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बुंदेलियों के मुद्दों पर मौन पीएम कैसे रिझाएंगे!
Tue, 23 Apr 2019 11:07 PM IST
प्रभापुंज मिश्रा
banda
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Published by: प्रभापुंज मिश्रा
Updated Tue, 23 Apr 2019 11:07 PM IST
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बुंदेलखंड में आए दिन खेतिहर मजदूरों के पलायन के ऐसे नजारे दिखते रहते हैं नजर। फाइल फोटो
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो
शासन-प्रशासन की अनदेखी के चलते बदहाली का दंश झेल रहे बुंदेलखंड के बांदा में पांच साल के कार्यकाल में पहली बार आ रहे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर लोगों में उत्सुकता भी है। उत्सुकता इस बात को लेकर भी है कि कार्यकाल के दौरान मौन रहने के बाद बृहस्पतिवार (25 अप्रैल) को बांदा आ रहे प्रधानमंत्री का यहां की ज्वलंत समस्याओं और मुद्दों पर क्या रुख रहता है और कौन-कौन सी घोषणाएं करते हैं, जिससे बुंदेलखंड के बाशिंदों को संजीवनी मिल सके।
बुंदेलखंड के 78 फीसदी लघु सीमांत किसानों का जोत दायरा बढ़ाने की बात रही हो या पलायन, किसानों की आत्महत्याएं और बुंदेलखंड राज्य का मुद्दा, इन सभी पर प्रधानमंत्री ने पूरे कार्यकाल के दौरान चुप्पी साधे रखी। बुंदेलखंड के सांसद द्वारा लोकसभा में भी यह सभी मुद्दे उठाए जाने पर पीएम खामोश रहे। गौरतलब हो कि देश में उत्तर प्रदेश और उत्तर प्रदेश में बुंदेलखंड आत्महत्याओं के मामले में अव्वल है, जिसमें ज्यादातर आत्महत्याएं किसानों की हैं।
-बुंदेलखंड में सामान्य (बड़े) किसान लगभग 25 फीसदी हैं। इन्हें भी कर्जमाफी का लाभ मिले। दैवी आपदा के यह भी शिकार हैं।
-अन्ना प्रथा गंभीर संकट बन चुकी हैं। बुंदेलखंड में छह लाख से ज्यादा अन्ना गायें खेती के लिए चुनौती साबित हो रही हैं। इन पर ठोस कार्ययोजना बनें।
-बुंदेलखंड में भूजल का स्तर साल दर साल गिर रहा है। खेत और पेट दोनों के लिए ही पानी का संकट गहराता जा रहा है। सिंचाई और पीने के पानी के लिए कारगर योजनाओं की तत्काल जरूरत है।
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-वैध और अवैध खनन से बुंदेलखंड की नदियों का अस्तित्व खतरे में है। पर्यावरण को भी भारी क्षति पहुंच रही है। बुंदेलखंड की खनिज संपदा का पूरा लाभ बुंदेलखंड को ही मिलना चाहिए। पर्यावरण की सुरक्षा होनी चाहिए।
-बुंदेलखंड में बिजली का संकट भी अहम मुद्दा है। कटौती मुक्त घोषित होने के बाद भी यहां जमकर कटौती होती है। गांवों को आठ घंटे भी बिजली नहीं मिल रही, जबकि 24 घंटे की दरकार है।
-आर्थिक रूप से समस्याग्रस्त किसान और अन्य बुंदेलखंडी अपनी संतानों को कठिन परिस्थितियों में शिक्षा दे रहे हैं। बुंदेली युवा उच्च शिक्षा हासिल करने के बाद भी रोजगार से वंचित हैं। बुंदेलखंड में बड़े उद्योग लगें तो शिक्षित और अशिक्षित सभी को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष मिलेगा लाभ।
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बुंदेलखंड के 78 फीसदी लघु सीमांत किसानों का जोत दायरा बढ़ाने की बात रही हो या पलायन, किसानों की आत्महत्याएं और बुंदेलखंड राज्य का मुद्दा, इन सभी पर प्रधानमंत्री ने पूरे कार्यकाल के दौरान चुप्पी साधे रखी। बुंदेलखंड के सांसद द्वारा लोकसभा में भी यह सभी मुद्दे उठाए जाने पर पीएम खामोश रहे। गौरतलब हो कि देश में उत्तर प्रदेश और उत्तर प्रदेश में बुंदेलखंड आत्महत्याओं के मामले में अव्वल है, जिसमें ज्यादातर आत्महत्याएं किसानों की हैं।
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-बुंदेलखंड में सामान्य (बड़े) किसान लगभग 25 फीसदी हैं। इन्हें भी कर्जमाफी का लाभ मिले। दैवी आपदा के यह भी शिकार हैं।
-अन्ना प्रथा गंभीर संकट बन चुकी हैं। बुंदेलखंड में छह लाख से ज्यादा अन्ना गायें खेती के लिए चुनौती साबित हो रही हैं। इन पर ठोस कार्ययोजना बनें।
-बुंदेलखंड में भूजल का स्तर साल दर साल गिर रहा है। खेत और पेट दोनों के लिए ही पानी का संकट गहराता जा रहा है। सिंचाई और पीने के पानी के लिए कारगर योजनाओं की तत्काल जरूरत है।
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-वैध और अवैध खनन से बुंदेलखंड की नदियों का अस्तित्व खतरे में है। पर्यावरण को भी भारी क्षति पहुंच रही है। बुंदेलखंड की खनिज संपदा का पूरा लाभ बुंदेलखंड को ही मिलना चाहिए। पर्यावरण की सुरक्षा होनी चाहिए।
-बुंदेलखंड में बिजली का संकट भी अहम मुद्दा है। कटौती मुक्त घोषित होने के बाद भी यहां जमकर कटौती होती है। गांवों को आठ घंटे भी बिजली नहीं मिल रही, जबकि 24 घंटे की दरकार है।
-आर्थिक रूप से समस्याग्रस्त किसान और अन्य बुंदेलखंडी अपनी संतानों को कठिन परिस्थितियों में शिक्षा दे रहे हैं। बुंदेली युवा उच्च शिक्षा हासिल करने के बाद भी रोजगार से वंचित हैं। बुंदेलखंड में बड़े उद्योग लगें तो शिक्षित और अशिक्षित सभी को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष मिलेगा लाभ।