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टेंडर निकालना तो बहाना है.. साहब को लोकल पर्चेज के रास्ते जाना है
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बरेली। थैलेसीमिया के मरीजों की जिंदगी दवाओं पर ही निर्भर है लेकिन फिर भी ‘लोकल पर्चेज’ के खेल में मशगूल जिला अस्पताल प्रशासन उनके साथ खिलवाड़ कर रहा है। थैलेसीमिया की दवाओं के टेंडर दो बार निकालने के बाद चुपचाप रद्द कर दिए गए। जिला अस्पताल प्रशासन पर इस वजह से लोकल पर्चेजिंग में कमीशनखोरी के भी आरोप लग रहे हैं।
जिला अस्पताल पर करीब डेढ़ सौ थैलेसीमिया पीड़ित मरीजों को दवाएं उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी है। थैलेसीमिया पीड़ितों के लिए काम कर रहे एनजीओ भी जिला अस्पताल से ही दवा लेते हैं। ज्यादातर दवाएं ऐसी हैं जो मरीजों के शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने का काम करती हैं। डॉक्टरों के मुताबिक थैलेसीमिया मरीजों की दवा अगर बंद हो जाए तो यह उनके लिए जानलेवा साबित हो सकता है। मगर इसके बावजूद जिला अस्पताल में काफी समय से टेंडर न होने की वजह से मरीजों को दवाएं मिलने में दिक्कत हो रही है। सूत्रों के मुताबिक मई में दवाएं खत्म होने के बाद सीएमओ ने जून में पहली बार टेंडर निकाला था। टेंडर डालने की तिथि आठ जुलाई तय की गई थी लेकिन अचानक कारण स्पष्ट किए बगैर यह डेट 28 जुलाई तक बढ़ा दी गई, फिर 28 जुलाई को भी टेंडर प्रक्रिया ही निरस्त कर दी गई। इसके बाद टेंडर डालने वालों ने स्वास्थ्य विभाग के अफसरों पर आरोप मढ़ने शुरू कर दिए हैं।
लोकल परचेजिंग का ‘खेल’
सूत्रों के मुताबिक दवाओं की खरीदफरोख्त में जिला अस्पताल प्रशासन पर खेल करने के आरोप पुराने हैं। बताया जाता है कि अक्सर दवाएं खत्म होने के बाद ही ही जिला अस्पताल शासन को दवाओं की मांग भेजता है जबकि यह काम उसे पहले ही करना चाहिए ताकि समय से दवाएं मिलें और उनकी लोकल परचेज न करनी पड़े। शासन को समय से डिमांड न भेजने के पीछे दवाओं की लोकल पर्चेज का ही खेल होता है। सूत्रों का कहना है कि दवाओं की लोकल पर्चेज में दवा विक्रेता के साथ स्टोर मैनेजर और डॉक्टरों का भी कमीशन तय होता है।
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मरीजों के लिए ये दवाएं जरूरी
डेफेरोकामिन इंजेक्शन, वेनोग्लिस नीडलेस, कैप डेफेरीपोन, टैब डेफेरासिरॉक्स, कैप हाइड्रोक्यूरीया, टैब फोलिक एसिड, जिनोविट, कैल्सियम विद कैल्सिट्रॉल, एल्बेंजॉल, विटामिन डी3, नेमोसिड, कैल्फर आदि दवाएं इनमें शामिल हैं। बताया जाता है कि इनमें दो दवाएं ऐसी हैं जो एक ही कंपनी बनाती है। पिछले दिनों हुए टेंडर में इन दवाओं की आपूर्ति नहीं हो सकी थी। इसलिए सिर्फ दो ही टेंडर पड़े और कोरम पूरा न होने के कारण टेंडर निरस्त कर दिए गए।
दवाओं का स्टाक खत्म होने पर सूचना मिलते ही टेंडर निकाल दिया गया लेकिन सिर्फ दो टेंडर ही पड़े। लिहाजा कोरम पूरा न होने की वजह से टेंडर निरस्त कर दिए गए हैं। जो आरोप लगाए जा रहे हैं, वे निराधार हैं। - डॉ. विनीत शुक्ला, सीएमओ
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जिला अस्पताल पर करीब डेढ़ सौ थैलेसीमिया पीड़ित मरीजों को दवाएं उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी है। थैलेसीमिया पीड़ितों के लिए काम कर रहे एनजीओ भी जिला अस्पताल से ही दवा लेते हैं। ज्यादातर दवाएं ऐसी हैं जो मरीजों के शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने का काम करती हैं। डॉक्टरों के मुताबिक थैलेसीमिया मरीजों की दवा अगर बंद हो जाए तो यह उनके लिए जानलेवा साबित हो सकता है। मगर इसके बावजूद जिला अस्पताल में काफी समय से टेंडर न होने की वजह से मरीजों को दवाएं मिलने में दिक्कत हो रही है। सूत्रों के मुताबिक मई में दवाएं खत्म होने के बाद सीएमओ ने जून में पहली बार टेंडर निकाला था। टेंडर डालने की तिथि आठ जुलाई तय की गई थी लेकिन अचानक कारण स्पष्ट किए बगैर यह डेट 28 जुलाई तक बढ़ा दी गई, फिर 28 जुलाई को भी टेंडर प्रक्रिया ही निरस्त कर दी गई। इसके बाद टेंडर डालने वालों ने स्वास्थ्य विभाग के अफसरों पर आरोप मढ़ने शुरू कर दिए हैं।
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लोकल परचेजिंग का ‘खेल’
सूत्रों के मुताबिक दवाओं की खरीदफरोख्त में जिला अस्पताल प्रशासन पर खेल करने के आरोप पुराने हैं। बताया जाता है कि अक्सर दवाएं खत्म होने के बाद ही ही जिला अस्पताल शासन को दवाओं की मांग भेजता है जबकि यह काम उसे पहले ही करना चाहिए ताकि समय से दवाएं मिलें और उनकी लोकल परचेज न करनी पड़े। शासन को समय से डिमांड न भेजने के पीछे दवाओं की लोकल पर्चेज का ही खेल होता है। सूत्रों का कहना है कि दवाओं की लोकल पर्चेज में दवा विक्रेता के साथ स्टोर मैनेजर और डॉक्टरों का भी कमीशन तय होता है।
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मरीजों के लिए ये दवाएं जरूरी
डेफेरोकामिन इंजेक्शन, वेनोग्लिस नीडलेस, कैप डेफेरीपोन, टैब डेफेरासिरॉक्स, कैप हाइड्रोक्यूरीया, टैब फोलिक एसिड, जिनोविट, कैल्सियम विद कैल्सिट्रॉल, एल्बेंजॉल, विटामिन डी3, नेमोसिड, कैल्फर आदि दवाएं इनमें शामिल हैं। बताया जाता है कि इनमें दो दवाएं ऐसी हैं जो एक ही कंपनी बनाती है। पिछले दिनों हुए टेंडर में इन दवाओं की आपूर्ति नहीं हो सकी थी। इसलिए सिर्फ दो ही टेंडर पड़े और कोरम पूरा न होने के कारण टेंडर निरस्त कर दिए गए।
दवाओं का स्टाक खत्म होने पर सूचना मिलते ही टेंडर निकाल दिया गया लेकिन सिर्फ दो टेंडर ही पड़े। लिहाजा कोरम पूरा न होने की वजह से टेंडर निरस्त कर दिए गए हैं। जो आरोप लगाए जा रहे हैं, वे निराधार हैं। - डॉ. विनीत शुक्ला, सीएमओ