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एकता का संदेश देने वाली सरजमी पर सियासत के कड़वे बोल
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बाराबंकी। देवां शरीफ से जो रब है वही राम है और कोटवाधाम से अल्ला अलख एकै अहै, दूजा नाहीं कोय... जैसे संदेशों से पूरी दुनिया में कौमी व जातीय एकता का मिसाल मानी जाने वाली बाराबंकी की सरजमीं भी सियासत के कारण जाति और धर्म के रंग में रंग सी गई है।
एक तरफ संतों की वाणी है तो दूसरी ओर जनमानस को गुमराह करने वाले सियासी बोल। मौजूदा विधानसभा चुनाव को लें तो टिकट वितरण से लेकर चुनावी प्रचार तक में जाति और धर्म के समीकरण अपनाए जा रहे हैं। विभिन्न दलों के नेता, पदाधिकारी, उम्मीदवार और यहां तक कि समर्थक भी चुनाव में जाति धर्म का समीकरण बैठाने में तल्लीन है।
सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर भी आपत्तिजनक पोस्टों, कमेंट आदि की भरमार इसका प्रमाण है। वर्तमान में चुनाव प्रचार तेज हो गया है। कहां कितने हिंदू है, कहां कितने मुस्लिम, किस क्षेत्र में कितने यादव और कहां कितने ठाकुर है। चुनाव प्रचार करने वाले इसका चिट्ठा लेकर घूम रहे हैं।
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हद तो यह है कि चुनाव में जातिगत निशाने साधने के लिए नेता दल बदलने से भी नहीं चूक रहे हैं। पिछले एक महीने में हुई उठापटक इसका स्पष्ट उदाहरण है। मौजूदा समय में किसी भी उम्मीदवार का सोशल मीडिया अकाउंट चेक करने पर उस पर आने वाले कमेंट ही सारा हाल बयां कर देते हैं। कई मामलों में एफआईआर तक दर्ज हो चुकी है। विधानसभा चुनाव की हलचल शुरू होते ही सोशल मीडिया पर आपित्तजनक पोस्ट दिखने लगी थी।
पुलिस के सोशल मीडिया सेल प्रभारी सत्येन्द्र प्रकाश पांडेय बताते हैं कि बीते तीन चार महीने में करीब 15 पोस्ट हटवाई गईं, ये पोस्ट आपत्तिजनक थी। इसे लेकर लगातार निगरानी की जा रही है। आगाह करने के बाद भी जो स्वयं नहीं हटाते, उनके खिलाफ केस दर्ज कर अमेरिका के कैलीफोर्निया स्थित सर्वर हब को रिपोर्ट भेजने का प्रावधान है। जहां से संबंधित का सोशल मीडिया एकाउंट ब्लॉक कर दिया जाता है। (संवाद)
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एक तरफ संतों की वाणी है तो दूसरी ओर जनमानस को गुमराह करने वाले सियासी बोल। मौजूदा विधानसभा चुनाव को लें तो टिकट वितरण से लेकर चुनावी प्रचार तक में जाति और धर्म के समीकरण अपनाए जा रहे हैं। विभिन्न दलों के नेता, पदाधिकारी, उम्मीदवार और यहां तक कि समर्थक भी चुनाव में जाति धर्म का समीकरण बैठाने में तल्लीन है।
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सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर भी आपत्तिजनक पोस्टों, कमेंट आदि की भरमार इसका प्रमाण है। वर्तमान में चुनाव प्रचार तेज हो गया है। कहां कितने हिंदू है, कहां कितने मुस्लिम, किस क्षेत्र में कितने यादव और कहां कितने ठाकुर है। चुनाव प्रचार करने वाले इसका चिट्ठा लेकर घूम रहे हैं।
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हद तो यह है कि चुनाव में जातिगत निशाने साधने के लिए नेता दल बदलने से भी नहीं चूक रहे हैं। पिछले एक महीने में हुई उठापटक इसका स्पष्ट उदाहरण है। मौजूदा समय में किसी भी उम्मीदवार का सोशल मीडिया अकाउंट चेक करने पर उस पर आने वाले कमेंट ही सारा हाल बयां कर देते हैं। कई मामलों में एफआईआर तक दर्ज हो चुकी है। विधानसभा चुनाव की हलचल शुरू होते ही सोशल मीडिया पर आपित्तजनक पोस्ट दिखने लगी थी।
पुलिस के सोशल मीडिया सेल प्रभारी सत्येन्द्र प्रकाश पांडेय बताते हैं कि बीते तीन चार महीने में करीब 15 पोस्ट हटवाई गईं, ये पोस्ट आपत्तिजनक थी। इसे लेकर लगातार निगरानी की जा रही है। आगाह करने के बाद भी जो स्वयं नहीं हटाते, उनके खिलाफ केस दर्ज कर अमेरिका के कैलीफोर्निया स्थित सर्वर हब को रिपोर्ट भेजने का प्रावधान है। जहां से संबंधित का सोशल मीडिया एकाउंट ब्लॉक कर दिया जाता है। (संवाद)