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भक्तमाल कथा में उमड़े श्रद्धालु
ब्यूरो/अमर उजाला/ बलिया
Updated Tue, 22 Dec 2015 09:16 PM IST
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संत मात्र प्रणाम करने योग्य नहीं बल्कि उनके अद्भूत एवं अनुकरणीय आचरण को निजी जीवन में चरितार्थ करने से ही मानव जीवन मुक्त होकर श्रीकृष्ण लीला एवं चरित्र बन जाता है।
जरूरत है मानव भक्तमाल की तरह भागवत कथा का श्रोता बनने की। भागवत कथा के प्रमुख श्रोता स्वयं सच्चिदानंद ब्रह्म माधव जी महाराज होते हैं। यह बातें श्री भक्तमाल कथा के दूसरे दिन कथा मर्मज्ञ पूज्य संत श्री चित्र विचित्र महाराज ने मंगलवार को टाउन हाल में कहीं।
उन्होंने कहा कि भगवान नित्य अपने गोलोकधाम में बैठकर भक्तों की अमृत कथा का रसपान करते है। वे स्वयं भगवत कथा के अनादि एवं अनंत रसिक हैं।
भक्ति, भक्त, भगवंत तथा सदगुरु परिलक्षित सिर्फ चार रूपों में होते है। मूलत: सभी मिलकर वे ब्रह्मा भाव है। संतों का हृदय ही ठाकुर जी महाराज का घर है। व्यक्ति को चाहिए की मन रूपी वृंदावन में किशोरी जी व श्रीकृष्ण का अनवरत अनुभूति करते रहे। यही भगवत कृपा है।
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गुरु की अमृतमयी महिमा का बखान करते हुए उन्होंने कहा कि सदगुरु का प्रत्येक वाक्य शास्त्र व पुराण है। आवश्यकता है शिष्य में गुरु के प्रति समर्पण भाव विद्यमान रहे। कहा कि कलिकाल में घोर नास्तिक भगवान का अनवरत नाम लेने से मोक्ष की प्राप्ति होती है।
कथा का आरंभ श्री बांके बिहारी तेरी आरती गांऊ, आरती गांऊ मैं तुझको बुलाऊं से हुई...। इस दौरान नगर सहित ग्रामीण इलाकों से सैकड़ों श्रद्धालु मौजूद रहे।
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जरूरत है मानव भक्तमाल की तरह भागवत कथा का श्रोता बनने की। भागवत कथा के प्रमुख श्रोता स्वयं सच्चिदानंद ब्रह्म माधव जी महाराज होते हैं। यह बातें श्री भक्तमाल कथा के दूसरे दिन कथा मर्मज्ञ पूज्य संत श्री चित्र विचित्र महाराज ने मंगलवार को टाउन हाल में कहीं।
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उन्होंने कहा कि भगवान नित्य अपने गोलोकधाम में बैठकर भक्तों की अमृत कथा का रसपान करते है। वे स्वयं भगवत कथा के अनादि एवं अनंत रसिक हैं।
भक्ति, भक्त, भगवंत तथा सदगुरु परिलक्षित सिर्फ चार रूपों में होते है। मूलत: सभी मिलकर वे ब्रह्मा भाव है। संतों का हृदय ही ठाकुर जी महाराज का घर है। व्यक्ति को चाहिए की मन रूपी वृंदावन में किशोरी जी व श्रीकृष्ण का अनवरत अनुभूति करते रहे। यही भगवत कृपा है।
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गुरु की अमृतमयी महिमा का बखान करते हुए उन्होंने कहा कि सदगुरु का प्रत्येक वाक्य शास्त्र व पुराण है। आवश्यकता है शिष्य में गुरु के प्रति समर्पण भाव विद्यमान रहे। कहा कि कलिकाल में घोर नास्तिक भगवान का अनवरत नाम लेने से मोक्ष की प्राप्ति होती है।
कथा का आरंभ श्री बांके बिहारी तेरी आरती गांऊ, आरती गांऊ मैं तुझको बुलाऊं से हुई...। इस दौरान नगर सहित ग्रामीण इलाकों से सैकड़ों श्रद्धालु मौजूद रहे।