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बंटवारे की पीड़ा से पुरुषार्थ तक: संघर्ष से सिंधी समाज ने गढ़ी पहचान

Sat, 20 Jun 2026 10:40 PM IST
लखनऊ ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, बाराबंकी
संवाद न्यूज एजेंसी, बाराबंकी Updated Sat, 20 Jun 2026 10:40 PM IST
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From the Agony of Partition to Self-Reliance: The Sindhi Community Forged Its Identity Through Struggle
जीतेश कान्त पांडेय
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अयोध्या। 1947 के विभाजन ने सिंधी समाज को गहरा घाव दिया था। लोग घर, कारोबार और संपत्ति छोड़कर भारत आए। धर्म और देश के प्रति आस्था के कारण उन्होंने सब कुछ पीछे छोड़ दिया। यहां आकर रोटी, कपड़ा और मकान उनके लिए बड़ी चुनौती थे। संघर्ष और मेहनत के दम पर समाज ने अपनी अलग पहचान बनाई। विभाजन के समय करीब डेढ़ हजार सिंधी अयोध्या आए थे। अधिकतर लोग कैंट क्षेत्र के सरकारी शिविरों में रहे। आज जिले में सिंधी समाज की आबादी 10 हजार से अधिक है। इनमें लगभग पांच हजार लोग रामनगर कॉलोनी में रहते हैं। जिले में 16 पंचायतें कार्यरत हैं, जिनके 16 मुखिया हैं। सिंधी सेंट्रल पंचायत इनके ऊपर कार्य करती है। इसके प्रमुख ओम प्रकाश अंदानी और पवन जीवानी हैं। समाज की बैठकें तीन पंचायत भवनों और धर्मशालाओं में होती हैं। जिले में लगभग 12 मंदिर और गुरुद्वारे भी संचालित हैं।

70 फीसदी लोग करते हैंखुद का कारोबार
सिंधी समाज का मुख्य व्यवसाय कपड़ा, ईंट-भट्ठा, कोयला, किराना और ड्राई फ्रूट है। बड़ी कंपनियों की फ्रेंचाइजी से भी लोग जुड़े हैं। करीब 70 फीसदी लोग खुद का कारोबार करते हैं। 30 फीसदी निजी क्षेत्र में कार्यरत हैं। समाज का झुकाव सरकारी नौकरियों की तुलना में व्यापार की ओर अधिक रहा है। हालांकि, अब नई पीढ़ी दिल्ली, मुंबई जैसे बड़े शहरों में निजी क्षेत्र में नौकरी कर रही है।
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विभाजन के समय आए लोगों में अब केवल दो-तीन लोग ही जीवित हैं। इनमें 92 वर्षीय सरस्वती देवी शामिल हैं। वह पति चंचल दास के साथ पानी के जहाज से भारत आई थीं। उन्होंने सिंधी बीड़ी का कारोबार शुरू किया, जो आज बड़ा व्यवसाय बन चुका है। 80 वर्षीय अंजना देवी भी अपने माता-पिता के साथ रोहणी शहर से आई थी। समाजसेवी ओम प्रकाश ओमी कहते हैं कि सिंधी खुद को शरणार्थी नहीं, बल्कि पुरुषार्थी मानते हैं।
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घर में होती है सिंधी में बात
आधुनिकता के बीच भी सिंधी समाज अपनी भाषा और परंपराएं संजोए हुए है। घरों में आज भी सिंधी भाषा बोली जाती है और भगवान झूलेलाल का जन्मोत्सव उत्साह से मनाते हैं। सिंधी सेंट्रल पंचायत के मुखिया ओमप्रकाश अंदानी और पवन जीवानी कहते हैं कि समाज राजनीतिक रूप से पिछड़ा है। देश में केवल इंदौर के शंकर लालवानी सांसद हैं। समाज का अपने पूर्वजों की भूमि से भावनात्मक रिश्ता आज भी बना हुआ है। सीमा खुलने पर लगभग 50 सदस्य सिंध प्रांत में अपने पैतृक स्थलों के दर्शन करेंगे।

आधुनिकता के बीच भी सिंधी समाज अपनी भाषा और परंपराएं संजोए हुए है। घरों में आज भी सिंधी भाषा बोली जाती है और भगवान झूलेलाल का जन्मोत्सव उत्साह से मनाते हैं। सिंधी सेंट्रल पंचायत के मुखिया ओमप्रकाश अंदानी और पवन जीवानी कहते हैं कि समाज राजनीतिक रूप से पिछड़ा है। देश में केवल इंदौर के शंकर लालवानी सांसद हैं। समाज का अपने पूर्वजों की भूमि से भावनात्मक रिश्ता आज भी बना हुआ है। सीमा खुलने पर लगभग 50 सदस्य सिंध प्रांत में अपने पैतृक स्थलों के दर्शन करेंगे।
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