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मुल्जिम, गवाह, न पुलिस.. कैसे चले अदालत
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बरेली। चुनावी मौसम में सारा निजाम मतदान के लिए कमर कस रहा है। काम काज थम से गए हैं और अदालतें भी इससे अछूती नहीं हैं। पुलिस न होने के चलते न तो मुल्जिम ही अदालत पहुंच रहे हैं और न ही गवाह। इसके चलते सुबह से ही मुकदमों में तारीखें लगने का सिलसिला शुरू हो जाता है।
चुनावी प्रक्रिया के चलते अदालतों का काम काज भी प्रभावित होने लगा है। पुलिस के चुनाव ड्यूटी में लगे होने के चलते जेल से मुल्जिम अदालत नहीं आ पा रहे हैं। यह सिलसिला 6 अप्रैल से शुरू हुआ है और 25 अप्रैल तक चलेगा। जेल से कैदी कोर्ट न आने की वजह से एसएसपी ने जिला जज से जेल में ही रिमांड देने के लिए न्यायाधीश भेजने की प्रार्थना की है। बता दें कि पुलिसकर्मियों की प्रदेश भर में ज्गह-जगह ड्यूटी लगी हुई है। इनमें अदालतों के पैरोकार भी शामिल हैं। इनके न होने से गवाहों के सम्मन न तो बन रहे हैं और न ही तामील हो रहे हैं इसलिए गवाह भी अदालत मेें नहीं आ रहे हैं। जो गवाह अदालत में हाजिर हो सकते थे, वह भी चुनाव लड़ाने लगे। वहीं, जेल से बाहर मुल्जिम भी अदालत का रुख नहीं कर रहे। उनके वकील अर्जी भेजकर हाजिरी माफ करा लेते हैं। सुबह से तारीखें लगने का सिलसिला शुरू होता है और दोपहर तक अदालतों में सन्नाटा पसर जाता है। अधिवक्ता मिलन गुप्ता कहते हैं किसी भी हालत में न्यायालय से सबंधित पुलिस का इस्तेमाल चुनाव में नहीं होना चाहिए। इसकी वजह से अदालत का काम प्रभावित होता है और जमानतों की सुनवाई में भी परेशानी होती है। इस मामले को चुनाव आयोग भेजा जाना चाहिए। अदालती काम एक बार पटरी से उतर जाए तो तीन महीने में ठीक हो पाता है। अधिवक्ता विनोद यादव कहते हैं कि यह बात निगरानी समिति की बैठक में उठानी चाहिए। इतने अर्से तक मुल्जिम जेल में रहेंगे और न्याय में इस देरी के लिए कौन जिम्मेदार होगा।
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चुनावी प्रक्रिया के चलते अदालतों का काम काज भी प्रभावित होने लगा है। पुलिस के चुनाव ड्यूटी में लगे होने के चलते जेल से मुल्जिम अदालत नहीं आ पा रहे हैं। यह सिलसिला 6 अप्रैल से शुरू हुआ है और 25 अप्रैल तक चलेगा। जेल से कैदी कोर्ट न आने की वजह से एसएसपी ने जिला जज से जेल में ही रिमांड देने के लिए न्यायाधीश भेजने की प्रार्थना की है। बता दें कि पुलिसकर्मियों की प्रदेश भर में ज्गह-जगह ड्यूटी लगी हुई है। इनमें अदालतों के पैरोकार भी शामिल हैं। इनके न होने से गवाहों के सम्मन न तो बन रहे हैं और न ही तामील हो रहे हैं इसलिए गवाह भी अदालत मेें नहीं आ रहे हैं। जो गवाह अदालत में हाजिर हो सकते थे, वह भी चुनाव लड़ाने लगे। वहीं, जेल से बाहर मुल्जिम भी अदालत का रुख नहीं कर रहे। उनके वकील अर्जी भेजकर हाजिरी माफ करा लेते हैं। सुबह से तारीखें लगने का सिलसिला शुरू होता है और दोपहर तक अदालतों में सन्नाटा पसर जाता है। अधिवक्ता मिलन गुप्ता कहते हैं किसी भी हालत में न्यायालय से सबंधित पुलिस का इस्तेमाल चुनाव में नहीं होना चाहिए। इसकी वजह से अदालत का काम प्रभावित होता है और जमानतों की सुनवाई में भी परेशानी होती है। इस मामले को चुनाव आयोग भेजा जाना चाहिए। अदालती काम एक बार पटरी से उतर जाए तो तीन महीने में ठीक हो पाता है। अधिवक्ता विनोद यादव कहते हैं कि यह बात निगरानी समिति की बैठक में उठानी चाहिए। इतने अर्से तक मुल्जिम जेल में रहेंगे और न्याय में इस देरी के लिए कौन जिम्मेदार होगा।
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