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मोदी जी! ये अफसर तो बिना पैर वाले को भी दौड़ाते हैं
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बरेली। पीएम मोदी ने गरीब किसानों को सम्मान निधि देने की योजना शुरू की है लेकिन सिस्टम उन्हें अब भी हिकारत से देख रहा है। सरकारी दफ्तरों में बैठे लोगों की संवेदनशून्यता का यह हाल है कि दोनों पैर गवां चुके एक दिव्यांग को सम्मान निधि के लिए आठ महीनों से दौड़ा रहे हैं। देवेंद्र नाम के इस युवक का ऑनलाइन फीडिंग में खाता नंबर गलत दर्ज हो गया था, तभी से वह बैंक पासबुक और आधार कार्ड लेकर एक अफसर के बाद दूसरे अफसर के आगे गिड़गिड़ाता घूम रहा है। अफसर हैं कि फिर भी पसीजने को तैयार नहीं हैं।
सीबीगंज के बहजुइया जागीर के रहने वाले देवेंद्र के दोनों पैर पूरी तरह खराब हैं। सिर से मां-बाप का साया भी कब का उठ चुका है। अविवाहित देवेंद्र के आगे-पीछे अब कोई नहीं है। गांव में परचून की छोटी सी दुकान है। तीन बीघा जमीन पर रिश्तेदारों की मदद से खेती होती है। बमुश्किल खाने लायक अनाज होता है। तंगी से परेशान देवेंद्र को जब पता चला कि सरकार किसान सम्मान निधि में छह हजार सालाना की मदद दे रही है तो उन्होंने फरवरी में ऑनलाइन फार्म भरा था। कई महीने इंतजार के बाद खाते में पैसा नहीं आया तो उन्होंने सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटना शुरू कर दिए। एडीओ से लेकर तहसील और कलक्ट्रेट में शायद ही कोई अफसर ऐसा हो, जिसे उन्होंने बैंक पासबुक और आधार कार्ड सहित दूसरे कागज न दिखाए हो। अकाउंट ठीक कराने जैसे मामूली काम के लिए भटक रहे इस दिव्यांग का दर्द कोई महसूस नहीं कर रहा है। शुक्रवार को भी देवेंद्र ने कलक्ट्रेट पहुंचकर कई अफसरों को अपनी व्यथा सुनाई लेकिन उसे फिलहाल आश्वासन ही मिला है।
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सीबीगंज के बहजुइया जागीर के रहने वाले देवेंद्र के दोनों पैर पूरी तरह खराब हैं। सिर से मां-बाप का साया भी कब का उठ चुका है। अविवाहित देवेंद्र के आगे-पीछे अब कोई नहीं है। गांव में परचून की छोटी सी दुकान है। तीन बीघा जमीन पर रिश्तेदारों की मदद से खेती होती है। बमुश्किल खाने लायक अनाज होता है। तंगी से परेशान देवेंद्र को जब पता चला कि सरकार किसान सम्मान निधि में छह हजार सालाना की मदद दे रही है तो उन्होंने फरवरी में ऑनलाइन फार्म भरा था। कई महीने इंतजार के बाद खाते में पैसा नहीं आया तो उन्होंने सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटना शुरू कर दिए। एडीओ से लेकर तहसील और कलक्ट्रेट में शायद ही कोई अफसर ऐसा हो, जिसे उन्होंने बैंक पासबुक और आधार कार्ड सहित दूसरे कागज न दिखाए हो। अकाउंट ठीक कराने जैसे मामूली काम के लिए भटक रहे इस दिव्यांग का दर्द कोई महसूस नहीं कर रहा है। शुक्रवार को भी देवेंद्र ने कलक्ट्रेट पहुंचकर कई अफसरों को अपनी व्यथा सुनाई लेकिन उसे फिलहाल आश्वासन ही मिला है।
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