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Bareilly News: हौसले से बने एथलीट, मुफलिसी ने बना दिया मजदूर

Thu, 29 Oct 2026 11:58 PM IST
बरेली ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, बरेली
संवाद न्यूज एजेंसी, बरेली Updated Thu, 29 Oct 2026 11:58 PM IST
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An athlete forged by determination, reduced to a laborer by poverty.
बरेली। मंजिल तक पहुंचने के लिए हौसले के साथ संसाधनों का मिलना भी जरूरी है। शहर के चक महमूद क्षेत्र निवासी मेहताब हुसैन ने सुनने और बोलने में असमर्थ होने के बावजूद मेहनत के दम पर एथलेटिक्स के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाई। राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में सफलता हासिल की और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी देश का प्रतिनिधित्व किया। इसके बावजूद उनकी आर्थिक तंगी कम नहीं हुईं। अब उन्हें परिवार पालने के लिए मीट फैक्टरी में मजदूरी करनी पड़ रही है।
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अशरफ जहां ने बताया कि बेटे मेहताब की तरह उनकी बेटी भी सुनने और बोलने में असमर्थ थी। बचपन में चक महमूद की तंग गलियों से होते हुए नावल्टी स्थित सांकेतिक विद्यालय तक वह पैदल जाया करते थे। वहां विद्यालय में आयोजित प्रतियोगिताओं में वह दोस्तों से पीछे रह जाते थे। बोलने-सुनने में असमर्थ होने के कारण वह गुस्सैल और जिद्दी हो गए। इसके बाद उन्होंने अपने गुस्सा का इस्तेमाल दौड़ने में किया। स्कूल में आयोजित एथलेटिक्स प्रतियोगिताओं में लगातार बेहतर प्रदर्शन करने के बाद मेहताब ने राज्य स्तरीय प्रतियोगिताओं में हिस्सा लिया।
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फैजाबाद में आयोजित प्रतियोगिता में पहला स्थान हासिल करने पर उनके लिए राष्ट्रीय स्तर पर खेलने का रास्ता खुला। वह बधिर खिलाड़ियों की खेल संस्था ऑल इंडिया स्पोर्ट्स काउंसिल फॉर द डेफ से भी जुड़े। अशरफ जहां के मुताबिक, उन्होंने पश्चिम बंगाल में आयोजित राष्ट्रीय एथलेटिक्स प्रतियोगिता में 400 मीटर रिले में जीत हासिल की थी। वर्ष 1995 से 2000 के बीच उन्होंने कई राज्य और राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में हिस्सा लिया। इसी दौरान उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खेलने का अवसर भी मिला।
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जमीन बेचकर जुटाए रुपये

वर्ष 2000 में ताइवान में आयोजित छठे एशिया पैसिफिक डेफ गेम्स में उन्होंने 5000 मीटर दौड़ में तीसरा स्थान प्राप्त किया। यह उनके लिए बड़ी उपलब्धि थी, लेकिन विदेश में प्रतियोगिता में हिस्सा लेने का खर्च परिवार के लिए भारी पड़ गया। अशरफ जहां ने बताया कि इसके लिए परिवार को जमीन बेचकर 50 हजार रुपये जुटाने पड़े थे। उनके अनुसार, ऑस्ट्रेलिया, इटली, कुवैत, कनाडा और तुर्की में आयोजित प्रतियोगिताओं में भाग लेने के अवसर मिले, लेकिन आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण वह उनमें शामिल नहीं हो सके। खेल में आगे बढ़ने की इच्छा होने के बावजूद संसाधनों की कमी उनके रास्ते में बाधा बनती रही।
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