जंग-ए-आजादी: बरेली के इस चर्च पर हमलाकर क्रांतिकारियों ने दिखाई ताकत, 40 अंग्रेजों को उतारा था मौत के घाट
जब 1857 का संग्राम शुरू हुआ तो क्रांतिकारियों की नजर चर्च पर पड़ी। 31 मई 1857 को चर्च पर हमला कर दिया। हमले में क्रांतिकारियों ने 40 अंग्रेजों को मौत के घाट उतार कर चर्च में आग लगा दी थी।
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बरेली में ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ जब 1857 की क्रांति शुरू हुई तो उसकी चिंगारी रुहेलखंड में भी भड़की। क्रांति का गवाह बना कैंट में स्थित फ्री विल बैप्टिस्ट चर्च। इस पर हमला कर क्रांतिकारियों ने 40 अंग्रेजों को मौत के घाट उतार दिया था। चर्च में आग लगा दी थी। इस हमले ने ब्रिटिश सरकार को हिलाकर रख दिया था। पहली बार इतनी बड़ी संख्या में अंग्रेजों को मारा गया था।
जानकारों के मुताबिक, ईस्ट इंडिया कंपनी के लोग जब ब्रिटिश सरकार के अंग बन चुके थे, तब उन्होंने ईसाई समुदाय से धन एकत्र कर वर्ष 1838 में इस चर्च का निर्माण कराया। ब्रिटिश बिशप डैनियल विल्सन डीडी कोलकाता से यहां आए और इसके निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। भारतीयों पर जुल्म करने के लिए चर्च अंग्रेजों का प्रमुख अड्डा बन चुका था।
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31 मई 1857 को किया था हमला
जब 1857 का संग्राम शुरू हुआ तो क्रांतिकारियों की नजर चर्च पर पड़ी। 31 मई 1857 को चर्च पर हमला कर दिया। चर्च के पादरी डेनियल विल्सन, चर्च के प्रशासनिक अधिकारी जार्ज डेवी रेक्स समेत 40 अंग्रेजों को मौत के घाट उतारकर चर्च को ध्वस्त कर दिया। जंग की शुरुआत फतेहगंज पश्चिमी से हुई थी। सभी की कब्रें आज भी चर्च परिसर में बनी हैं।हमले के बाद मिली बंदूक ले जाने की मंजूरी
रुहेलखंड की सरजमीं पर रुहेला सरदारों ने अंग्रेजों की नाक में दम कर रखा था। बताते हैं कि रुहेलों को पहले चर्च में बंदूक ले जाने की इजाजत नहीं थी। मगर इस हमले से कांपे अंग्रेजों ने रुहेला सरदारों को चर्च में बंदूक ले जाने की मंजूरी दी थी। बंदूक टांगने के लिए चर्च में नई बैंच लगाई गई। जिसमे बंदूक टांगने का कुंडा भी लगाया गया। बेंच में भी संगीन रखने के लिए जगह बनाई गई।