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Barabanki News: बिपाशा की वेब सीरीज में दिखेगा नशे का कारोबार
Tue, 08 Sep 2026 12:04 AM IST
लखनऊ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, बाराबंकी
संवाद न्यूज एजेंसी, बाराबंकी
Updated Tue, 08 Sep 2026 12:04 AM IST
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बाराबंकी। मार्फीन, स्मैक और हेरोइन की तस्करी के लिए देशभर में चर्चित जिले में नशे के काले कारोबार पर एक वेब सीरीज बन रही है। प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक हंसल मेहता इस सीरीज में वर्ष 1982 से 1984 के बीच के उस समय को पर्दे पर दिखाएंगे, जिसमें बाराबंकी के एसपी रहे आलोक लाल ने तस्करों के खिलाफ निर्णायक मुहिम छेड़ी थी। खास बात यह है कि प्रसिद्ध अभिनेत्री बिपाशा बसु के साथ विशाल जेठवा और सनी कौशल भी इस बेब सीरिज में महत्वपूर्ण किरदारों में दिखाई देंगे। यूनिट की टीम जल्द ही बाराबंकी में शूटिंग के लिए लोकेशन देखने पहुंचेगी।
बाराबंकी में 1970 के दशक में अफीम की खेती शुरू हुई। धीरे-धीरे सरकार की ओर से लाइसेंस देकर अफीम की खेती कराई जाने लगी। इसी दौर में अफीम की अवैध तस्करी ने भी पांव जमाने शुरू कर दिए। जैदपुर क्षेत्र के कुछ गांव इस कारोबार के बड़े केंद्र बन गए। टिकरा उस्मा, टिकरा मुर्तजा और बलछठ जैसे गांवों में तस्करी का नेटवर्क इतना मजबूत होता गया कि यह कारोबार धीरे-धीरे कुटीर उद्योग की शक्ल लेने लगा। समय के साथ तस्करों ने पैसा, जमीन और राजनीतिक प्रभाव जुटा लिया।
वर्ष 1982 में तैनात आईपीएस आलोक लाल ने बाराबंकी में एसपी की कुर्सी संभाली तो तस्करों का नेटवर्क इतना मजबूत था कि उनका प्रभाव सरकारी तंत्र तक कायम था। आलोक लाल ने तस्करों से सीधे भिड़ने के बजाय उनकी जड़ों तक पहुंचने की रणनीति बनाई। उन्होंने गांवों में क्रिकेट प्रतियोगिताएं शुरू कराईं। पुलिस की यह पहल सिर्फ खेल तक सीमित नहीं थी। गांवों में लोगों से संपर्क बढ़ा और इसी के जरिये पुलिस ने अपना मुखबिर नेटवर्क मजबूत किया। धीरे-धीरे नशे के कारोबार से जुड़े बड़े नाम पुलिस के सामने आने लगे।
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जांच आगे बढ़ी तो तस्करी के तार सिर्फ बाराबंकी तक सीमित नहीं मिले। नेपाल तक फैले नेटवर्क और वहां जेल में बंद अपराधियों के संपर्क में रहने वाले तस्करों की जानकारी भी सामने आई। (संवाद)
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बाराबंकी में 1970 के दशक में अफीम की खेती शुरू हुई। धीरे-धीरे सरकार की ओर से लाइसेंस देकर अफीम की खेती कराई जाने लगी। इसी दौर में अफीम की अवैध तस्करी ने भी पांव जमाने शुरू कर दिए। जैदपुर क्षेत्र के कुछ गांव इस कारोबार के बड़े केंद्र बन गए। टिकरा उस्मा, टिकरा मुर्तजा और बलछठ जैसे गांवों में तस्करी का नेटवर्क इतना मजबूत होता गया कि यह कारोबार धीरे-धीरे कुटीर उद्योग की शक्ल लेने लगा। समय के साथ तस्करों ने पैसा, जमीन और राजनीतिक प्रभाव जुटा लिया।
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वर्ष 1982 में तैनात आईपीएस आलोक लाल ने बाराबंकी में एसपी की कुर्सी संभाली तो तस्करों का नेटवर्क इतना मजबूत था कि उनका प्रभाव सरकारी तंत्र तक कायम था। आलोक लाल ने तस्करों से सीधे भिड़ने के बजाय उनकी जड़ों तक पहुंचने की रणनीति बनाई। उन्होंने गांवों में क्रिकेट प्रतियोगिताएं शुरू कराईं। पुलिस की यह पहल सिर्फ खेल तक सीमित नहीं थी। गांवों में लोगों से संपर्क बढ़ा और इसी के जरिये पुलिस ने अपना मुखबिर नेटवर्क मजबूत किया। धीरे-धीरे नशे के कारोबार से जुड़े बड़े नाम पुलिस के सामने आने लगे।
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जांच आगे बढ़ी तो तस्करी के तार सिर्फ बाराबंकी तक सीमित नहीं मिले। नेपाल तक फैले नेटवर्क और वहां जेल में बंद अपराधियों के संपर्क में रहने वाले तस्करों की जानकारी भी सामने आई। (संवाद)