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Balrampur News: नाला नहीं, अब सुआंव नदी बोलिए...
Fri, 08 May 2026 11:34 PM IST
लखनऊ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, बलरामपुर
संवाद न्यूज एजेंसी, बलरामपुर
Updated Fri, 08 May 2026 11:34 PM IST
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फोटो-37-बलरामपुर में स्थित सुआंव नदी।-संवाद
बलरामपुर। वर्षों से सुआंव नाला के नाम से पहचानी जाने वाली जलधारा को अब आधिकारिक रूप से सुआंव नदी का दर्जा मिल गया है। राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) के आदेश के अनुपालन में जिला प्रशासन और जिला गंगा समिति ने शुक्रवार को अधिसूचना जारी कर राजस्व अभिलेखों में दर्ज नाम को संशोधित करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। अब सभी सरकारी दस्तावेजों, नक्शों और विभागीय अभिलेखों में इस जलधारा को सुआंव नदी के नाम से दर्ज किया जाएगा।
यह फैसला बलरामपुर और सिद्धार्थनगर जनपद में पर्यावरण संरक्षण, नदी पुनर्जीवन और बाढ़ क्षेत्र प्रबंधन की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है। लंबे समय से स्थानीय स्तर पर इसे नदी के रूप में देखा जाता रहा, लेकिन सरकारी अभिलेखों में नाला दर्ज होने के कारण इसके संरक्षण और विकास कार्यों में कई व्यावहारिक दिक्कतें सामने आती थीं। प्रभागीय वनाधिकारी एवं जिला गंगा समिति के सदस्य सचिव गौरव गर्ग ने बताया गया है कि एनजीटी में विचाराधीन वाद संख्या 433/2022, पाटेश्वरी प्रसाद सिंह बनाम उत्तर प्रदेश सरकार व अन्य में 15 जनवरी 2026 को पारित आदेश के अनुपालन में यह कार्रवाई की गई है। एनजीटी ने बलरामपुर और सिद्धार्थनगर के जिलाधिकारियों को सुआंव नदी के सक्रिय बाढ़ क्षेत्र और फ्लड प्लेन जोन की पहचान सुनिश्चित करने, अतिक्रमण रोकने तथा नदी बेसिन के संरक्षण के लिए प्रभावी कार्रवाई करने के निर्देश दिए थे।
अड़ारपाकड़ की झील से हुआ है उद्गम, 120 किमी. लंबी है नदी
सुआंव नदी का उद्गम जनपद के गोपियापुर क्षेत्र स्थित राजस्व ग्राम अड़ारपाकड़ की झील से माना गया है, जबकि इसका संगम उतरौला तहसील के रसूलाबाद गांव के पास राप्ती नदी में होता है। लगभग 120 किलोमीटर लंबी यह नदी शहर के बीचोंबीच बहते हुए आगे बढ़ती है। नदी को नया दर्जा मिलने के साथ ही प्रशासन ने इसके पुनर्जीवन और विकास की तैयारी भी तेज कर दी है। प्रस्तावित योजना के तहत नदी का सीमांकन कर लगभग 20 मीटर तक चौड़ीकरण किया जाएगा। बीते वर्ष इसका सर्वे कराया जा चुका है। नदी किनारे हुए अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई होगी ताकि जल प्रवाह सुचारु बना रहे और बरसात के दौरान जलभराव की समस्या कम हो सके। नदी किनारे तटबंध निर्माण और बड़े पैमाने पर पौधरोपण की भी योजना है। वन विभाग द्वारा हरित पट्टी विकसित की जाएगी, जिससे मिट्टी कटान रुकेगा और जैव विविधता को बढ़ावा मिलेगा। साथ ही नगर और ग्रामीण क्षेत्रों के ड्रेनेज सिस्टम को वैज्ञानिक तरीके से नदी से जोड़े जाने की योजना बनाई गई है, ताकि गंदे पानी का अनियंत्रित बहाव रोका जा सके।
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औद्योगिक इकाइयों को भी एनजीटी कोर्ट ने दिए गए निर्देश
एनजीटी ने अपने आदेश में बलरामपुर चीनी मिल और बजाज मिल जैसी औद्योगिक इकाइयों को पर्यावरणीय सामाजिक उत्तरदायित्व (ईएसआर/सीएसआर) मद से सुआंव नदी बेसिन में संरक्षण कार्यों में सहयोग देने के निर्देश दिए हैं। इसके तहत वनीकरण, मिट्टी संरक्षण, चारागाह विकास और सुधार कार्य कराए जाएंगे। इन परियोजनाओं की निगरानी जिला गंगा समितियों के माध्यम से होगी। प्रशासन का कहना है कि यह केवल नाम परिवर्तन नहीं, बल्कि नदी के अस्तित्व, उसकी पारिस्थितिकी और पर्यावरणीय महत्व को औपचारिक मान्यता देने का प्रयास है। अधिकारियों के अनुसार इससे भविष्य में नदी संरक्षण योजनाओं को लागू करने में आसानी होगी और अतिक्रमण व प्रदूषण पर प्रभावी नियंत्रण भी किया जा सकेगा।
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यह फैसला बलरामपुर और सिद्धार्थनगर जनपद में पर्यावरण संरक्षण, नदी पुनर्जीवन और बाढ़ क्षेत्र प्रबंधन की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है। लंबे समय से स्थानीय स्तर पर इसे नदी के रूप में देखा जाता रहा, लेकिन सरकारी अभिलेखों में नाला दर्ज होने के कारण इसके संरक्षण और विकास कार्यों में कई व्यावहारिक दिक्कतें सामने आती थीं। प्रभागीय वनाधिकारी एवं जिला गंगा समिति के सदस्य सचिव गौरव गर्ग ने बताया गया है कि एनजीटी में विचाराधीन वाद संख्या 433/2022, पाटेश्वरी प्रसाद सिंह बनाम उत्तर प्रदेश सरकार व अन्य में 15 जनवरी 2026 को पारित आदेश के अनुपालन में यह कार्रवाई की गई है। एनजीटी ने बलरामपुर और सिद्धार्थनगर के जिलाधिकारियों को सुआंव नदी के सक्रिय बाढ़ क्षेत्र और फ्लड प्लेन जोन की पहचान सुनिश्चित करने, अतिक्रमण रोकने तथा नदी बेसिन के संरक्षण के लिए प्रभावी कार्रवाई करने के निर्देश दिए थे।
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अड़ारपाकड़ की झील से हुआ है उद्गम, 120 किमी. लंबी है नदी
सुआंव नदी का उद्गम जनपद के गोपियापुर क्षेत्र स्थित राजस्व ग्राम अड़ारपाकड़ की झील से माना गया है, जबकि इसका संगम उतरौला तहसील के रसूलाबाद गांव के पास राप्ती नदी में होता है। लगभग 120 किलोमीटर लंबी यह नदी शहर के बीचोंबीच बहते हुए आगे बढ़ती है। नदी को नया दर्जा मिलने के साथ ही प्रशासन ने इसके पुनर्जीवन और विकास की तैयारी भी तेज कर दी है। प्रस्तावित योजना के तहत नदी का सीमांकन कर लगभग 20 मीटर तक चौड़ीकरण किया जाएगा। बीते वर्ष इसका सर्वे कराया जा चुका है। नदी किनारे हुए अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई होगी ताकि जल प्रवाह सुचारु बना रहे और बरसात के दौरान जलभराव की समस्या कम हो सके। नदी किनारे तटबंध निर्माण और बड़े पैमाने पर पौधरोपण की भी योजना है। वन विभाग द्वारा हरित पट्टी विकसित की जाएगी, जिससे मिट्टी कटान रुकेगा और जैव विविधता को बढ़ावा मिलेगा। साथ ही नगर और ग्रामीण क्षेत्रों के ड्रेनेज सिस्टम को वैज्ञानिक तरीके से नदी से जोड़े जाने की योजना बनाई गई है, ताकि गंदे पानी का अनियंत्रित बहाव रोका जा सके।
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औद्योगिक इकाइयों को भी एनजीटी कोर्ट ने दिए गए निर्देश
एनजीटी ने अपने आदेश में बलरामपुर चीनी मिल और बजाज मिल जैसी औद्योगिक इकाइयों को पर्यावरणीय सामाजिक उत्तरदायित्व (ईएसआर/सीएसआर) मद से सुआंव नदी बेसिन में संरक्षण कार्यों में सहयोग देने के निर्देश दिए हैं। इसके तहत वनीकरण, मिट्टी संरक्षण, चारागाह विकास और सुधार कार्य कराए जाएंगे। इन परियोजनाओं की निगरानी जिला गंगा समितियों के माध्यम से होगी। प्रशासन का कहना है कि यह केवल नाम परिवर्तन नहीं, बल्कि नदी के अस्तित्व, उसकी पारिस्थितिकी और पर्यावरणीय महत्व को औपचारिक मान्यता देने का प्रयास है। अधिकारियों के अनुसार इससे भविष्य में नदी संरक्षण योजनाओं को लागू करने में आसानी होगी और अतिक्रमण व प्रदूषण पर प्रभावी नियंत्रण भी किया जा सकेगा।