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Barabanki News: एक करोड़ का कारोबार, पल रहे 300 परिवार
Sat, 03 Jan 2026 01:24 AM IST
लखनऊ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, बाराबंकी
संवाद न्यूज एजेंसी, बाराबंकी
Updated Sat, 03 Jan 2026 01:24 AM IST
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बाराबंकी। सुबह की धुंध छंटते ही शहर के नाले, कूड़ाघर और रेलवे लाइनें कूड़ा बीनने वालों से आबाद हो जाती हैं। इनके हाथों में बोरे, पैरों में चप्पल और आंखों में दिनभर की कमाई का हिसाब दिखता है। बाराबंकी में ऐसे 300 परिवार है जिनके लिए कूड़ा बदबू नहीं, कमाई का जरिया बना है। बाराबंकी में बिना किसी शोर व पहचान के हर माह एक करोड़ रुपये के टर्नओवर वाला यह अनौपचारिक कारोबार लगातार फल-फूल रहा है।
वर्ष 2010 में आसाम के बारपेटा जिले से कुछ परिवार काम की तलाश में बाराबंकी आए थे। उन्होंने जमुरिया नाले के किनारे झोपड़ियां खड़ी कर कूड़ा बीनने को अपने रोजमर्रा का काम बना लिया। आज इनकी संख्या 300 के पार पहुंच गई है। किसी का ठिकाना जमुरिया नाले के किनारे है तो कोई स्टेशन के पास अधबने मकानों में रहता है। कमरिया बाग के पास रहने वाले आसिफ बताते है मैं और पत्नी दिनभर प्लास्टिक लोहा आदि बीन कर 600 रुपये तक कमा लेते हैं जबकि बच्चे 300 रुपये तक जोड़ लेते हैं। इस तरह पूरा परिवार एक दिन में एक हजार रुपये तक की कमाई आराम से कर लेता है।
अगर औसतन प्रतिदिन 300 रुपये की रोजाना कमाई होती है तो महीने भर में 70-75 लाख रुपये तक के कचरे का कारोबार होता है, जो कबाड़ियों और व्यापारियों के हाथों एक करोड़ से ऊपर के कारोबार में बदल जाता है। (संवाद)
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संदेह की परछाईं, सत्यापन की मुहर
इन परिवारों पर बांग्लादेश से आने के आरोप भी लगते रहे हैं। इसके चलते इन्हें पुलिस और नगर निकाय द्वारा किए जाने वाले कई दौर के सत्यापन से भी गुजरना पड़ता है। करीब छह महीने पहले हुए सत्यापन में 300 परिवार दर्ज हुए। आधार कार्ड सुरक्षित हुए, रजिस्टर बना और यह तय हुआ कि यह मेहनतकश भी शहर का हिस्सा हैं। एसपी अर्पित विजयवर्गीय कहते हैं कि कूड़ा बीनने वालों से जुड़े परिवार के लोगों का ब्योरा पुलिस के पास सुरक्षित है।
पर्यावरण के प्रहरी है कूड़ा बीनने वाले
प्लास्टिक पर्यावरण का सबसे बड़ा अभिशाप है और बाराबंकी में इसे लेकर कोई योजना नहीं है। मगर कूड़ा बीनने वाले परिवार हर दिन नालों, कूड़ाघरों और सड़कों से प्लास्टिक, थर्माकोल, रबर, कांच और लोहा समेटकर उसे छांटते हैं। इसके बाद गुणवत्ता के अनुसार कचरा अलग किया जाता है। फिर इसे लखनऊ, गोरखपुर, दिल्ली तक पहुंचाया जाता है। जहां इसे रीसाइकिल कर फिर से प्रयोग में लाया जाता है।
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वर्ष 2010 में आसाम के बारपेटा जिले से कुछ परिवार काम की तलाश में बाराबंकी आए थे। उन्होंने जमुरिया नाले के किनारे झोपड़ियां खड़ी कर कूड़ा बीनने को अपने रोजमर्रा का काम बना लिया। आज इनकी संख्या 300 के पार पहुंच गई है। किसी का ठिकाना जमुरिया नाले के किनारे है तो कोई स्टेशन के पास अधबने मकानों में रहता है। कमरिया बाग के पास रहने वाले आसिफ बताते है मैं और पत्नी दिनभर प्लास्टिक लोहा आदि बीन कर 600 रुपये तक कमा लेते हैं जबकि बच्चे 300 रुपये तक जोड़ लेते हैं। इस तरह पूरा परिवार एक दिन में एक हजार रुपये तक की कमाई आराम से कर लेता है।
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अगर औसतन प्रतिदिन 300 रुपये की रोजाना कमाई होती है तो महीने भर में 70-75 लाख रुपये तक के कचरे का कारोबार होता है, जो कबाड़ियों और व्यापारियों के हाथों एक करोड़ से ऊपर के कारोबार में बदल जाता है। (संवाद)
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संदेह की परछाईं, सत्यापन की मुहर
इन परिवारों पर बांग्लादेश से आने के आरोप भी लगते रहे हैं। इसके चलते इन्हें पुलिस और नगर निकाय द्वारा किए जाने वाले कई दौर के सत्यापन से भी गुजरना पड़ता है। करीब छह महीने पहले हुए सत्यापन में 300 परिवार दर्ज हुए। आधार कार्ड सुरक्षित हुए, रजिस्टर बना और यह तय हुआ कि यह मेहनतकश भी शहर का हिस्सा हैं। एसपी अर्पित विजयवर्गीय कहते हैं कि कूड़ा बीनने वालों से जुड़े परिवार के लोगों का ब्योरा पुलिस के पास सुरक्षित है।
पर्यावरण के प्रहरी है कूड़ा बीनने वाले
प्लास्टिक पर्यावरण का सबसे बड़ा अभिशाप है और बाराबंकी में इसे लेकर कोई योजना नहीं है। मगर कूड़ा बीनने वाले परिवार हर दिन नालों, कूड़ाघरों और सड़कों से प्लास्टिक, थर्माकोल, रबर, कांच और लोहा समेटकर उसे छांटते हैं। इसके बाद गुणवत्ता के अनुसार कचरा अलग किया जाता है। फिर इसे लखनऊ, गोरखपुर, दिल्ली तक पहुंचाया जाता है। जहां इसे रीसाइकिल कर फिर से प्रयोग में लाया जाता है।