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पेड़ों के साथ मिट जाएंगे तीन हजार साल पुराने शैल चित्र
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बांदा। बकस्वाहा के जंगल के पत्थरों पर उकेरे गए शैल चित्र।
- फोटो : BANDA
बांदा। बुंदेलखंड के बकस्वाहा जंगल में हीरा खनन के लिए प्रस्तावित खुदाई में 2.15 लाख पेड़ ही नहीं, बल्कि यहां की चट्टानों पर उकरे हजारों साल पुराने दुर्लभ और आदिम सभ्यता के प्रतीक शैल चित्र (रॉक पेटिंग) भी तहस-नहस हो जाएंगे। यही कारण हैं कि बकस्वाहा जंगल को बचाने के लिए आंदोलन जोर पकड़ता जा रहा है।
बुंदेलखंड के छतरपुर (एमपी) में स्थित बकस्वाहा जंगल के 382.13 हेक्टेयर को हीरा खदान के लिए सरकार ने बिड़ला ग्रुप की एक्सल माइनिंग एडं इंड्रस्ट्रीज कंपनी को 50 साल के पट्टे पर दे दिया है। इस जंगल में 2 लाख 15 हजार से ज्यादा हरे भरे पेड़ हैं। पर्यावरण के पैरोकार इतनी बड़ी संख्या में हीरा खदान के लिए पेड़ों को खत्म करने का जोरदार विरोध कर रहे हैं। न सिर्फ बुंदेलखंड और मध्य प्रदेश बल्कि देश के विभिन्न क्षेत्रों से पर्यावरण विद और चिंतक तथा तमाम संगठन बड़ी संख्या में इस आंदोलन में जुड़ और जुट गए हैं।
कंदराओं में हैं आदिमानव शैल चित्र
बकस्वाहा जंगल में बेहद दुर्गम रास्तों के बीच पहाड़ी चट्टानें हैं। इन्हीं पहाड़ों की कंदराओं में बड़ी संख्या में शैल चित्र बने हैं। यहां तक पहुंचना काफी मशक्कत भरा है। पर्यावरण के पैरोकार और आरटीआई कार्यकर्ता आशीष सागर दीक्षित ने बकस्वाहा जंगल और शैल चित्रों वाली इन चट्टानों का भ्रमण किया।
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उनके साथ क्षेत्रीय पर्यावरण कार्यकर्ता अरविंद निषाद भी थे। आशीष ने बताया कि हीरा के लिए खनन हुआ तो तीन हजार साल पुरानी संस्कृति मिटने की चिंता स्थानीय आदिवासियों को भी बहुत है। कहा कि सरकार इस घने जंगल को कटवाकर पुन: पौधरोपण का सब्जबाग दिखा रही है, लेकिन यह दुर्लभ शैल चित्रों का क्या होगा?
शैल चित्रों पर जारी हो चुका है शोध पत्र
बकस्वाहा के शैल चित्रों के बारे में वर्ष 2016 में छतरपुर के आर्कियोलॉजिस्ट और महाराजा छत्रसाल डिग्री कॉलेज के प्रवक्ता एसके छारी ने शोध पत्र प्रकाशित किया था। यह भी बताया गया है कि भोपाल की भीम बेटिका के एक हजार पुराने शैल चित्रों और बिजावर के जटाशंकर मार्ग में मौजूद शैल चित्रों से अधिक पुरानी संस्कृति के हैं।
आदिवासियों को आजीविका बचाने का संकट
बकस्वाहा जंगल बचाने को जद्दोजहद कर रहे विभिन्न संगठनों से जुड़े पर्यावरण पैरोकार कहते हैं कि सरकार हीरा खनन में 400 लोगों को रोजगार देने का सब्जबाग दिखा रही है, जबकि चार हजार आदिवासियों की आजीविका खत्म हो जाएगी। ये आदिवासी यहां के 15 गांवों में आबाद हैं। बकस्वाहा के जंगलों में बहुमूल्य प्रजाति के पुराने वृक्षों के अलावा बड़ी तादाद में आयुर्वेदिक वनस्पति भंडार भी है।
एक्सरे शैल चित्र साल हजार वर्ष पुराना
बकस्वाहा जंगल की चट्टानों के शैल चित्र बेहद दुर्लभ हैं। इनमें एक्सरे शैल चित्र भी हैं। इनके बारे में अनुमान है कि यह लगभग सात हजार साल पुराने हैं। यह बात बुंदेलखंड में शैल चित्रों (रॉक पेंटिंग) पर पिछले डेढ़ दशक से लगातार काम कर रहे बांदा इंटेक चेप्टर के संयोजक हारिस जमा ने कही।
उन्होंने बताया कि बकस्वाहा के शैल चित्रों में शिकार और उत्सव की तस्वीरें हैं। कुछ शैल चित्र 4 हजार वर्ष से ज्यादा पुराने हैं। उस समय आदिवासियों को भाषा का ज्ञान नहीं था। वह जो देखते थे उसी का चित्रांकन कर देते थे। कहा कि यह हमारी सांस्कृतिक धरोहर है। इसकी हर हाल में सुरक्षा होनी चाहिए। जल्द ही हमारी टीम बकस्वाहा जाएगी।
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बुंदेलखंड के छतरपुर (एमपी) में स्थित बकस्वाहा जंगल के 382.13 हेक्टेयर को हीरा खदान के लिए सरकार ने बिड़ला ग्रुप की एक्सल माइनिंग एडं इंड्रस्ट्रीज कंपनी को 50 साल के पट्टे पर दे दिया है। इस जंगल में 2 लाख 15 हजार से ज्यादा हरे भरे पेड़ हैं। पर्यावरण के पैरोकार इतनी बड़ी संख्या में हीरा खदान के लिए पेड़ों को खत्म करने का जोरदार विरोध कर रहे हैं। न सिर्फ बुंदेलखंड और मध्य प्रदेश बल्कि देश के विभिन्न क्षेत्रों से पर्यावरण विद और चिंतक तथा तमाम संगठन बड़ी संख्या में इस आंदोलन में जुड़ और जुट गए हैं।
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कंदराओं में हैं आदिमानव शैल चित्र
बकस्वाहा जंगल में बेहद दुर्गम रास्तों के बीच पहाड़ी चट्टानें हैं। इन्हीं पहाड़ों की कंदराओं में बड़ी संख्या में शैल चित्र बने हैं। यहां तक पहुंचना काफी मशक्कत भरा है। पर्यावरण के पैरोकार और आरटीआई कार्यकर्ता आशीष सागर दीक्षित ने बकस्वाहा जंगल और शैल चित्रों वाली इन चट्टानों का भ्रमण किया।
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उनके साथ क्षेत्रीय पर्यावरण कार्यकर्ता अरविंद निषाद भी थे। आशीष ने बताया कि हीरा के लिए खनन हुआ तो तीन हजार साल पुरानी संस्कृति मिटने की चिंता स्थानीय आदिवासियों को भी बहुत है। कहा कि सरकार इस घने जंगल को कटवाकर पुन: पौधरोपण का सब्जबाग दिखा रही है, लेकिन यह दुर्लभ शैल चित्रों का क्या होगा?
शैल चित्रों पर जारी हो चुका है शोध पत्र
बकस्वाहा के शैल चित्रों के बारे में वर्ष 2016 में छतरपुर के आर्कियोलॉजिस्ट और महाराजा छत्रसाल डिग्री कॉलेज के प्रवक्ता एसके छारी ने शोध पत्र प्रकाशित किया था। यह भी बताया गया है कि भोपाल की भीम बेटिका के एक हजार पुराने शैल चित्रों और बिजावर के जटाशंकर मार्ग में मौजूद शैल चित्रों से अधिक पुरानी संस्कृति के हैं।
आदिवासियों को आजीविका बचाने का संकट
बकस्वाहा जंगल बचाने को जद्दोजहद कर रहे विभिन्न संगठनों से जुड़े पर्यावरण पैरोकार कहते हैं कि सरकार हीरा खनन में 400 लोगों को रोजगार देने का सब्जबाग दिखा रही है, जबकि चार हजार आदिवासियों की आजीविका खत्म हो जाएगी। ये आदिवासी यहां के 15 गांवों में आबाद हैं। बकस्वाहा के जंगलों में बहुमूल्य प्रजाति के पुराने वृक्षों के अलावा बड़ी तादाद में आयुर्वेदिक वनस्पति भंडार भी है।
एक्सरे शैल चित्र साल हजार वर्ष पुराना
बकस्वाहा जंगल की चट्टानों के शैल चित्र बेहद दुर्लभ हैं। इनमें एक्सरे शैल चित्र भी हैं। इनके बारे में अनुमान है कि यह लगभग सात हजार साल पुराने हैं। यह बात बुंदेलखंड में शैल चित्रों (रॉक पेंटिंग) पर पिछले डेढ़ दशक से लगातार काम कर रहे बांदा इंटेक चेप्टर के संयोजक हारिस जमा ने कही।
उन्होंने बताया कि बकस्वाहा के शैल चित्रों में शिकार और उत्सव की तस्वीरें हैं। कुछ शैल चित्र 4 हजार वर्ष से ज्यादा पुराने हैं। उस समय आदिवासियों को भाषा का ज्ञान नहीं था। वह जो देखते थे उसी का चित्रांकन कर देते थे। कहा कि यह हमारी सांस्कृतिक धरोहर है। इसकी हर हाल में सुरक्षा होनी चाहिए। जल्द ही हमारी टीम बकस्वाहा जाएगी।

बांदा। बकस्वाहा के जंगल के पत्थरों पर उकेरे गए शैल चित्र दिखाते आशीष सागर।- फोटो : BANDA