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अपनी आजादी को हम हरगिज भुला सकते नहीं...
बाराबंकी/अमर उजाला ब्यूरो
Updated Thu, 13 Aug 2015 10:55 PM IST
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रगों में दौड़ते खून का कतरा-कतरा देश के नाम करने वाले अवध क्षेत्र के जिला बाराबंकी के वीर सेनानियों की गौरवगाथा अविस्मरणीय है। अंग्रेजों से लोहा लेने की नींव सन 1764 में ही पड़ चुकी थी। बहादुरी, देशभक्ति और वतन के प्रेम से लबरेज जिले के इन लड़ाकुओं ने अंग्रेजी सेना को ऐसा छकाया कि सेना के लिए कदम पीछे खींचना मजबूरी बन गया। जात-पात और न मजहब, मकसद एक, देश को अंग्रेजों की हुकूमत से मुक्ति दिलाना। जान गई तो परवाह नहीं, दो शहीद होते तो दस और शामिल हो जाते।
अंग्रेजी फौज लिया था लोहा
सन 1764 में अवध नवाब के शासनकाल के दौरान बक्सर युद्ध में नवाब शुजाउद्दौला के साथ बाराबंकी के सभी जाति के सिपाहियों ने अंग्रेजी फौज से एक साथ लोहा लिया था। नवाब वाजिद अली शाह के शासनकाल में रामनगर, देवा, मसौली के सिपाही अवध की शाही सेना में अच्छे पदों पर थे।
अंग्रेजों ने सन 1856 ईसवी में अवध को ब्रिटिश साम्राज्य के अधीन कर लिया, जिससे बाराबंकी जिले के लोग गुस्से से बौखला उठे। सन 1857 के दौरान दरियाबाद बाराबंकी का मुख्यालय था।
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अंग्रेजी सेना की पांचवीं अवध अस्थायी फौजी टुकड़ी दरियाबाद में रहती थी। अंग्रेजों की बांटो और राज करो के खेल की भनक 7 जून 1857 को हैदरगढ़ के मंगली नामक सिपाही को लगी, तो एकजुट होकर सिपाहियों ने अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया।
8 जून 1857 को अंग्रेजों ने सिपाहियों को खजाने के साथ लखनऊ कूच करने का आदेश दिया। पर अभी गाडिय़ां फौजी सीमा पार न कर सकीं थी कि गोलियां चलने लगीं। 5वीं अवध अस्थायी टुकड़ी ने खजाने को कब्जे में लेकर दो अंगे्रज अफसरों को मार डाला। तीसरे ने भयवश षडय़ंत्र का खुलासा किया।
इस विद्रोह के बाद यूरोपियन लड़ाकुओं और रेजीडेंट अफसर ने बंकी दरियाबाद का रास्ता रोक दिया। उनके पास कुछ तोपें थीं, तब तोपखाना बहुत ही खतरनाक हथियार माना जाता था। इसकी परवाह न करते हुए दरियाबाद, बंकी, मसौली, निन्दूरा, सिद्घौर आदि क्षेत्रों के किसानों ने दरियाबाद को चारों तरफ से घेर लिया। यह सभी तीर धनुष, भाले, तलवार व कुल्हाड़ी से लैस थे, एकाध के पास ही पिस्तौल थी।
अंग्रेजों के उच्चकोटि के हथियारों के सामने किसान पूरे दो दिन लड़ते रहे। तमाम शहीद हुए पर अंग्रेज को घेरने में यह सफल रहे। किसानों की सेना ने अंग्रेजी फौज के 2 सौ सिपाहियों को मौत के घाट उतार दिया। 30 जून 1857 को चिनहट की लड़ाई को जीतने के बाद लखनऊ व पूरे अवध का हिस्सा अंग्रेजी हुकूमत से आजाद हो गया।
लखनऊ रेजीडेंसी की लंबी लड़ाई 25 नवंबर 1857 तक चली। किसान योद्धाओं की हिम्मत के आगे अंग्रेजों को लखनऊ व अवध छोडना पड़ा। 22 फरवरी 1858 को इंग्लैंड से मंगाई गई फौज व तोपखानों के बल पर अंग्रेजों ने फिर लखनऊ पर कब्जा कर लिया। लखनऊ के हाथ से निकलने पर भी बाराबंकी आजाद रहा। आजादी के इस संघर्ष में चहलारी नरेश बलभद्र सिंह ने रणक्षेत्र में अंग्रेजों को भागने को विवश किया।
नाम गुम न जाए आजादी के इस दीवाने का
भारत मां को गुलामी की बेडिय़ों से मुक्त कराने के लिए संघर्ष करने वाले वीर सपूत कोअपनी हीऌ धरती पर भुला दिया गया है। असंद्रा के गांव शेषपुर दामोदर में 14 अगस्त 1910 को जन्मे बाबा उमाशंकर मिश्र उर्फ प्रेम पुजारी ने देश को गुलामी की जंजीरों से मुक्त कराने मे अपनी पूरी जवानी कुर्बान कर दी थी।
नौ अगस्त 1942 से 28 अगस्त 1943 तक चौदह माह तक कठोर कारावास की सजा काटी तथा महात्मा गांधी व कांग्रेस द्वारा देश की आजादी के लिए लड़े गए प्रत्येक संघर्ष में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया तथा पूरे जीवन अविवाहित रहकर देश की सेवा करते रहे। देश की आजादी के बाद पहले आम चुनाव में विधायक चुने जाने पर क्षेत्र में विकास की अलख जगाने वाले स्वतंत्रता संग्राम सेनानी बाबा उमाशंकर के पैतृक गांव तक पहुंचने के लिए खड़ंजा मार्ग तक नहीं बनाया जा सका है और न ही उनकी स्मृति के लिए गांव में कोई स्मारक व प्रतीक चिन्ह मौजूद है।
नरम-गरम दोनों पक्षों ने शामिल रहे सेनानी
स्थानीय स्वतंत्रता के नायकों का मनोबल बढ़ाने के लिए यहां पर अहिंसा के पुजारी महात्मा गांधी व नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने आकर आजादी के मतवालों को जो संदेश दिया था, उससे नरम और गरम दोनों पक्षों ने आजादी में अहम भूमिका निभाई।
अहिंसा के पुजारी महात्मा गांधी फजर्लुरहमान पार्क पहुंचे तो अंग्रेजों भारत छोड़ो के नारे के बीच उनका स्वागत हुआ।
नेताजी सुभाष चंद्र बोस दरियाबाद में गुप्त सभा कर उग्र आंदोलन की ज्वाला भड़का गए। शायद यही कारण था कि जिले के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने दोनों की बात मानी।
चंद्रभूषण शुक्ल, गोकरन, लल्ला भइया, पंडित ज्वाला प्रसाद मिश्र, मथुरा प्रसाद श्रीवास्तव, चहलारी नरेश राजा बलभद्र सिंह, गया प्रसाद ने बिंदौरा रेलवे स्टेशन और पैंतेपुर रेलवे स्टेशन को आग के हवाले कर जमकर लूट पाट की तो अंग्रेजों के छक्के छूट गए।
11 अगस्त 1942
जिले के एक मात्र गर्वनमेंट हाईस्कूल के लड़कों ने इंटरवल का घंटा बजा कर छुट्टी कर दी और सड़क पर निकल पड़े। नारा लगाते हुए जुलूस सतरिख नाके की तरफ बढ़ चला। जब जुलूस नाके पर पहुंचा तो शहर कोतवाल साबिर अली ने जुलूस रोकने का हुक्म दिया।
जुलूस रुका, नारे और जोर से लगने लगे। जुलूस के आगे जय नारायण श्रीवास्तव गोपाली, हरी सिंह वर्मा, बच्चूलाल, गिरजा शंकर शुक्ल, गिरीश चंद्र श्रीवास्तव, रामफेर द्विवेदी, शशी भूषण घोष, विनय भूषण घोष आदि थे। गोपाली और हरी सिंह से हार्डो की तकरार हुई।
हार्डो कह रहा था जुलूस तितर-बितर करो नहीं तो लाठी से पिटवाऊंगा, गोली मार दूंगा। डिप्टी कमिश्नर आर. दयाल ने कहा जाओ, जुलूस निकालो, कहां तक जाओगे, जवाब था कि सिटी स्कूल तक। दयाल साहब ने कहा कि जाओ कुछ तोड़-फोड़ न करना, वरना मैं पीटूंगा। जुलूस चल दिया, गांधी, नेहरू, भारत माता की जय के साथ जुलूस सिटी कालेज पहुंच गया।
इन्होंने किया संघर्ष
रामहित भेलसर बाजार, रामाधीन कोठी, रामानंद आरएसघाट, रामेश्वर सफदरगंज, रामेश्वर प्रसाद हेतमपुर फतेहपुर, रियासत अली सफदरगंज, रूप नारायन बेहटा सफदरगंज, लच्छूू बांसा सफदरगंज, लतीफुर्रहमान रुदौली, लक्ष्मण प्रसाद फतेहपुर, शत्रुघ्न प्रसाद वर्मा नानमऊ, शिवगुलाम वर्मा मलूकपुर, शिवचंद कानून गोयान, शिवचरन कुर्सी, शिवदयाल सरांय गोपी, शिवनंदन प्रसाद नवाबगंज, विशेषर दयाल छुलिहापाना, विष्णुदयाल रामपुर, विश्राम सिंह रामनगर, वेदनाथ पवैयाबाद, शची भूषण घोष सरावगी टोला, विश्वनाथ रामपुर, विशंभर दयाल त्रिलोकपुर, लक्ष्मीनरायन टिल्लू कटरा टोला, लायकुल हसन नवाबगंज, लालता प्रसाद मोहम्मदपुर, शिवरतन, शिवराम, शिवशंकर, शिव सहाय, शीतला प्रसाद, सुबराती, शेख बहादुर, शिवनंदन, शिवनारायन, सरजू प्रसाद, सर्वजीत सिंह, श्रीराम, राम तिवारी, अब्दुल रहमान किदवाई, सरजूदास, श्रीकृष्ण, सीताराम, सूर्यप्रताप, सूर्यबली, साहबदीन, सादिक, संतराम, हजारी लाल, स्वामी शिवानंद, हबीब अहमद, रफी अहमद किदवई, राधेलाल, राजाराम, राम अवतार, राम किशोर, रामदास, रामचरण, रामटहल, रामदयाल, रामगोपाल आदि रणबाकुरों ने स्वतंत्रता के लिए संघर्ष किया।
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अंग्रेजी फौज लिया था लोहा
सन 1764 में अवध नवाब के शासनकाल के दौरान बक्सर युद्ध में नवाब शुजाउद्दौला के साथ बाराबंकी के सभी जाति के सिपाहियों ने अंग्रेजी फौज से एक साथ लोहा लिया था। नवाब वाजिद अली शाह के शासनकाल में रामनगर, देवा, मसौली के सिपाही अवध की शाही सेना में अच्छे पदों पर थे।
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अंग्रेजों ने सन 1856 ईसवी में अवध को ब्रिटिश साम्राज्य के अधीन कर लिया, जिससे बाराबंकी जिले के लोग गुस्से से बौखला उठे। सन 1857 के दौरान दरियाबाद बाराबंकी का मुख्यालय था।
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अंग्रेजी सेना की पांचवीं अवध अस्थायी फौजी टुकड़ी दरियाबाद में रहती थी। अंग्रेजों की बांटो और राज करो के खेल की भनक 7 जून 1857 को हैदरगढ़ के मंगली नामक सिपाही को लगी, तो एकजुट होकर सिपाहियों ने अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया।
8 जून 1857 को अंग्रेजों ने सिपाहियों को खजाने के साथ लखनऊ कूच करने का आदेश दिया। पर अभी गाडिय़ां फौजी सीमा पार न कर सकीं थी कि गोलियां चलने लगीं। 5वीं अवध अस्थायी टुकड़ी ने खजाने को कब्जे में लेकर दो अंगे्रज अफसरों को मार डाला। तीसरे ने भयवश षडय़ंत्र का खुलासा किया।
इस विद्रोह के बाद यूरोपियन लड़ाकुओं और रेजीडेंट अफसर ने बंकी दरियाबाद का रास्ता रोक दिया। उनके पास कुछ तोपें थीं, तब तोपखाना बहुत ही खतरनाक हथियार माना जाता था। इसकी परवाह न करते हुए दरियाबाद, बंकी, मसौली, निन्दूरा, सिद्घौर आदि क्षेत्रों के किसानों ने दरियाबाद को चारों तरफ से घेर लिया। यह सभी तीर धनुष, भाले, तलवार व कुल्हाड़ी से लैस थे, एकाध के पास ही पिस्तौल थी।
अंग्रेजों के उच्चकोटि के हथियारों के सामने किसान पूरे दो दिन लड़ते रहे। तमाम शहीद हुए पर अंग्रेज को घेरने में यह सफल रहे। किसानों की सेना ने अंग्रेजी फौज के 2 सौ सिपाहियों को मौत के घाट उतार दिया। 30 जून 1857 को चिनहट की लड़ाई को जीतने के बाद लखनऊ व पूरे अवध का हिस्सा अंग्रेजी हुकूमत से आजाद हो गया।
लखनऊ रेजीडेंसी की लंबी लड़ाई 25 नवंबर 1857 तक चली। किसान योद्धाओं की हिम्मत के आगे अंग्रेजों को लखनऊ व अवध छोडना पड़ा। 22 फरवरी 1858 को इंग्लैंड से मंगाई गई फौज व तोपखानों के बल पर अंग्रेजों ने फिर लखनऊ पर कब्जा कर लिया। लखनऊ के हाथ से निकलने पर भी बाराबंकी आजाद रहा। आजादी के इस संघर्ष में चहलारी नरेश बलभद्र सिंह ने रणक्षेत्र में अंग्रेजों को भागने को विवश किया।
नाम गुम न जाए आजादी के इस दीवाने का
भारत मां को गुलामी की बेडिय़ों से मुक्त कराने के लिए संघर्ष करने वाले वीर सपूत कोअपनी हीऌ धरती पर भुला दिया गया है। असंद्रा के गांव शेषपुर दामोदर में 14 अगस्त 1910 को जन्मे बाबा उमाशंकर मिश्र उर्फ प्रेम पुजारी ने देश को गुलामी की जंजीरों से मुक्त कराने मे अपनी पूरी जवानी कुर्बान कर दी थी।
नौ अगस्त 1942 से 28 अगस्त 1943 तक चौदह माह तक कठोर कारावास की सजा काटी तथा महात्मा गांधी व कांग्रेस द्वारा देश की आजादी के लिए लड़े गए प्रत्येक संघर्ष में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया तथा पूरे जीवन अविवाहित रहकर देश की सेवा करते रहे। देश की आजादी के बाद पहले आम चुनाव में विधायक चुने जाने पर क्षेत्र में विकास की अलख जगाने वाले स्वतंत्रता संग्राम सेनानी बाबा उमाशंकर के पैतृक गांव तक पहुंचने के लिए खड़ंजा मार्ग तक नहीं बनाया जा सका है और न ही उनकी स्मृति के लिए गांव में कोई स्मारक व प्रतीक चिन्ह मौजूद है।
नरम-गरम दोनों पक्षों ने शामिल रहे सेनानी
स्थानीय स्वतंत्रता के नायकों का मनोबल बढ़ाने के लिए यहां पर अहिंसा के पुजारी महात्मा गांधी व नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने आकर आजादी के मतवालों को जो संदेश दिया था, उससे नरम और गरम दोनों पक्षों ने आजादी में अहम भूमिका निभाई।
अहिंसा के पुजारी महात्मा गांधी फजर्लुरहमान पार्क पहुंचे तो अंग्रेजों भारत छोड़ो के नारे के बीच उनका स्वागत हुआ।
नेताजी सुभाष चंद्र बोस दरियाबाद में गुप्त सभा कर उग्र आंदोलन की ज्वाला भड़का गए। शायद यही कारण था कि जिले के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने दोनों की बात मानी।
चंद्रभूषण शुक्ल, गोकरन, लल्ला भइया, पंडित ज्वाला प्रसाद मिश्र, मथुरा प्रसाद श्रीवास्तव, चहलारी नरेश राजा बलभद्र सिंह, गया प्रसाद ने बिंदौरा रेलवे स्टेशन और पैंतेपुर रेलवे स्टेशन को आग के हवाले कर जमकर लूट पाट की तो अंग्रेजों के छक्के छूट गए।
11 अगस्त 1942
जिले के एक मात्र गर्वनमेंट हाईस्कूल के लड़कों ने इंटरवल का घंटा बजा कर छुट्टी कर दी और सड़क पर निकल पड़े। नारा लगाते हुए जुलूस सतरिख नाके की तरफ बढ़ चला। जब जुलूस नाके पर पहुंचा तो शहर कोतवाल साबिर अली ने जुलूस रोकने का हुक्म दिया।
जुलूस रुका, नारे और जोर से लगने लगे। जुलूस के आगे जय नारायण श्रीवास्तव गोपाली, हरी सिंह वर्मा, बच्चूलाल, गिरजा शंकर शुक्ल, गिरीश चंद्र श्रीवास्तव, रामफेर द्विवेदी, शशी भूषण घोष, विनय भूषण घोष आदि थे। गोपाली और हरी सिंह से हार्डो की तकरार हुई।
हार्डो कह रहा था जुलूस तितर-बितर करो नहीं तो लाठी से पिटवाऊंगा, गोली मार दूंगा। डिप्टी कमिश्नर आर. दयाल ने कहा जाओ, जुलूस निकालो, कहां तक जाओगे, जवाब था कि सिटी स्कूल तक। दयाल साहब ने कहा कि जाओ कुछ तोड़-फोड़ न करना, वरना मैं पीटूंगा। जुलूस चल दिया, गांधी, नेहरू, भारत माता की जय के साथ जुलूस सिटी कालेज पहुंच गया।
इन्होंने किया संघर्ष
रामहित भेलसर बाजार, रामाधीन कोठी, रामानंद आरएसघाट, रामेश्वर सफदरगंज, रामेश्वर प्रसाद हेतमपुर फतेहपुर, रियासत अली सफदरगंज, रूप नारायन बेहटा सफदरगंज, लच्छूू बांसा सफदरगंज, लतीफुर्रहमान रुदौली, लक्ष्मण प्रसाद फतेहपुर, शत्रुघ्न प्रसाद वर्मा नानमऊ, शिवगुलाम वर्मा मलूकपुर, शिवचंद कानून गोयान, शिवचरन कुर्सी, शिवदयाल सरांय गोपी, शिवनंदन प्रसाद नवाबगंज, विशेषर दयाल छुलिहापाना, विष्णुदयाल रामपुर, विश्राम सिंह रामनगर, वेदनाथ पवैयाबाद, शची भूषण घोष सरावगी टोला, विश्वनाथ रामपुर, विशंभर दयाल त्रिलोकपुर, लक्ष्मीनरायन टिल्लू कटरा टोला, लायकुल हसन नवाबगंज, लालता प्रसाद मोहम्मदपुर, शिवरतन, शिवराम, शिवशंकर, शिव सहाय, शीतला प्रसाद, सुबराती, शेख बहादुर, शिवनंदन, शिवनारायन, सरजू प्रसाद, सर्वजीत सिंह, श्रीराम, राम तिवारी, अब्दुल रहमान किदवाई, सरजूदास, श्रीकृष्ण, सीताराम, सूर्यप्रताप, सूर्यबली, साहबदीन, सादिक, संतराम, हजारी लाल, स्वामी शिवानंद, हबीब अहमद, रफी अहमद किदवई, राधेलाल, राजाराम, राम अवतार, राम किशोर, रामदास, रामचरण, रामटहल, रामदयाल, रामगोपाल आदि रणबाकुरों ने स्वतंत्रता के लिए संघर्ष किया।