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...एक मुद्दत से रोए नहीं हैं, क्या पत्थर से हो गए हम
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बाराबंकी। देवा महोत्सव के सांस्कृतिक मंच पर बुधवार देर शाम मुशायरे का आयोजन किया गया। दूर दराज से आए शायरों ने अपनी पेशकश से श्रोताओं को वाह-वाह कहने पर मजबूर कर दिया। पूरा पंडाल श्रोताओं से भरा रहा है।
देर रात तक चली शायरों की महफिल में एक से बढ़ कर एक शायरी पेश की गई। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रदेश के पूर्व डीजीपी रिजवान अहमद ने तो संचालन नसीम फारुखी ने किया।
उस्मान मिनाई ने शायर पढ़ा- निशा क्यूं ढूढ़तें हो अंगुलियों के, कजा आएगी दस्ताने पहन कर। वहीं एटा जिले से आए शायर अज्म साकरी ने पढ़ा- लाखों के सदमे, ढेरों गम, फिर भी नहीं हैं आंखें नम, एक मुद्दत से रोए नहीं हैं क्या पत्थर के हो गए हम।
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इसी कड़ी में राम प्रकाश बेखुद ने अपनी शायरी पेश करते हुए पढ़ा- जायका कम का लिखूं, दर्द भी लज्जत लिखूं, मैं तेरे ख्वाब से निकलूं तो हकीकत लिखूं।
शायर नईम अख्तर बुरहानपुरी ने पढ़ा- बराबर में वो आया तो मैं समझा वो मुझसे आगे जाना चाहते हैं। शायर सलिला सिद्दीकी ने पढ़ा- सारे किरदार कुचलने पर तुले हैं हमको, आओ चुपचाप कहानी से निकल चलते हैं।
मुशायरा संचालक नदीम फारुखी ने पढ़ा- सुबह मगरूर को वो शाम भी कर देता है शोहरते छीन के गुमनाम भी कर देता है। वक्त से आंख मिलाने की हिमाकत न करो, वक्त इंसान को नीलाम भी कर देता है।
इस दौरान मशहूर शायर वसीम बरेलवी, ताहिर फराज, जौहर कानपुरी, खुुुर्शीद हैदर, चांदनी शबनम, नसीम निकहत, मुमताज नसीम, हैदर अमात, चरन सिंह बशर, सुंदर माने दाबी आदि ने भी देर रात अपने शायरी का ऐसा अंदाज पेश किया लोग अपनी कुर्सी से जमे रहे।
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देर रात तक चली शायरों की महफिल में एक से बढ़ कर एक शायरी पेश की गई। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रदेश के पूर्व डीजीपी रिजवान अहमद ने तो संचालन नसीम फारुखी ने किया।
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उस्मान मिनाई ने शायर पढ़ा- निशा क्यूं ढूढ़तें हो अंगुलियों के, कजा आएगी दस्ताने पहन कर। वहीं एटा जिले से आए शायर अज्म साकरी ने पढ़ा- लाखों के सदमे, ढेरों गम, फिर भी नहीं हैं आंखें नम, एक मुद्दत से रोए नहीं हैं क्या पत्थर के हो गए हम।
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इसी कड़ी में राम प्रकाश बेखुद ने अपनी शायरी पेश करते हुए पढ़ा- जायका कम का लिखूं, दर्द भी लज्जत लिखूं, मैं तेरे ख्वाब से निकलूं तो हकीकत लिखूं।
शायर नईम अख्तर बुरहानपुरी ने पढ़ा- बराबर में वो आया तो मैं समझा वो मुझसे आगे जाना चाहते हैं। शायर सलिला सिद्दीकी ने पढ़ा- सारे किरदार कुचलने पर तुले हैं हमको, आओ चुपचाप कहानी से निकल चलते हैं।
मुशायरा संचालक नदीम फारुखी ने पढ़ा- सुबह मगरूर को वो शाम भी कर देता है शोहरते छीन के गुमनाम भी कर देता है। वक्त से आंख मिलाने की हिमाकत न करो, वक्त इंसान को नीलाम भी कर देता है।
इस दौरान मशहूर शायर वसीम बरेलवी, ताहिर फराज, जौहर कानपुरी, खुुुर्शीद हैदर, चांदनी शबनम, नसीम निकहत, मुमताज नसीम, हैदर अमात, चरन सिंह बशर, सुंदर माने दाबी आदि ने भी देर रात अपने शायरी का ऐसा अंदाज पेश किया लोग अपनी कुर्सी से जमे रहे।