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काली मिट्टी का सफेद सोना बुंदेलखंड से हुआ दूर

Mon, 03 Dec 2018 11:08 PM IST
Updated Mon, 03 Dec 2018 11:08 PM IST
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काली मिट्टी का सफेद सोना बुंदेलखंड से हुआ दूर
बांदा। काली मिट्टी में पैदा होने वाला ‘सफेद सोना’ यानी कपास अब बुंदेलखंड में हाशिए पर आ गई है। इसकी रुई से कीमती और शाही लिबास तैयार होते हैं। कभी किसानों को मालामाल करने वाली कपास के प्रति किसानों का रुझान तेजी से घटा है। मौजूदा परिस्थितियां यह है कि पिछले वर्ष के खरीफ सीजन में चित्रकूटधाम मंडल में 500 हेक्टेयर में कपास की बुवाई का लक्ष्य रखा गया था, लेकिन किसान इससे कन्नी काट गए। हालांकि कृषि विभाग 128 हेक्टेयर में कपास की बुवाई का दावा कर रहा है। लेकिन यह कहां बोई गई? इसके आंकड़े नहीं हैं।
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बुंदेलखंड में सांवा, कोदो के साथ कपास की खेती होती रही है। कुछ दशकों पूर्व बांदा और चित्रकूट कपास की खेती के गढ़ थे। यहां उत्पादित कपास देश के अलावा एशिया तक की कपड़ा मिलों में जाती थी। कोलकाता, जबलपुर, पटना, कानपुर के बड़े व्यापारी यहां की मंडियों से कपास खरीदने आते थे। यहां की काली मिट्टी में यह सफेद सोना जमकर पैदा होता था। बुंदेलखंड के अधिकांशत: क्षेत्रों में 1980 तक कपास की खेती होती रही है।
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इसके बाद दैवी आपदाओं, अन्ना प्रथा व बिक्री के लिए बाजार की व्यवस्था न होने से किसानों ने कपास की खेती से किनारा कर लिया। इस पुरानी परंपरागत खेती को फिर बहाल करने के लिए इस साल खरीफ में सरकार ने चित्रकूटधाम मंडल में लगभग 500 हेक्टेयर का कपास खेती के लिए लक्ष्य रखा। कृषि विभाग 128 हेक्टेयर में बुआई का दावा कर रहा है। लेकिन पैदावार का लेखा-जोखा उसके पास नहीं है। उप कृषि निदेशक एके सिंह का कहना है कि किसानों को कपास का बीज दिया गया था। बुआई भी हुई। लेकिन अन्ना प्रथा के चलते पैदावार नहीं हो पाई।
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4 माह में तैयार होती है कपास
बांदा। कपास की बुआई मध्य जुलाई तक की जाती है। साढ़े तीन से चार माह में तैयार हो जाती है। इसकी पैदावार मुख्यत: काली (मार) मिट्टी में होती है।

प्रचार प्रसार का रहा अभाव
बांदा। सर्वोदय कार्यकर्ता व जखनी गांव के किसान उमाशंकर पांडेय का कहना है कि कपास की खेती यहां से पूरी तरह खत्म हो चुकी है। इसके लिए कुदरत के साथ सरकारें भी जिम्मेदार हैं। इस साल कपास की खेती की शुरुआत किए जाने की अच्छी पहल थी। लेकिन किसानों का इसका पता ही नहीं चला। ब्यूरो
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