Ballia: प्रोफेसर शुभनीत कौशिक बोले- सत्ताधारी दल राष्ट्रीय आंदोलन की विरासत पर लगातार बोल रहा हमला
प्रोफेसर शुभनीत कौशिक ने कहा कि कांग्रेस को जवाहरलाल नेहरू द्वारा नियति के साथ किए गए उस वायदे को भी अपने दिलों में रखना होगा, जिसमें हर आंख से आंसू पोंछने की बात शामिल है।
विस्तार
सतीश चंद्र कॉलेज बलिया के असिस्टेंट प्रोफेसर शुभनीत कौशिक ने कहा कि राष्ट्रीय आंदोलन के मूल्यों पर अमल करने का वक्त है। नई पीढ़ी को राष्ट्रीय आंदोलन के मूल्यों और उसकी समृद्ध विरासत से परिचित कराना होगा।
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अधिवेशन एक ऐसे मुश्किल दौर में हो रहा है, जब भारत में धर्म, जाति, भाषा, वर्ग तमाम स्तरों पर विभेदों की खाई दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है। उस पर से बंटवारे की विकृत मानसिकता को सत्ताधारी दल द्वारा लगातार शह दी जा रही है। ऐसे में भारत के मन को जोड़ने का जो जिम्मा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने उठाया है, वह उसकी समृद्ध विरासत के अनुरूप ही है। राष्ट्रीय आंदोलन की वह विरासत जिसमें गांधी, नेहरू, सरदार पटेल, आजाद, आंबेडकर, राजाजी, आचार्य नरेंद्र देव, जयप्रकाश नारायण, डॉ. लोहिया सरीखे नेताओं का खून-पसीना शामिल है।
सत्ताधारी दल और उसके संगठनों द्वारा आज राष्ट्रीय आंदोलन की विरासत पर लगातार हमला बोला जा रहा है कथनी और करनी दोनों में। प्रिंट-इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और सोशल मीडिया पर वर्चस्व स्थापित कर नई पीढ़ी को गुमराह करने की जो कोशिश पिछले दस-पंद्रह वर्षों में हुई है, उसने लोगों के दिलो-दिमाग में समुदाय विशेष के प्रति नफरत पैदा करने का काम किया है। इसके जवाब में हमें तथ्यों से लैस होकर प्रोपेगेंडा के इस घटाटोप को भेदना होगा। इंटरनेट, सोशल मीडिया या जो भी मंच हमें उपलब्ध हो सकें, वहां से हमें इस प्रोपेगेंडा का जवाब देना होगा और नई पीढ़ी को राष्ट्रीय आंदोलन के मूल्यों और उसकी समृद्ध विरासत से परिचित कराना होगा।
न करें विफलता की परवाह :
कांग्रेस को जवाहरलाल नेहरू द्वारा नियति के साथ किए गए उस वायदे को भी अपने दिलों में रखना होगा, जिसमें हर आंख से आंसू पोंछने की बात शामिल है। हमें इस संकल्प-पथ पर पूरी दृढ़ता और प्रतिबद्धता के साथ चलना होगा, सफलता या विफलता की परवाह किए बगैर।
सामाजिक असमानता-आर्थिक विषमता में बेतहाशा वृद्धि :
जहां एक ओर वैचारिक स्तर पर हिंदुस्तान में नफरत की हवा बहाई जा रही है, वहीं दूसरी ओर पिछले एक दशक में सामाजिक असमानता और आर्थिक विषमता में भी बेतहाशा वृद्धि हुई है। ग्लोबल हंगर इंडेक्स से लेकर तमाम वैश्विक सूचकांक इस बात की गवाही देते हैं। नोटबंदी, कोविड की महामारी के दौरान सरकार द्वारा बिना सोचे-विचारे लिए गए फैसलों ने हिंदुस्तान के गरीब तबके की हालत खस्ता कर दी है।