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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Bareilly News ›   Kashmir Pampore are unable to forget the riots

कश्मीर के पंपोर में हुए दंगे को नहीं भूल पा रहे हैं

Mon, 11 Jul 2016 01:41 AM IST
ब्यूरो, अमर उजाला बरेली
ब्यूरो, अमर उजाला बरेली Updated Mon, 11 Jul 2016 01:41 AM IST
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अमरनाथ यात्रा से लौटे गौरव सक्सेना अभी भी श्रीनगर के पंपोर इलाके में हुई घटना को भूल नहीं  पा रहे हैं।  वहां सड़क पर जगह-जगह  जलते टायर।  गाड़ियों के शीशों का बिखरा कांच। पुलिस और सेना दंगा ग्रस्त इलाकों से नदारद थी । आसपास कश्मीरियों की भीड़ थी, उनमें से यह पता करना मुश्किल था कि कौन दंगाई और कौन अमन पसंद नागरिक। चारो तरफ  मौत दिखाई दे रही थी। सपा नेता गौरव सक्सेना बताते हैं कि उन्होंने शुक्रवार आठ जुलाई की दोपहर करीब 12 बजे अमरनाथ पहुंचकर बाबा बर्फानी के दर्शन किए। शाम करीब पांच बजे गौरव और उनके तीन साथी परमजीत सिंह उर्फ कैप्टन, शक्ति कुमार मंगल व अमित सक्सेना बालटाल पहुंचे। वहां से शाम करीब छह बजे टैक्सी में जम्मू के लिए रवाना हुए और रात करीब 9.30 बजे श्रीनगर पहुंचे। कुछ आगे बढ़े तो आतंकी बुरहान के मारे जाने का पता चला।
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 बुरहान के मरने की सुनकर टैक्सी चालक भी बोल उठा, यह बुरा हुआ। आगे चलकर देखा तो सड़क पर गाड़ियों के जलते टायर, टूटे शीशे और पथराव किए ईंट-पत्थर पड़े थे। जम्मू की ओर से आने वाली गाड़ियों के शीशे टूटे हुए थे। इससे घबराए चालक गाड़ी रोककर खड़े हो गए। चालक के चेहरे पर दहशत साफ दिख रही थी। उसने उपद्रवियों से बचने को हाइवे छोड़कर दूसरे सुनसान जंगल के रास्ते से निकलना चाहा। महज दस किलोमीटर चले होंगे कि सामने से टार्च की रोशनी दिखी। लगा कि उपद्रवी होंगे, जिससे वहीं से गाड़ी लौटा दी। चालक गाड़ी दोबारा हाइवे पर ले गया और पंपौर क्रास करके अनंतनाग से पहले करीब दो सौ मीटर की दूरी पर युवाओं की भीड़ आती दिखी। तब लगा कि अब नहीं बचेंगे। चालकों ने अपनी गाड़ियां मोड़कर पीछे दौड़ा दीं। भीड़ ने भी दौड़कर पथराव किया तो पीछे की गाड़ियों के शीशे टूट गए। वहां से लौटकर श्रीनगर स्टेशन पहुंचे। तब तक रात के 12 बज चुके थे। चूंकि स्टेशन पर कोई ट्रेन नहीं थी, इसलिए टैक्सी वाले से हवाई अड्डा पहुंचने को कहा। उसने जैसे-तैसे पहुंचा तो दिया, लेकिन हवाई अड्डे के बाहर छोड़ गया। हवाई अड्डे के पास भी कोई सुरक्षा कर्मी नहीं था। वहां कुछ और लोग भी थे। करीब सौ मीटर दूर टायर जल रहे थे। ईश्वर को याद करने के अलावा कोई दूसरा सहारा नहीं था। जरा आहट होने पर ऐसे लगा जैसे उपद्रवी आ रहे हों। शनिवार सुबह करीब साढ़े पांच बजे हवाई अड्डे के सुरक्षा कर्मी दिखाई दिए। उन्होंने पड़ोस में एक गेस्ट हाउस बताया। चूंकि फ्लाइट में देरी थी, जिससे गेस्टहाउस जाकर करीब दो घंटे आराम किया। फिर फ्लाइट से जम्मू पहुंचे और वहां से ट्रेन में बैठकर दिल्ली होते हुए बरेली।
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जत्थे में दो महिलाएं भी, सभी सुरक्षित
मीरगंज। मीरगंज के 31 अमरनाथ यात्रियों का जत्था जम्मू-कश्मीर के बालटाल में फंसा है। बालटाल के कैंप में रुक-रुककर आ रही फायरिंग और धमाकों की आवाजों से अमरनाथ यात्री सहमे हुए हैं। 
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नथपुरा निवासी जिला पंचायत सदस्य निरंजन यदुवंशी ने बालटाल कैंप से मोबाइल पर बताया कि 6 जुलाई की रात साढ़े बारह बजे बरेली से चलकर अगले दिन सुबह ट्रेन से हम लोग जम्मूतवी पहुंचे तो बर्फानी बाबा अमरनाथ के दर्शनों की ललक सफर की थकान पर भारी थी। बुरहान बानी के मारे जाने के बाद घाटी में फैली हिंसा ने हम सबकी ने नीद उड़ा दी थी। रविवार को सब लोग श्रीनगर से बुक कराई गई बस के इंतजार में थे। लेकिन बस ड्राइवर ने अशांत माहौल का हवाला देते आने से इंकार कर दिया। बकौल निरंजन, जत्थे के सभी सदस्यों के कपड़े और सारा जरूरी सामान पहले ही श्रीनगर भेज दिया था। सभी तीर्थयात्री सेना के चौतरफा कड़े घेरे में बालटाल में बदायूं के संजय पाराशरी के तीर्थयात्री कैंप में हैं। थोड़ी-थोड़ी देर बाद फायरिंग-धमाकों की काफी दूरी से आती आवाजें तीर्थयात्रियों को और भी डरा देती हैं। जत्थे में हुरहुरी के डा. भीमसेन तुरैहा, रामौतार आर्य, कुलदीप मौर्य, केपी मौर्य, ठिरिया खुर्द प्रधान लालबहादुर और आसपास गांवों के मनोज कुमार, धारा सिंह, विनोद कुमार, मुकेश कुमार, अमित, संजीव, हरदेव, सूरज मौर्य, सूरज मल्होत्रा, मंजू मल्होत्रा, उर्मिला मौर्य समेत 31 अमरनाथ यात्री शामिल हैं और सभी सुरक्षित बताए जा रहे हैं।
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