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वैचारिक स्तर से ही जीती जा सकती है संस्कृति रक्षा की लड़ाई
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बरेली। प्रज्ञा प्रवाह के राष्ट्रीय सह संयोजक श्रीकांत काटदरे ने कहा कि संपूर्ण ब्रह्मांड में एक ही तत्व विद्यमान है। वह तत्व प्रत्येक मानव में है। भारतीय संस्कृति को स्थापित करने की लड़ाई वैचारिक स्तर पर चल रही है, इसे वैचारिक द्वंद्व से ही जीता जा सकता है।
एमजेपी रुहेलखंड विश्वविद्यालय के बीएड संकाय सभागार में शुक्रवार को आयोजित ‘भारतीय परंपरा में सामाजिक समावेशन’ नामक गोष्ठी को संबोधित करते हुए काटदरे ने कहा कि एक हजार साल तक भारत शक्ति संपन्न था। भारत ने किसी देश पर कभी आक्रमण नहीं किया। यही हमारी संस्कृति है। इसको कार्य व्यवहार में उतारना चाहिए। उन्होंने कहा कि अंग्रेजों ने पाश्चात्य शिक्षा लाकर भारत के मन को बदलने का प्रयास किया, लेकिन वह इसमें सफल नहीं हो पाए क्योंकि भारतीय संस्कृति की जड़ें बहुत गहरी हैं। विशिष्ट अतिथि डॉ. विनय खंडेलवाल और डॉ. शैलेंद्र सिंह ने भी विचार रखे। विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. अनिल शुक्ल ने कहा कि भारतीय समाज समरसता का प्रतीक है, लेकिन प्रज्ञा का स्थान आधुनिकता और भौतिकता ने ले लिया है। कार्यक्रम में डॉ. मीनाक्षी द्विवेदी, डॉ. रामबाबू, प्रो. तूलिका, प्रो. संतोष अरोरा, प्रो. रश्मि रंजन, डॉ. जितेंद्र, डॉ. प्रवीण तिवारी आदि मौजूद थे। संचालन डॉ. विमल ने किया। स्वागत भाषण प्रो. एसएन पांडेय ने दिया।
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एमजेपी रुहेलखंड विश्वविद्यालय के बीएड संकाय सभागार में शुक्रवार को आयोजित ‘भारतीय परंपरा में सामाजिक समावेशन’ नामक गोष्ठी को संबोधित करते हुए काटदरे ने कहा कि एक हजार साल तक भारत शक्ति संपन्न था। भारत ने किसी देश पर कभी आक्रमण नहीं किया। यही हमारी संस्कृति है। इसको कार्य व्यवहार में उतारना चाहिए। उन्होंने कहा कि अंग्रेजों ने पाश्चात्य शिक्षा लाकर भारत के मन को बदलने का प्रयास किया, लेकिन वह इसमें सफल नहीं हो पाए क्योंकि भारतीय संस्कृति की जड़ें बहुत गहरी हैं। विशिष्ट अतिथि डॉ. विनय खंडेलवाल और डॉ. शैलेंद्र सिंह ने भी विचार रखे। विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. अनिल शुक्ल ने कहा कि भारतीय समाज समरसता का प्रतीक है, लेकिन प्रज्ञा का स्थान आधुनिकता और भौतिकता ने ले लिया है। कार्यक्रम में डॉ. मीनाक्षी द्विवेदी, डॉ. रामबाबू, प्रो. तूलिका, प्रो. संतोष अरोरा, प्रो. रश्मि रंजन, डॉ. जितेंद्र, डॉ. प्रवीण तिवारी आदि मौजूद थे। संचालन डॉ. विमल ने किया। स्वागत भाषण प्रो. एसएन पांडेय ने दिया।
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