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चिल्ला घाट में 14 दिन में ही टूट गया था पुल
अमर उजाला ब्यूरो, बांदा
Updated Sun, 03 Apr 2016 12:26 AM IST
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पुल की मरम्मत करते सेतु निगम अभियंता। (फाइल फोटो)
निर्माणाधीन या नवनिर्मित पुलों के टूटने की घटनाएं यहां भी हो चुकी हैं। इनकी जांच में घटना की वजह निर्माण में लापरवाही और घटिया मैटेरियल इस्तेमाल के साथ ही ओवरलोड वाहनों की धमाचौकड़ी बताई गई है। बता दें कि गुरुवार को कोलकाता में फ्लाइओवर गिरने से 24 लोगों की मौत की बात सामने आ चुकी है। इस हादसे के बाद चिल्ला घाट पर यमुना पुल पर बने पुल के टूटने की घटना एक बार फिर ताजा हो गई।
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बांदा और फतेहपुर जनपदों के बीच चिल्ला घाट पर यमुना नदी का पुल वर्ष 2010 में बसपा सरकार के कार्यकाल में बना था। निर्माण की शुरूआत 26 जनवरी 2008 को हुई थी। लोकार्पण 18 नवंबर 2010 को हुआ था। इस पुल की लंबे अरसे से मांग की जा रही थी।
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पुल बनने से कानपुर, लखनऊ आदि जिलों का रास्ता बरसात में भी सुगम हो गया। 64 करोड़ 20 लाख रुपये की लागत से 1086 मीटर लंबा यह पुल उत्तर प्रदेश सेतु निर्माण निगम ने बनवाया था। लेकिन उद्घाटन के 14वें दिन ही बालू से भरे ओवरलोड ट्रक के गुजरते समय पुल का कुछ भाग ध्वस्त हो गया। इससे सेतु निगम में हड़कंप मच गया। आवागमन ठप हो गया। 18 व 19 नंबर खंभों के बीच स्लेब आरपार टूट गई।
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तत्कालीन लोक निर्माण मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने इसे गंभीरता से लिया और जांच कराई। साथ ही सेतु निगम के डीपीएम सहित आधा दर्जन अभियंताओं को निलंबित कर दिया। दिल्ली आईआईटी टीम ने पुल की जांच की। रिबाउंड हैमर टेस्ट किया। जगह-जगह कंप्यूटराइज्ड उपकरण से पुल की क्षमता और मजबूती जांची।
टीम ने कहा कि जिस स्थान पर पुल टूटा वहां कंकरीट मसाला डालने में लापरवाही बरती गई। सेटिंग टाइम में कुछ अंतर हो गया। जिससे सीमेंट कंकरीट टिकाऊ नहीं रह पाई। बाद में सेतु निगम ने पुल की मरम्मत कर लगभग एक माह बाद इससे आवागमन के लिए शुरू कर दिया।