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Ballia News: विहंगम योग समारोह का आगाज
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रसड़ा। ईश्वर का महान प्रसाद है मानव जीवन। हमारे भीतर अनन्त की शक्ति है। अनन्त आनंद का श्रोत है। आत्मा के अंदर अन्तरात्मा रूप से ईश्वर ही विराजमान है। आवश्यकता है आध्यामिक ज्ञान की, स्वर्वेद सद्ज्ञान की, विहंगम योग के ध्यान की, जिसके आलोक में एक साधक का जीवन सर्वोन्मुखी विकास होता है।
उक्त उद्गार विहंगम योग संस्थान के संत प्रवर विज्ञानदेव महाराज ने देवस्थली विद्यापीठ परिसर में आयोजित प्रथम परंपरा सद्गुरु आचार्य धर्मचंद्र देव महाराज की 54वीं पुण्यतिथि एवं गुरु पूर्णिमा पर दोदिवसीय विहंगम योग समारोह के प्रथम दिवस पर श्रद्धालुओं के मध्य व्यक्त की। कहा कि विहंगम योग के प्रथम परम्परा सद्गुरु आचार्य धर्मचंद्रदेव महाराज का जीवन संपूर्ण विश्व की मानवता को एक दिव्य आध्यात्मिक संदेश दे रहा है।
महापुरुषों के आविर्भाव एवं तिरोभाव पर उत्सव का आयोजन करना हमारे देश की परम्परा रही है। उन्होंने कहा कि भारत आध्यात्मिक महापुरुषों के बल पर ही विश्व का गुरु रहा है, विश्व का गुरु है और विश्व का गुरु रहेगा। जीवन जीने में ही जीवन बीत न जाए बल्कि जीवन है क्या इसका अनुभव हो जाय। मैं कौन हूँ? कहां से आया? क्या कर रहा और जाना कहाँ हैं? इसका ज्ञान हो जाय। जीवन और सत्य दो वस्तु नहीं, जीवन कहें या सत्य कहें। जीवन मे जो सबसे महत्वपूर्ण है वह कुछ अन्य नहीं, जीवन की वास्तविकता ही है। क्योंकि जीवन का आधार परमात्मा है। स्वर्वेद के दोहों की संगीतमय प्रस्तुति से सभी मंत्रमुग्ध हो उठे।
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इसके पूर्व शारीरिक आरोग्यता के निमित्त आश्रम के कुशल योग प्रशिक्षकों द्वारा आसन प्राणायाम एवं ध्यान का सत्र संचालित हुआ। इसमे हजारों योग साधक अनेक असाध्य रोगों से निजात पाने का गुर सीखे। कुशल चिकित्सकों द्वारा योग, आयुर्वेदिक, पंचगव्य आदि द्वारा चिकित्सा परामर्श दिया जा रहा है।
मानव मन की शांति के लिए आगत नए जिज्ञासुओं को विहंगम योग के क्रियात्मक साधना विधि का उपदेश भी दिया जा रहा है। 2100 कुंडीय विश्व शांति वैदिक महायज्ञ में हजारों दंपति एक साथ वैदिक मंत्रोच्चारण के बीच यज्ञ कुंड में आहुतियों को प्रदान करेंगे।
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उक्त उद्गार विहंगम योग संस्थान के संत प्रवर विज्ञानदेव महाराज ने देवस्थली विद्यापीठ परिसर में आयोजित प्रथम परंपरा सद्गुरु आचार्य धर्मचंद्र देव महाराज की 54वीं पुण्यतिथि एवं गुरु पूर्णिमा पर दोदिवसीय विहंगम योग समारोह के प्रथम दिवस पर श्रद्धालुओं के मध्य व्यक्त की। कहा कि विहंगम योग के प्रथम परम्परा सद्गुरु आचार्य धर्मचंद्रदेव महाराज का जीवन संपूर्ण विश्व की मानवता को एक दिव्य आध्यात्मिक संदेश दे रहा है।
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महापुरुषों के आविर्भाव एवं तिरोभाव पर उत्सव का आयोजन करना हमारे देश की परम्परा रही है। उन्होंने कहा कि भारत आध्यात्मिक महापुरुषों के बल पर ही विश्व का गुरु रहा है, विश्व का गुरु है और विश्व का गुरु रहेगा। जीवन जीने में ही जीवन बीत न जाए बल्कि जीवन है क्या इसका अनुभव हो जाय। मैं कौन हूँ? कहां से आया? क्या कर रहा और जाना कहाँ हैं? इसका ज्ञान हो जाय। जीवन और सत्य दो वस्तु नहीं, जीवन कहें या सत्य कहें। जीवन मे जो सबसे महत्वपूर्ण है वह कुछ अन्य नहीं, जीवन की वास्तविकता ही है। क्योंकि जीवन का आधार परमात्मा है। स्वर्वेद के दोहों की संगीतमय प्रस्तुति से सभी मंत्रमुग्ध हो उठे।
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इसके पूर्व शारीरिक आरोग्यता के निमित्त आश्रम के कुशल योग प्रशिक्षकों द्वारा आसन प्राणायाम एवं ध्यान का सत्र संचालित हुआ। इसमे हजारों योग साधक अनेक असाध्य रोगों से निजात पाने का गुर सीखे। कुशल चिकित्सकों द्वारा योग, आयुर्वेदिक, पंचगव्य आदि द्वारा चिकित्सा परामर्श दिया जा रहा है।
मानव मन की शांति के लिए आगत नए जिज्ञासुओं को विहंगम योग के क्रियात्मक साधना विधि का उपदेश भी दिया जा रहा है। 2100 कुंडीय विश्व शांति वैदिक महायज्ञ में हजारों दंपति एक साथ वैदिक मंत्रोच्चारण के बीच यज्ञ कुंड में आहुतियों को प्रदान करेंगे।