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पूर्व विधायक इस्लाम साबिर को गिरफ्तार करने का आदेश
ब्यूरो, अमर उजाला बरेली
Updated Wed, 25 May 2016 01:44 AM IST
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पूव विधायक गिरफ्तार को करें
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1989 के कैंट विधानसभा चुनाव में श्यामगंज के मौलाना आजाद इंटर कालेज स्थित पोलिंग बूथ पर कैप्चरिंग और मारपीट करने के आरोप में 26 साल से गैरजमानती वारंट पर चल रहे सपा नेता और पूर्व विधायक इस्लाम साबिर को एसीजीएम कोर्ट ने गिरफ्तार करके पेश करने के आदेश पुलिस को दिए हैं। एसीजीएम ने एसएसपी को निर्देश दिया है कि छह जून को साबिर को कोर्ट में पेश किया जाए। सरकार ने लोक हित में केस वापस लेने का आग्रह किया था। माननीय जज ने कई नजीरें पढ़कर कहा कि इस मामले में लोकहित की बात सामने नहीं आती।
अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट शक्ति सिंह ने मंगलवार को शासन से इस मामले को वापस लेने के लिए अभियोजन की ओर से प्रस्तुत तीसरे प्रार्थनापत्र को भी खारिज कर दिया और 26 वर्ष से गैरजमानती वारंट पर भी पूर्व विधायक के कोर्ट में उपस्थित न होने को बेहद गंभीरता से लिया। एसीजीएम ने साबिर के खिलाफ गैरजमानती वारंट का अनुपालन सुनिश्चित करने के आदेश कर दिए। खास बात यह कि इस मामले में पुलिस 26 साल से पूर्व विधायक को गैरजमानती वारंट तामील भी नहीं करा पाई थी। जिस चुनाव में यह वाकया हुआ उसमें इस्लाम साबिर कांग्रेस के टिकट पर विधानसभा चुनाव लड़ रहे थे। मुकाबले में प्रवीण सिंह ऐरन जनता दल के प्रत्याशी थे। यह चुनाव ऐरन ने ही जीता था।
न्यायालय में मंगलवार को लोक अभियोजक की ओर से प्रार्थनापत्र खारिज होते ही सरकार की ओर से पूर्व विधायक इस्लाम साबिर के खिलाफ लंबित वाद वापस लेने की तीसरी कोशिश भी व्यर्थ र्गई। इस मामले में एसीजेएम शक्ति सिंह ने आदेश में लिखा है कि इससे पूर्व भी दो बार लोक अभियोजक की ओर से वाद वापसी के लिए प्रार्थनापत्र प्रस्तुत किए गए, जिन्हें इस न्यायालय ने निरस्त कर दिया था। कोर्ट में आदेश में टिप्पणी की है कि समस्त तथ्यों एवं परिस्थितियों को दृष्टिगत रखते हुए अभियोजन अधिकारी द्वारा प्रस्तुत प्रार्थनापत्र अंतर्गत धारा 321 निरस्त होने योग्य है। वादी संजीव कुमार गुप्ता ने 22 नवंबर 1989 को थाना बारादरी में एफआईआर कराई थी कि इस्लाम साबिर 25-30 लोगों के साथ एक राय होकर मौलाना आजाद इंटर कालेज श्यामगंज के पोलिंग बूथ पर आए और पोलिंग एजेंटों को मारपीट कर बाहर निकाल दिया। जबरन बैलेट पेपर फाड़ कर बाहर निकाले और मुहर लगाकर मतपेटी में डालने लगे। पोलिंग एजेंट विनोद कुमारी ने विरोध किया तो उस पर जान से मारने की नियत से फायर किए। वहां तैनात दरोगा बालियान पर रिवाल्वर से फायर किया। दरोगा कमरे में बंद हो गया तो हैंड ग्रेनेड फेंक कर कमरा उड़ाने की कोशिश की। इस मामले में मुख्य आरोपी इस्लाम साबिर और अन्य के खिलाफ थाना बारादरी में भारतीय दंड संहिता की धाराएं 147, 148, 149, 307 और लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 171 के तहत प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज की गई थी। इस्लाम साबिर ने 23 नवंबर 1989 को कोर्ट से चार-चार हजार के दो जमानती व्यक्तिगत बंधनामा देकर जमानत कराई थी। 13 जुलाई 1990 को चार्जशीट दाखिल की गई। चार्जशीट पर आपत्ति व्यक्त कर इस्लाम साबिर की ओर से रिवीजन दायर की गई, जिसे तत्कालीन अपर सत्र न्यायाधीश अशोक कुमार सिंह ने 25 फरवरी 2013 को खारिज कर दिया था। इस मामले में 24 जनवरी 1991 से अनवरत गैर जमानती वारंट चल रहे हैं।
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एसीजेएम ने इस मामले में लिखा है कि अभियोजन अधिकारी द्वारा शासन के निर्णय के अनुसार वाद में अभियोजन वापस लेने की अनुमति प्रदान किये जाने की याचना की गई है लेकिन जहां तक अभियोजन के वापस लेने का प्रश्न है न्यायालय द्वारा लोक अभियोजक का आवेदन को यांत्रिक तरीके से स्वीकार नहीं किया जा सकता है। न्यायालय को सर्वप्रथम यह देखना है कि क्या वास्तव में इसमें कोई लोक हित का प्रश्न निहित है। इससे किन उद्देश्यों की पूर्ति होगी। एसीजेएम शक्ति सिंह ने मद्रास उच्च न्यायालय, कर्नाटक, केरल, इलाहाबाद उच्च न्यायालय और सुप्रीम कोर्ट की पांच नजीरों का उल्लेख करते हुए लिखा है कि अभियोजन का मुकदमा केवल लोक कल्याण हेतु परिक्षेत्र में शांति की स्थापना के लिए किया जा सकता है। इस मामले में ऐसा कोई जन हित व लोक हित स्पष्ट रूप से दर्शित नहीं किया गया है।
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अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट शक्ति सिंह ने मंगलवार को शासन से इस मामले को वापस लेने के लिए अभियोजन की ओर से प्रस्तुत तीसरे प्रार्थनापत्र को भी खारिज कर दिया और 26 वर्ष से गैरजमानती वारंट पर भी पूर्व विधायक के कोर्ट में उपस्थित न होने को बेहद गंभीरता से लिया। एसीजीएम ने साबिर के खिलाफ गैरजमानती वारंट का अनुपालन सुनिश्चित करने के आदेश कर दिए। खास बात यह कि इस मामले में पुलिस 26 साल से पूर्व विधायक को गैरजमानती वारंट तामील भी नहीं करा पाई थी। जिस चुनाव में यह वाकया हुआ उसमें इस्लाम साबिर कांग्रेस के टिकट पर विधानसभा चुनाव लड़ रहे थे। मुकाबले में प्रवीण सिंह ऐरन जनता दल के प्रत्याशी थे। यह चुनाव ऐरन ने ही जीता था।
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न्यायालय में मंगलवार को लोक अभियोजक की ओर से प्रार्थनापत्र खारिज होते ही सरकार की ओर से पूर्व विधायक इस्लाम साबिर के खिलाफ लंबित वाद वापस लेने की तीसरी कोशिश भी व्यर्थ र्गई। इस मामले में एसीजेएम शक्ति सिंह ने आदेश में लिखा है कि इससे पूर्व भी दो बार लोक अभियोजक की ओर से वाद वापसी के लिए प्रार्थनापत्र प्रस्तुत किए गए, जिन्हें इस न्यायालय ने निरस्त कर दिया था। कोर्ट में आदेश में टिप्पणी की है कि समस्त तथ्यों एवं परिस्थितियों को दृष्टिगत रखते हुए अभियोजन अधिकारी द्वारा प्रस्तुत प्रार्थनापत्र अंतर्गत धारा 321 निरस्त होने योग्य है। वादी संजीव कुमार गुप्ता ने 22 नवंबर 1989 को थाना बारादरी में एफआईआर कराई थी कि इस्लाम साबिर 25-30 लोगों के साथ एक राय होकर मौलाना आजाद इंटर कालेज श्यामगंज के पोलिंग बूथ पर आए और पोलिंग एजेंटों को मारपीट कर बाहर निकाल दिया। जबरन बैलेट पेपर फाड़ कर बाहर निकाले और मुहर लगाकर मतपेटी में डालने लगे। पोलिंग एजेंट विनोद कुमारी ने विरोध किया तो उस पर जान से मारने की नियत से फायर किए। वहां तैनात दरोगा बालियान पर रिवाल्वर से फायर किया। दरोगा कमरे में बंद हो गया तो हैंड ग्रेनेड फेंक कर कमरा उड़ाने की कोशिश की। इस मामले में मुख्य आरोपी इस्लाम साबिर और अन्य के खिलाफ थाना बारादरी में भारतीय दंड संहिता की धाराएं 147, 148, 149, 307 और लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 171 के तहत प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज की गई थी। इस्लाम साबिर ने 23 नवंबर 1989 को कोर्ट से चार-चार हजार के दो जमानती व्यक्तिगत बंधनामा देकर जमानत कराई थी। 13 जुलाई 1990 को चार्जशीट दाखिल की गई। चार्जशीट पर आपत्ति व्यक्त कर इस्लाम साबिर की ओर से रिवीजन दायर की गई, जिसे तत्कालीन अपर सत्र न्यायाधीश अशोक कुमार सिंह ने 25 फरवरी 2013 को खारिज कर दिया था। इस मामले में 24 जनवरी 1991 से अनवरत गैर जमानती वारंट चल रहे हैं।
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एसीजेएम ने इस मामले में लिखा है कि अभियोजन अधिकारी द्वारा शासन के निर्णय के अनुसार वाद में अभियोजन वापस लेने की अनुमति प्रदान किये जाने की याचना की गई है लेकिन जहां तक अभियोजन के वापस लेने का प्रश्न है न्यायालय द्वारा लोक अभियोजक का आवेदन को यांत्रिक तरीके से स्वीकार नहीं किया जा सकता है। न्यायालय को सर्वप्रथम यह देखना है कि क्या वास्तव में इसमें कोई लोक हित का प्रश्न निहित है। इससे किन उद्देश्यों की पूर्ति होगी। एसीजेएम शक्ति सिंह ने मद्रास उच्च न्यायालय, कर्नाटक, केरल, इलाहाबाद उच्च न्यायालय और सुप्रीम कोर्ट की पांच नजीरों का उल्लेख करते हुए लिखा है कि अभियोजन का मुकदमा केवल लोक कल्याण हेतु परिक्षेत्र में शांति की स्थापना के लिए किया जा सकता है। इस मामले में ऐसा कोई जन हित व लोक हित स्पष्ट रूप से दर्शित नहीं किया गया है।