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शाम होते ही अंधेरे में डूब जाते हैं पीड़ितों के आशियाने
Updated Tue, 15 Aug 2017 12:34 AM IST
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शाम होते ही अंधेरे में डूब जाते बाढ़ पीड़ितों के आशियाने
टिकैतनगर (बाराबंकी)। बाढ की त्रासदी झेल रहे पूरेडलई विकास खंड के दर्जनों गांव पूरी तरह जलमग्न हैं। अलीनगर रानीमऊ तटबंध हो या चरसरी यहां पर बसे लोगों का आशियाना शाम ढलते ही घने अंधेरे में डूब जाते हैं। इनके पास अपने घरों मे उजाले की कोई व्यवस्था नहीं है।
गोबरहा निवासी पप्पल बताते हैं कि अभी गांव में कोई राहत सामग्री नही पहुंचाई गई है। तटबंध पर कुछ परिवारों को तिरपाल की जगह पतली पन्नी वितरित की जा रही थी। जिसको ग्रामीणों ने लेने से इंकार कर दिया था तब से यहां पर कोई नहीं आया। करोनी निवासी लाल मोहर उत्तम ने बताया की गांव में घरों के भीतर दो फिट पानी भरा हुआ है। सरकारी व्यवस्था के नाम कुछ भी वितरण नही किया गया है। पिछले एक माह से पानी-पानी होते रायपुर, परसावल, नैपुरा, कमियार के लोगों की जिंदगी में गम ही गम है। बाढ़ से घिरने, बहने, बसने और भोगने के दर्द को महसूस नहीं किया जा सकता है। घाघरा का गुस्सा देखना है तो रायुपर में जाइए जहां लोग जोखिम उठाकर जिंदगी के लिए जंग कर रहे हैं। जहां हर घर में मुसीबतों का डेरा है। नीचे पानी और छतों पर जिंदगानी। न अपना खाना, न मवेशियों का ठिकाना। उनकी ओर बढ़ रही प्रत्येक नाव में उन्हें जलदूत नजर आते हैं, जो उनके लिए भोजन पानी लेकर आने वाले हैं। जलमग्न गांवों की यही कहानी है। मीलों तक सिर्फ पानी ही पानी है। दर्जनों गावों की एक तरफ जीवन देने वाली घाघरा का उफान तो दूसरी तरफ विनाश लीला। रातोरात गृहस्थी व आशियाना बह गए हैं। अब तो तटबंधों पर ही नया बसेरा है।
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टिकैतनगर (बाराबंकी)। बाढ की त्रासदी झेल रहे पूरेडलई विकास खंड के दर्जनों गांव पूरी तरह जलमग्न हैं। अलीनगर रानीमऊ तटबंध हो या चरसरी यहां पर बसे लोगों का आशियाना शाम ढलते ही घने अंधेरे में डूब जाते हैं। इनके पास अपने घरों मे उजाले की कोई व्यवस्था नहीं है।
गोबरहा निवासी पप्पल बताते हैं कि अभी गांव में कोई राहत सामग्री नही पहुंचाई गई है। तटबंध पर कुछ परिवारों को तिरपाल की जगह पतली पन्नी वितरित की जा रही थी। जिसको ग्रामीणों ने लेने से इंकार कर दिया था तब से यहां पर कोई नहीं आया। करोनी निवासी लाल मोहर उत्तम ने बताया की गांव में घरों के भीतर दो फिट पानी भरा हुआ है। सरकारी व्यवस्था के नाम कुछ भी वितरण नही किया गया है। पिछले एक माह से पानी-पानी होते रायपुर, परसावल, नैपुरा, कमियार के लोगों की जिंदगी में गम ही गम है। बाढ़ से घिरने, बहने, बसने और भोगने के दर्द को महसूस नहीं किया जा सकता है। घाघरा का गुस्सा देखना है तो रायुपर में जाइए जहां लोग जोखिम उठाकर जिंदगी के लिए जंग कर रहे हैं। जहां हर घर में मुसीबतों का डेरा है। नीचे पानी और छतों पर जिंदगानी। न अपना खाना, न मवेशियों का ठिकाना। उनकी ओर बढ़ रही प्रत्येक नाव में उन्हें जलदूत नजर आते हैं, जो उनके लिए भोजन पानी लेकर आने वाले हैं। जलमग्न गांवों की यही कहानी है। मीलों तक सिर्फ पानी ही पानी है। दर्जनों गावों की एक तरफ जीवन देने वाली घाघरा का उफान तो दूसरी तरफ विनाश लीला। रातोरात गृहस्थी व आशियाना बह गए हैं। अब तो तटबंधों पर ही नया बसेरा है।
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