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गर्मी का मौसम आते ही शुरु हो जाता है जलस्तर का खिसकना

Sun, 21 Mar 2021 11:16 PM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Sun, 21 Mar 2021 11:16 PM IST
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The heat has knocked, the water level has started slipping
बलिया। विश्व जल दिवस पर हर साल बड़े-बड़े कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है लेकिन जलस्तर को बचाने के लिए ठोस उपाय नहीं किए जाते हैं। यही कारण है जिले के अधिकांश इलाकों में गर्मी का मौसम आते ही जलस्तर खिसकना शुरू हो जाता है। रसड़ा ब्लॉक क्षेत्र तो अभी सेमी क्रिटिकल जोन में है।
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जिले में कुल 17 ब्लॉक हैं। भूगर्भ विभाग की ओर से जिले में औसत जलस्तर प्री मानसून न्यूनतम 7.20 मी. और अधिकतम 8.10 मीटर तथा पोस्ट मानसून न्यूनतम 7.05 और अधिकतम 8.75 मीटर मापा गया है। विभाग का मानना है कि जिले में गर्मी के दिनों में औसत एक से डेढ़ मीटर तक जलस्तर खिसकता है। भूगर्भ विभाग की रिपोर्ट के अनुसार पिछले 10 सालों में जनपद के 16 ब्लॉकों में एक से 10 सेमी जलस्तर प्रतिवर्ष कम हुआ तो रसड़ा ब्लॉक में 20 से 30 सेमी प्रतिवर्ष जलस्तर कम हुआ। इसके आधार पर रसड़ा ब्लॉक क्षेत्र को विभाग ने क्रिटिकल जोन घोषित किया है।
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हालांकि इसके बाद रसड़ा क्षेत्र में भूजल स्तर बचाने के लिए शासन स्तर से कई तरह की कवायद की गई और जल संरक्षण को लेकर खेत तालाब योजना का संचालन किया गया। इसके तहत, वर्ष 2017-18 में 22 और 2018-19 में 12 तालाबों की खुदाई कराई गई। इसके अलावा, वर्ष 2017-18 में शुरू हुई पं. दीनदयाल उपाध्याय किसान समृद्धि योजना के तहत रसड़ा क्षेत्र में मेड़बंदी और वृक्षारोपण कराया गया ताकि भूमि संरक्षण के साथ जल संचयन भी हो सके। वर्ष 2019-20 और 2020-21 में कुल 30 तालाब बनवाए गए। भूमि संरक्षण विभाग के अनुसार इस इलाके में जलस्तर में सुधार होने के कारण इसे अब सेमी क्रिटिकल जोन में शामिल किया गया है।
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100 साल पहले के तालाब और पोखरे खोते जा रहे अस्तित्व
बलिया। करीब 100 साल पहले जिले के गांवों और नगरीय क्षेत्रों में कुल 1347 पोखरे और गड़हियों के साथ ही 1160 कुएं भी थे। अधिकांश गड़हियों-पोखरे पर अतिक्रमण है और कुएं को भरकर उस पर निर्माण करा लिए गए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इन पुराने पोखरे-गड़ही और कुएं से अतिक्रमण हटाने का आदेश दिया है लेकिन इसका अनुपालन आज तक जिले में नहीं हो सका। आलम यह है कि यह पोखरे-गड़हियां और कुएं खोजे नहीं मिलेंगे।
पुराने जमाने के बने तालाब, पोखरा, गड़ही, कुंआ आदि की भूमिका जल संचयन में काफी अहम माना जाता है। इसे सुरक्षित रखने के लिए कई साल पहले सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया। इसके बावजूद, इन गड़ही, पोखरे और कुंआ को सुरक्षित करने के लिए कोई ठोस कार्रवाई नहीं होती। इसके चलते पुराने जमाने के पोखरे, तालाब, गड़ही, कुंआ आदि का अस्तित्व मिटता जा रहा है। सरकार की ओर से जल संचयन को लेकर तालाब, पोखरे खोदवाने पर काफी जोर है।
13 सालों में बने 1607 तालाब और पोखरे
बलिया। वर्ष 2007-08 से वर्ष 2020-21 तक जिले में मनरेगा से कुल 1607 तालाबों का निर्माण कराया गया। इसके अलावा, हर साल औसत 250 तालाबों का जीर्णोद्धार किया जाता रहा है लेकिन इन तालाबों पर धीरे-धीरे अतिक्रमण होता गया और राजस्व विभाग की ओर से इसे रोकने के लिए कोई कार्रवाई नहीं की गई। खर्च का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि बीते चार सालों में ही तालाबों के जीणोद्घार पर करीब 19 करोड़ खर्च किए हैं। इसमें वर्ष 2015-16 में 320 तालाबों पर 4.12 करोड़, वर्ष 16-17 में 570 तालाबों पर 7.24 करोड़ और वर्ष 17-18 में 278 तालाबों पर 4.47 करोड़ एवं वर्ष 18-19 में 323 तालाबों पर तीन करोड़ 64 लाख 99 हजार, 19-20 में 203 तालाबों पर 3.9 करोड़ और 20-21 में 215 तालाबों के जीर्णोद्धार दो करोड़ की धनराशि खर्च की गई है।
भूमिगत जलस्तर का खिसकना भविष्य के लिए खतरे की घंटी: डॉ गणेश
अमरनाथ मिश्र स्नातकोत्तर महाविद्यालय दूबेछपरा के भूगोल के पूर्व विभागाध्यक्ष और पर्यावरणविद् डॉ. गणेश कुमवार पाठक ने कहा कि वर्तमान जल संकट मानव की भोगवादी प्रवृत्ति, विलासिता पूर्ण जीवन, अनियोजित और अनियंत्रित विकास एवं जल की शोषणपरक नीति की देन है। जल स्रोतों के अनियोजित एवं अनियंत्रित उपयोग के चलते एक तरफ जहां जल की बर्बादी से जल संकट की स्थिति उत्पन्न हो रही है। वहीं, दूसरी तरफ जल प्रदूषण में भी तीव्रगति से वृद्धि होती जा रही है। कहा कि जल सृष्टि का आदि तत्व है। जल न केवल जीवन को धारण करता है, बल्कि स्वयं जीवन प्राण है। यही कारण है कि भारतीय संस्कृति में जल को देवता मानकर जल स्रोतों की सुरक्षा एवं संरक्षण हेतु पूजा का विधान बनाया गया है। बताया कि हमारी पृथ्वी पर जो जल विद्यमान है, उसमें से मात्र 0.8 प्रतिशत जल ही पीने योग्य है। शेष 97.4 प्रतिशत जल खारा जल के रूप में समुद्रों में एवं 1.8 प्रतिशत जल ध्रुवों पर बर्फ के रूप में विद्यमान है। प्रकृति में विद्यमान 1.5 बिलियन क्यूबिक किमी जल में से मात्र 12500 से 19000 बिलियन लीटर जल ही प्रतिवर्ष मानवीय उपयोग हेतु उपलब्ध है। कहा कि देश में जल उपलब्धता देखी जाए तो वर्ष 1947 में 40 करोड़ की जनसंख्या के लिए 5000 घनमीटर जल प्रति व्यक्ति उपलब्ध था, जबकि वर्ष 2000 में 100 करोड़ जनसंख्या के लिए जल उपलब्धता घटकर 2000 घनमीटर प्रति व्यक्ति प्रतिवर्ष हो गई। एक अनुमान के अनुसार, 2025 में 139 करोड़ जनसंख्या के लिए प्रति व्यक्ति प्रतिवर्ष मात्र 1500 घनमीटर जल उपलब्ध होगा। जबकि 2050 में 160 करोड़ जनसंख्या के लिए मात्र 1000 घनमीटर जल प्रति व्यक्ति प्रतिवर्ष उपलब्ध होगा, जो घोर जल संकट की तरफ इंगित करता है। बताया कि धरातलीय जल स्रोत सूखते जा रहे हैं एवं भूमिगत जलस्तर नीचे खिसकता जा रहा है, जो भविष्य के लिए खतरे की घंटी है।

भूगर्भ जलस्तर को सुरक्षित रखने के लिए अलग-अलग विभागों की ओर से कार्य किए जा रहे हैं। जल ही जीवन है, इसके प्रति आमलोगों को भी जागरूक होने की आवश्यकता है। पुराने तालाब, पोखरी आदि पर अतिक्रमण आदि की शिकायत मिलने पर कार्रवाई कर अतिक्रमणमुक्त कराने का कार्य राजस्व विभाग की ओर से किया जाता है। - रामआसरे, एडीएम, बलिया
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