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शोषित समाज का प्रतिनिधित्व करता है ‘अमली’ नाटक
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बघेलखंड और बिहार के परिवेश का शानदार समन्वय देखा दर्शकों ने, आज ‘तानसेन’ का मंचन
बरेली। विंडरमेयर में चल रहे थिएटर फेस्ट में छठे दिन ‘अमली’ नाटक का मंचन किया गया। मूल रूप से भोजपुरी भाषा में लिखे गए इस गए इस नाटक में बघेलखंड और बिहार के परिवेश का बेहतरीन समन्वय दर्शकों को देखने को मिला।
नाटक के जाने माने साहित्यकार ऋषिकेश सुलभ के लिखे इस ‘अमली’ नाटक की कहानी उस पीड़ित समाज का प्रतिनिधित्व करती है, जिसे ताकतवर लोगों ने हमेशा लूटा और उनका शोषण किया। इस कहानी में रमेसरा नामक एक व्यक्ति से ब्याह कर उसके घर आई अमली की जिंदगी में कोई बदलाव तो नहीं आता, मगर जमींदार की साजिशों से तंग रमेसरा गांव छोड़ कर कलकत्ता जाने का फैसला करता है। इसके बाद से ही अमली के दुर्दिनों की शुरुआत होती है। इस नाटक की कहानी देश के किसी इलाके रहने वाले किसी बाशिंदे की जिंदगी की कहानी जैसी ही लगती है। इस संबंध में नाटक के निर्देशक का कहना है कि बघेलखंड की अपनी मातृ भूमि को वह दिल्ली में रहते हुए कभी भूल नहीं पाए। गांव की पृष्ठ भूमि पर आधारित यह नाटक न सिर्फ गांव की स्मृतियों को समर्पित है बल्कि वक्त और सत्ता के बदलाव के बावजूद सामंती व्यवस्था का बने रहना उन्हें कचोटता है। अमली दर असल उसी की अभिव्यक्ति है।
दिल्ल के रंग विशारद नाट्य संघ की प्रस्तुत में अमली की भूमिका में बीना शर्मा ने बेहतरीन अदाकारी की। उनके साथ नाटक में अतुल पांडेय, शिल्पा वर्मा, विशारद वर्मा, रजत, मोहम्मद साजिद और सुनील कुमार यादव ने विभिन्न पात्रों को निभाया। दया दृष्टि चैरिटेबल ट्रस्ट की ओर से आयोजित इस कार्यक्रम में मुख्य अतिथि अरविंद बग्गा रहे। उनका ट्रस्ट के चेयरमैन डा. ब्रिजेश्वर सिंह ने बुके देकर स्वागत किया।
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बरेली। विंडरमेयर में चल रहे थिएटर फेस्ट में छठे दिन ‘अमली’ नाटक का मंचन किया गया। मूल रूप से भोजपुरी भाषा में लिखे गए इस गए इस नाटक में बघेलखंड और बिहार के परिवेश का बेहतरीन समन्वय दर्शकों को देखने को मिला।
नाटक के जाने माने साहित्यकार ऋषिकेश सुलभ के लिखे इस ‘अमली’ नाटक की कहानी उस पीड़ित समाज का प्रतिनिधित्व करती है, जिसे ताकतवर लोगों ने हमेशा लूटा और उनका शोषण किया। इस कहानी में रमेसरा नामक एक व्यक्ति से ब्याह कर उसके घर आई अमली की जिंदगी में कोई बदलाव तो नहीं आता, मगर जमींदार की साजिशों से तंग रमेसरा गांव छोड़ कर कलकत्ता जाने का फैसला करता है। इसके बाद से ही अमली के दुर्दिनों की शुरुआत होती है। इस नाटक की कहानी देश के किसी इलाके रहने वाले किसी बाशिंदे की जिंदगी की कहानी जैसी ही लगती है। इस संबंध में नाटक के निर्देशक का कहना है कि बघेलखंड की अपनी मातृ भूमि को वह दिल्ली में रहते हुए कभी भूल नहीं पाए। गांव की पृष्ठ भूमि पर आधारित यह नाटक न सिर्फ गांव की स्मृतियों को समर्पित है बल्कि वक्त और सत्ता के बदलाव के बावजूद सामंती व्यवस्था का बने रहना उन्हें कचोटता है। अमली दर असल उसी की अभिव्यक्ति है।
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दिल्ल के रंग विशारद नाट्य संघ की प्रस्तुत में अमली की भूमिका में बीना शर्मा ने बेहतरीन अदाकारी की। उनके साथ नाटक में अतुल पांडेय, शिल्पा वर्मा, विशारद वर्मा, रजत, मोहम्मद साजिद और सुनील कुमार यादव ने विभिन्न पात्रों को निभाया। दया दृष्टि चैरिटेबल ट्रस्ट की ओर से आयोजित इस कार्यक्रम में मुख्य अतिथि अरविंद बग्गा रहे। उनका ट्रस्ट के चेयरमैन डा. ब्रिजेश्वर सिंह ने बुके देकर स्वागत किया।
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