ़ी कुरूतियों से पूर्ण मुक्त, प्रज्ञा से विचार करने वाला, सतत उत्कृष्ट गाथा के लिए प्रयासरत और निर्भय एकात्म भारत की कल्पना की है। गांधी जी ने भी सात पापों से मुक्त देश की कल्पना की। देश के संविधान में भी भारत की कल्पना की गई है। संविधान जब लोगों को अर्पण किया गया तो बाबा साहब ने संसद में दो भाषण दिए थे जिनमें भविष्य के भारत की कल्पना है। ये सारी कल्पनाएं उस समय के भारत की सहमति का प्रतीक हैं। संघ प्रमुख ने कहा कि हमें इन्हीं महापुरुषों के सपने को साकार करना चाहिए, अलग से सोचने की कोई जरूरत नहीं है। संघ की कल्पना इनसे रत्ती भर अलग नहीं है। शब्द अलग हैं, लेकिन भाव वही है।
इस्राइल की दी मिसाल, पूछा- हम क्यों पीछे रह गए
लेकिन सवाल वो नहीं, सवाल यह है कि अगर यह सहमति थी अगर इसको संविधान तक में इस प्रकार लाया गया है तो अब तक यह साकार क्यों नहीं हुई।बरेली। संघ प्रमुख ने कहा कि भारत के साथ इस्राइल स्वतंत्र हुआ। जर्मनी और जापान भी दूसरे विश्वयुद्ध से निकलकर हमारे साथ चलना सीखे, मगर हमसे कितना आगे निकल गए। मुट्ठी भर जनसंख्या और रेगिस्तान वाले इस्राइल जिस दिन अपनी स्वतंत्रता की घोषणा की, उसी दिन से लड़ाई प्रारंभ हो गई। चारों तरफ के आठ देशों ने मिलकर धावा बोला। स्वंतत्रता के पहले 30 वर्षों में पांच लड़ाइयां करनी पड़ीं। लेकिन हर लड़ाई जीतकर उन्होेंने अपनी भूमि का पूर्ण विस्तार किया। परिश्रम से रेगिस्तान को नंदन वन बना दिया। आज रेगिस्तान का देश इस्राइल फल और फूल एक्सपोर्ट करता है और दुनिया में धाक ऐसी है कि उसके किसी आदमी को हाथ लगाया तो नतीजे भुगतने तय हैं। जापान एक समय दुनिया के बाजारों का राजा बन बैठा। यूरोप के देशों में जर्मनी सबसे प्रमुख बन गया है। हम करोड़ों गुणवान लोगों की जनसंख्या वाले देश, स्वतंत्रता की लड़ाई जीती तो देश के खजाने में 16 हजार करोड़ रुपये थे, इंग्लैंड से 30 हजार करोड़ मिलने थे। सारी जनता एकमत थी फिर हम क्यों पीछे रह गए।