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ईवीएम से निकला मंत्रियों के खिलाफ वाला जनादेश
अमर उजाला ब्यूरो/बाराबंकी
Updated Sat, 11 Mar 2017 10:18 PM IST
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ईवीएम
- फोटो : amar ujala
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ईवीएम से निकला जनादेश जिले के दिग्गज राजनेेताओं को आइना दिखा दिया गया। दशकों बाद जिले में ऐसा परिणाम आया कि सभी राजनैतिक छत्रपों को हाशिए पर लाकर खड़ा कर दिया। भगवा रंग में रंगा सपा के गढ़ में अब अगला छत्रप कौन होगा, यह आने वाला समय बताएगा।
इतना जरूर है कि 2002 में यहां से मुख्यमंत्री राजनाथ सिंह के चुनाव लड़ने के साथ चार सीटें भाजपा की झोली में गई थीं, पर मोदी लहर ने पांच सीटें जीतकर उसे भी पछाड़ दिया। इस बार जो परिणाम सामने आए हैं उसमें जीत के अंतर से साफ है कि जनता ने सत्ता की कारगुजारियों से ऊब कर हराने के लिए आक्रोश में मतदान किया हो।
शनिवार को विधानसभा चुनाव के जो परिणाम सामने आए, उसने बड़े-बड़ों की जमीन खिसका दी। दरियाबाद से छह बार विधायक रहे राजा राजीव कुमार सिंह को सर्वाधिक मतों से शर्मनाक हार का सामना करना पड़ा। उन्हें जिसने पटकनी दी वह जिले का सबसे कम उम्र का विधायक ही नहीं बना बल्कि पहली बार विधानसभा चुनाव में इस युवा ने प्रजा को साथ लेकर राजा को धूल चटा दी।
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यही हाल रामनगर विधानसभा क्षेत्र में रहा, यहां भी जिले के राजनैतिक छत्रप में स्थापित अरविंद कुमार सिंह गोप को राजनीतिक अखाड़े में पहली बार ताल ठोकने वाले शरद अवस्थी ने चित कर दिया। तीसरे मंत्री फरीद महफूज किदवई भले ही कई बार विधायक चुने गए हों पर इस बार उन्हें पड़ोसी जिले से ऐन वक्त पर चुनाव मैदान में उतरे साकेंद्र वर्मा से मुंह की खानी पड़ी।
ये तीनों मंत्री पूरे पांच साल तक जिले में राजनैतिक छत्रप के रूप में अपनी ताकत दिखाते रहे। जिले में राजनीतिक जमीन तैयार कर अपनी मजबूत दखल रखने वाले राज्यसभा सदस्य पीएल पुनिया ने अपने बेटे तनुज पुनिया को सपा के सेटिंग विधायक का टिकट कटवाकर चुनाव मैदान में उतारा था। पर जनता ने इन्हें भी नकार दिया।
इसी तरह लंबे समय तक राजनीति में जिले के सबसे ताकतवर नेता के रूप में स्थापित रहे बेनी प्रसाद वर्मा के फैसले और आह्वान को जनता ने नकार कर बता दिया कि अब सिर्फ मठाधीसी में लिए गए फैसलों को थोपना बर्दाश्त नहीं है।
सपा से टिकट न मिलने के बाद अपने गुर्गों के जरिए बसपा को जिताने की जो चालें चली थीं, उसका परिणाम यह रहा कि 2012 में सभी सीटों पर बसपा दूसरे स्थान पर थी, पर इस बार उसे पांच सीटों पर तीसरे पर लुढ़क गई।
जनता ने पहली बार जिले में जिन लोगों के सिर पर जीत का सेहरा बांधा उनमें सिर्फ जनता और पार्टी का साथ था, किसी छत्रप या दिग्गज का एहसान नहीं लिया। यही कारण है कि आने वाले समय में दशकों बाद सत्ता का छत्रप कौन होगा और पुराने दिग्गजों का क्या हश्र होगा इस पर सबकी नजर गड़ी हुई है।
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इतना जरूर है कि 2002 में यहां से मुख्यमंत्री राजनाथ सिंह के चुनाव लड़ने के साथ चार सीटें भाजपा की झोली में गई थीं, पर मोदी लहर ने पांच सीटें जीतकर उसे भी पछाड़ दिया। इस बार जो परिणाम सामने आए हैं उसमें जीत के अंतर से साफ है कि जनता ने सत्ता की कारगुजारियों से ऊब कर हराने के लिए आक्रोश में मतदान किया हो।
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शनिवार को विधानसभा चुनाव के जो परिणाम सामने आए, उसने बड़े-बड़ों की जमीन खिसका दी। दरियाबाद से छह बार विधायक रहे राजा राजीव कुमार सिंह को सर्वाधिक मतों से शर्मनाक हार का सामना करना पड़ा। उन्हें जिसने पटकनी दी वह जिले का सबसे कम उम्र का विधायक ही नहीं बना बल्कि पहली बार विधानसभा चुनाव में इस युवा ने प्रजा को साथ लेकर राजा को धूल चटा दी।
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यही हाल रामनगर विधानसभा क्षेत्र में रहा, यहां भी जिले के राजनैतिक छत्रप में स्थापित अरविंद कुमार सिंह गोप को राजनीतिक अखाड़े में पहली बार ताल ठोकने वाले शरद अवस्थी ने चित कर दिया। तीसरे मंत्री फरीद महफूज किदवई भले ही कई बार विधायक चुने गए हों पर इस बार उन्हें पड़ोसी जिले से ऐन वक्त पर चुनाव मैदान में उतरे साकेंद्र वर्मा से मुंह की खानी पड़ी।
ये तीनों मंत्री पूरे पांच साल तक जिले में राजनैतिक छत्रप के रूप में अपनी ताकत दिखाते रहे। जिले में राजनीतिक जमीन तैयार कर अपनी मजबूत दखल रखने वाले राज्यसभा सदस्य पीएल पुनिया ने अपने बेटे तनुज पुनिया को सपा के सेटिंग विधायक का टिकट कटवाकर चुनाव मैदान में उतारा था। पर जनता ने इन्हें भी नकार दिया।
इसी तरह लंबे समय तक राजनीति में जिले के सबसे ताकतवर नेता के रूप में स्थापित रहे बेनी प्रसाद वर्मा के फैसले और आह्वान को जनता ने नकार कर बता दिया कि अब सिर्फ मठाधीसी में लिए गए फैसलों को थोपना बर्दाश्त नहीं है।
सपा से टिकट न मिलने के बाद अपने गुर्गों के जरिए बसपा को जिताने की जो चालें चली थीं, उसका परिणाम यह रहा कि 2012 में सभी सीटों पर बसपा दूसरे स्थान पर थी, पर इस बार उसे पांच सीटों पर तीसरे पर लुढ़क गई।
जनता ने पहली बार जिले में जिन लोगों के सिर पर जीत का सेहरा बांधा उनमें सिर्फ जनता और पार्टी का साथ था, किसी छत्रप या दिग्गज का एहसान नहीं लिया। यही कारण है कि आने वाले समय में दशकों बाद सत्ता का छत्रप कौन होगा और पुराने दिग्गजों का क्या हश्र होगा इस पर सबकी नजर गड़ी हुई है।