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तालमेल के अभाव में साफ नहीं हुए नदियों के घाट
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कछला गंगा घाट पर फैली गंदगी। संवाद
- फोटो : BADAUN
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बदायूं। केंद्र सरकार की नमामि गंगे योजना के तहत जिले में गंगा, उसके तटों और आसपास के गांवों की स्थिति सुधारने के लिए पिछले करीब पांच साल से कवायद चल रही है। इसका जिम्मा 27 विभागों को उनमें चल रहे प्रोजेक्ट के जरिए करने को दिया गया है। मगर सरकारी विभागों में तालमेल व जवाबदेही तय न होने से नमामि गंगे योजना परवान नहीं चढ़ सकी। यानी गंगा, उसके तट और आसपास के गांव अभी मैले हैं। गंगा के कछला घाट व सुंदरीकरण के लिए भेजे गए 51 करोड़ के प्रस्ताव की फाइल दो साल से प्रदेश मुख्यालय में पड़ी है। सफाई न होने से कछला व दूसरे घाट अब भी गंदगी व पॉलिथीन से अटे पड़े हैं।
बड़े क्षेत्रफल और खेतिहर इलाके की बाहुल्यता वाले बदायूं जिले में गंगा की लंबाई करीब 135 किमी है। यहां गंगा सदर, सहसवान व दातागंज के पांच ब्लॉक क्षेत्रों से होकर गुजरती है। 250 से ज्यादा गांव गंगा के किनारे बसे हैं। इनमें 41 गांवों को गंगा ग्राम घोषित किया गया है। नमामि गंगे परियोजना के तहत खास जोर इन्हीं गांवों पर दिया जा रहा है। पंचायती राज विभाग को गंगा किनारे के गांवों को पूरी तरह शौच मुक्त बनाने का लक्ष्य दिया गया था।
डीपीआरओ श्रेया मिश्रा का दावा है कि नए बने परिवारों को छोड़कर ओडीएफ का काम पूरा हो चुका है, लेकिन हकीकत इससे उलट दिखती है। गंगा किनारे के सभी गांवों में पंचायती राज विभाग के सफाई कर्मचारियों की तैनाती तक नहीं है। ज्यादातर गांवों में लोग खुले में शौच करने जा रहे हैं। गांवों के निरीक्षण के नाम पर जिला स्तरीय अधिकारी भी कस्बों से सटे गांवों में जाकर कोरम पूरा कर लेते हैं और बाढ़ जैसे मौकों को छोड़कर तटवर्ती गांवों में नहीं जाते।
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मेलों के बाद और मैले हुए घाट
जिले में कछला, अटैना, जरीफपुर गढ़िया और धापड़ प्रमुख गंगा घाट हैं। यहां स्नान पर्वों पर भारी संख्या में श्रद्धालु स्नान करने पहुंचते हैं। ककोड़ा और कछला में तो मेला रहता है। ऐसे में जहां सामान्य दिनों में ही गंगा तट गंदे हैं तो मेलों के बाद स्थिति और बिगड़ गई है। हाल ही में कार्तिक पूर्णिमा पर लगने वाले मेला के बाद ककोड़ा व कछला घाट पर गंदगी की भरमार है।, जिसकी तस्वीरें खूब वायरल हुई हैं।
कछला पर घाट बनाने की योजना ठंडे बस्ते में
बाढ़ खंड की ओर से दो साल पहले नमामि गंगे प्रोजेक्ट के तहत कछला में घाट व सौंदर्यकरण के लिए 51 करोड़ रुपये का प्रोजेक्ट तैयार किया गया था। इसे तभी शासन को भेजा गया था पर आज तक स्वीकृति नहीं मिल सकी है। विभाग के एक्सईएन उमेश चंद्र स्वीकार करते हैं कि दो किमी पक्का घाट बनने पर कछला गंगा तट पर गंदगी की समस्या का समाधान संभव है। उनके विभाग के पास इतना बजट नहीं है जो वह इसे सुंदरीकरण करा सकें।
गंगा किनारे 1700 हेक्टेयर में हो रही जैविक खेती
गंगा के किनारे की जमीन काफी उपजाऊ मानी जाती है। तटवर्ती गांवों में कृषि में रासायनिक खादों का प्रयोग न हो इसके लिए यूपी डास्प ने 2020 में शुरू हुए पहले चरण में जिले के तटवर्ती 68 गांवों में जैविक खेती शुरू की। विभागीय आंकड़ों के मुताबिक इस समय 1700 हेक्टयर में जैविक खेती हो रही है। 85 समूह में 2687 किसान जैविक खेती से जुड़े हुए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि गंगा के तटवर्ती गांवों में खेती में रासायनिक खादों के इस्तेमाल से गंगा में प्रदूषण होता है। नमामि गंगा जैविक खेती परियोजना का जिम्मा शील बायोटेक लिमिटेड संभाल रही है। सहायक परियोजना अधिकारी दिलीप कुमार का कहना है धीरे-धीरे सुधार हो रहा है।
शौचालय के निर्माण को मिली पहली किस्त मेरे खाते में आई थी लेकिन प्रधान का परिजन गुमराह करके निकलवा ले गया। शौचालय नहीं बन पाया है। बच्चे और महिलाएं भी खुले में शौच को जाने क़ो मजबूर हैं7 - करन सिंह, सावंतीनगला
नमामि गंगे योजना के तहत सरकार ने सबसे ज्यादा शौचालय निर्माण पर जोर दिया था लेकिन अफसरों और कर्मचारियों ने ज्यादा गौर नहीं किया। अधिकतर शौचालय नहीं बने हैं या फिर अधूरे पड़े हैं।- नन्ही देवी, सावंतीनगला
गांव का विकास नहीं हो पा रहा है। गलियारों में गंदगी है। पशुओं को भी गलियारों में बांध दिया जाता है। शिकायत करने के बाद भी सुनवाई नहीं होती। गंगा किनारे के गांवों पर ध्यान देने की जरूरत है। मानवेंद्र सिंह, खजुरारा
नमामि गंगे योजना में पिछले गंगा किनारे के गांवों में चबूतरों का निर्माण और खेल मैदान बनाए जाने थे। चबूतरे बने नहीं हैं। निर्माण कार्य भी नहीं चल रहे हैं।- ओमवीर सिंह, नूरगंज
नमामि गंगे योजना के तहत शासन स्तर से कोई अतिरिक्त बजट नहीं भेजा गया है। कई विभागों को उन्हीं के बजट से गंगा किनारे के गांवों में काम व योजना के बिंदुओं को संतृप्त करने के निर्देश दिए गए हैं। विभाग वहां काम करा भी रहे हैं। जैविक खेती को बढ़ावा मिला है। पौधरोपण से लेकर गांवों को शौच मुक्त बनाने का काम तेज हुआ है। - दीपा रंजन, डीएम
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बड़े क्षेत्रफल और खेतिहर इलाके की बाहुल्यता वाले बदायूं जिले में गंगा की लंबाई करीब 135 किमी है। यहां गंगा सदर, सहसवान व दातागंज के पांच ब्लॉक क्षेत्रों से होकर गुजरती है। 250 से ज्यादा गांव गंगा के किनारे बसे हैं। इनमें 41 गांवों को गंगा ग्राम घोषित किया गया है। नमामि गंगे परियोजना के तहत खास जोर इन्हीं गांवों पर दिया जा रहा है। पंचायती राज विभाग को गंगा किनारे के गांवों को पूरी तरह शौच मुक्त बनाने का लक्ष्य दिया गया था।
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डीपीआरओ श्रेया मिश्रा का दावा है कि नए बने परिवारों को छोड़कर ओडीएफ का काम पूरा हो चुका है, लेकिन हकीकत इससे उलट दिखती है। गंगा किनारे के सभी गांवों में पंचायती राज विभाग के सफाई कर्मचारियों की तैनाती तक नहीं है। ज्यादातर गांवों में लोग खुले में शौच करने जा रहे हैं। गांवों के निरीक्षण के नाम पर जिला स्तरीय अधिकारी भी कस्बों से सटे गांवों में जाकर कोरम पूरा कर लेते हैं और बाढ़ जैसे मौकों को छोड़कर तटवर्ती गांवों में नहीं जाते।
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मेलों के बाद और मैले हुए घाट
जिले में कछला, अटैना, जरीफपुर गढ़िया और धापड़ प्रमुख गंगा घाट हैं। यहां स्नान पर्वों पर भारी संख्या में श्रद्धालु स्नान करने पहुंचते हैं। ककोड़ा और कछला में तो मेला रहता है। ऐसे में जहां सामान्य दिनों में ही गंगा तट गंदे हैं तो मेलों के बाद स्थिति और बिगड़ गई है। हाल ही में कार्तिक पूर्णिमा पर लगने वाले मेला के बाद ककोड़ा व कछला घाट पर गंदगी की भरमार है।, जिसकी तस्वीरें खूब वायरल हुई हैं।
कछला पर घाट बनाने की योजना ठंडे बस्ते में
बाढ़ खंड की ओर से दो साल पहले नमामि गंगे प्रोजेक्ट के तहत कछला में घाट व सौंदर्यकरण के लिए 51 करोड़ रुपये का प्रोजेक्ट तैयार किया गया था। इसे तभी शासन को भेजा गया था पर आज तक स्वीकृति नहीं मिल सकी है। विभाग के एक्सईएन उमेश चंद्र स्वीकार करते हैं कि दो किमी पक्का घाट बनने पर कछला गंगा तट पर गंदगी की समस्या का समाधान संभव है। उनके विभाग के पास इतना बजट नहीं है जो वह इसे सुंदरीकरण करा सकें।
गंगा किनारे 1700 हेक्टेयर में हो रही जैविक खेती
गंगा के किनारे की जमीन काफी उपजाऊ मानी जाती है। तटवर्ती गांवों में कृषि में रासायनिक खादों का प्रयोग न हो इसके लिए यूपी डास्प ने 2020 में शुरू हुए पहले चरण में जिले के तटवर्ती 68 गांवों में जैविक खेती शुरू की। विभागीय आंकड़ों के मुताबिक इस समय 1700 हेक्टयर में जैविक खेती हो रही है। 85 समूह में 2687 किसान जैविक खेती से जुड़े हुए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि गंगा के तटवर्ती गांवों में खेती में रासायनिक खादों के इस्तेमाल से गंगा में प्रदूषण होता है। नमामि गंगा जैविक खेती परियोजना का जिम्मा शील बायोटेक लिमिटेड संभाल रही है। सहायक परियोजना अधिकारी दिलीप कुमार का कहना है धीरे-धीरे सुधार हो रहा है।
शौचालय के निर्माण को मिली पहली किस्त मेरे खाते में आई थी लेकिन प्रधान का परिजन गुमराह करके निकलवा ले गया। शौचालय नहीं बन पाया है। बच्चे और महिलाएं भी खुले में शौच को जाने क़ो मजबूर हैं7 - करन सिंह, सावंतीनगला
नमामि गंगे योजना के तहत सरकार ने सबसे ज्यादा शौचालय निर्माण पर जोर दिया था लेकिन अफसरों और कर्मचारियों ने ज्यादा गौर नहीं किया। अधिकतर शौचालय नहीं बने हैं या फिर अधूरे पड़े हैं।- नन्ही देवी, सावंतीनगला
गांव का विकास नहीं हो पा रहा है। गलियारों में गंदगी है। पशुओं को भी गलियारों में बांध दिया जाता है। शिकायत करने के बाद भी सुनवाई नहीं होती। गंगा किनारे के गांवों पर ध्यान देने की जरूरत है। मानवेंद्र सिंह, खजुरारा
नमामि गंगे योजना में पिछले गंगा किनारे के गांवों में चबूतरों का निर्माण और खेल मैदान बनाए जाने थे। चबूतरे बने नहीं हैं। निर्माण कार्य भी नहीं चल रहे हैं।- ओमवीर सिंह, नूरगंज
नमामि गंगे योजना के तहत शासन स्तर से कोई अतिरिक्त बजट नहीं भेजा गया है। कई विभागों को उन्हीं के बजट से गंगा किनारे के गांवों में काम व योजना के बिंदुओं को संतृप्त करने के निर्देश दिए गए हैं। विभाग वहां काम करा भी रहे हैं। जैविक खेती को बढ़ावा मिला है। पौधरोपण से लेकर गांवों को शौच मुक्त बनाने का काम तेज हुआ है। - दीपा रंजन, डीएम