{"_id":"696920cceebe514e3e0ce56e","slug":"a-name-that-emerged-from-barabanki-which-changed-the-power-and-politics-of-iran-barabanki-news-c-315-1-brp1006-156416-2026-01-15","type":"story","status":"publish","title_hn":"Barabanki News: बाराबंकी से निकला एक नाम, जिसने बदल दी ईरान की सत्ता व सियासत","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Barabanki News: बाराबंकी से निकला एक नाम, जिसने बदल दी ईरान की सत्ता व सियासत
Thu, 15 Jan 2026 10:45 PM IST
लखनऊ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, बाराबंकी
संवाद न्यूज एजेंसी, बाराबंकी
Updated Thu, 15 Jan 2026 10:45 PM IST
विज्ञापन
किंतूर गांव में एक मकान के अंदर लगी ईरानी नेताओं की तस्वीर।
श्रुतिमान शुक्ल
बाराबंकी। ईरान में जारी कत्लेआम, अस्थिर हालात और बेकाबू हालचाल के बीच अंतरराष्ट्रीय कूटनीति भी सक्रिय है। ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची ने भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर से मौजूदा हालातों को लेकर बातचीत की, मगर इन वैश्विक घटनाक्रमों के बीच उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले का एक छोटा सा गांव किंतूर एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय चर्चा का केंद्र बन गया है। दरअसल, 196 साल पहले किंतूर गांव से ईरान गए सैयद अहमद मूसवी के पोते रूहुल्लाह खुमैनी ने ही ईरान की सत्ता व सियासत की दिशा बदल दी थी। इन्हीं खुमैनी के शागिर्द अब ईरान के शासक अयातुल्ला अली खामेनेई हैं।
बाराबंकी के सिरौलीगौसपुर तहसील के किंतूर गांव में वर्ष 1790 में सैयद अहमद मूसवी का जन्म हुआ था। धार्मिक शिक्षा पूरी करने के बाद मूसवी सन 1830 में 40 वर्ष की उम्र में अवध के नवाब के साथ धार्मिक यात्रा पर इराक गए। वहां से आगे बढ़ते हुए वह ईरान पहुंचे और खुमैन नामक गांव में बस गए। अपने वतन हिन्दुस्तान से उनको इतन लगाव था कि उन्होंने अपने नाम के आगे हिंदवी जोड़ा और वह अहमद मूसवी हिंदवी के नाम से पहचाने जाने लगे। यही उपनाम आगे चलकर ईरान के सबसे प्रभावशाली राजनीतिक धार्मिक परिवार की पहचान बना। उनके पुत्र सैयद मुस्तफा हुए और मुस्तफा के घर जन्म हुआ उस शख्सियत का, जिसने आगे चलकर ईरान की सत्ता व्यवस्था को पूरी तरह बदल दिया। 1902 में जन्मे रूहुल्लाह खुमैनी ने धर्म के साथ-साथ दर्शन और राजनीति का गहरा अध्ययन किया। उस समय ईरान पर पहलवी वंश का शासन था। खुमैनी ने इसका विरोध किया। उनके बढ़ते प्रभाव से घबराकर सरकार ने उन्हें देश से निष्कासित कर दिया। एक अखबार ने उन्हें भारत का एजेंट बता दिया, लेकिन इसका उल्टा असर हुआ। आम जनता खुमैनी के समर्थन में सड़कों पर उतर आई। हालात इतने बिगड़े कि शासक को ईरान छोड़कर भागना पड़ा। करीब 14 साल के निर्वासन के बाद खुमैनी की ईरान वापसी हुई। 1979 में ईरान में पहली बार इस्लामी सरकार बनी और रूहुल्लाह खुमैनी देश के पहले सुप्रीम लीडर घोषित किए गए। इसी क्रांति ने ईरान को राजशाही से मजहबी शासन की ओर मोड़ दिया। 1989 में रूहुल्लाह खुमैनी के निधन के बाद उनके शागिर्द अयातुल्ला अली खामेनेई ने सत्ता की बागडोर संभाली। आज जब ईरान एक बार फिर गंभीर संकट से गुजर रहा है, तब बाराबंकी के किंतूर गांव के लोग और खासकर सैयद परिवार, वहां की गतिविधियों पर पैनी नजर बनाए हुए हैं। सुमैनी के वंशज बताए जाने वाले एडवोकेट आदिल काजमी कहते है कि अमेरिका द्वारा ईरान में जो किया जा रहा है वह गलत है।
.................
विज्ञापन
बाराबंकी। ईरान में जारी कत्लेआम, अस्थिर हालात और बेकाबू हालचाल के बीच अंतरराष्ट्रीय कूटनीति भी सक्रिय है। ईरान के विदेश मंत्री सैयद अब्बास अराघची ने भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर से मौजूदा हालातों को लेकर बातचीत की, मगर इन वैश्विक घटनाक्रमों के बीच उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले का एक छोटा सा गांव किंतूर एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय चर्चा का केंद्र बन गया है। दरअसल, 196 साल पहले किंतूर गांव से ईरान गए सैयद अहमद मूसवी के पोते रूहुल्लाह खुमैनी ने ही ईरान की सत्ता व सियासत की दिशा बदल दी थी। इन्हीं खुमैनी के शागिर्द अब ईरान के शासक अयातुल्ला अली खामेनेई हैं।
बाराबंकी के सिरौलीगौसपुर तहसील के किंतूर गांव में वर्ष 1790 में सैयद अहमद मूसवी का जन्म हुआ था। धार्मिक शिक्षा पूरी करने के बाद मूसवी सन 1830 में 40 वर्ष की उम्र में अवध के नवाब के साथ धार्मिक यात्रा पर इराक गए। वहां से आगे बढ़ते हुए वह ईरान पहुंचे और खुमैन नामक गांव में बस गए। अपने वतन हिन्दुस्तान से उनको इतन लगाव था कि उन्होंने अपने नाम के आगे हिंदवी जोड़ा और वह अहमद मूसवी हिंदवी के नाम से पहचाने जाने लगे। यही उपनाम आगे चलकर ईरान के सबसे प्रभावशाली राजनीतिक धार्मिक परिवार की पहचान बना। उनके पुत्र सैयद मुस्तफा हुए और मुस्तफा के घर जन्म हुआ उस शख्सियत का, जिसने आगे चलकर ईरान की सत्ता व्यवस्था को पूरी तरह बदल दिया। 1902 में जन्मे रूहुल्लाह खुमैनी ने धर्म के साथ-साथ दर्शन और राजनीति का गहरा अध्ययन किया। उस समय ईरान पर पहलवी वंश का शासन था। खुमैनी ने इसका विरोध किया। उनके बढ़ते प्रभाव से घबराकर सरकार ने उन्हें देश से निष्कासित कर दिया। एक अखबार ने उन्हें भारत का एजेंट बता दिया, लेकिन इसका उल्टा असर हुआ। आम जनता खुमैनी के समर्थन में सड़कों पर उतर आई। हालात इतने बिगड़े कि शासक को ईरान छोड़कर भागना पड़ा। करीब 14 साल के निर्वासन के बाद खुमैनी की ईरान वापसी हुई। 1979 में ईरान में पहली बार इस्लामी सरकार बनी और रूहुल्लाह खुमैनी देश के पहले सुप्रीम लीडर घोषित किए गए। इसी क्रांति ने ईरान को राजशाही से मजहबी शासन की ओर मोड़ दिया। 1989 में रूहुल्लाह खुमैनी के निधन के बाद उनके शागिर्द अयातुल्ला अली खामेनेई ने सत्ता की बागडोर संभाली। आज जब ईरान एक बार फिर गंभीर संकट से गुजर रहा है, तब बाराबंकी के किंतूर गांव के लोग और खासकर सैयद परिवार, वहां की गतिविधियों पर पैनी नजर बनाए हुए हैं। सुमैनी के वंशज बताए जाने वाले एडवोकेट आदिल काजमी कहते है कि अमेरिका द्वारा ईरान में जो किया जा रहा है वह गलत है।
विज्ञापन
.................