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आखिर कब होगा दियारांचल क्षेत्र के जमीनों का सीमांकन
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बलिया। जिले का क्षेत्रफल तीन तरफ से बिहार से लगा हुआ है। इसके चलते दियरांचल क्षेत्र के खेतों में खेती करना किसानों के लिए बड़ा मुद्दा दशकों से बना हुआ है। हर वर्ष किसी न किसी दियारा क्षेत्र में यूपी व बिहार के किसानों के बीच खूनी झड़प होती है और जानें भी जाती हैं। खासकर गंगा किनारे के दियारा क्षेत्र का निश्चित सीमांकन नहीं होने कारण यह परेशानी का सबब बना हुआ है। लेकिन इसके बाद भी न तो किसी दल ने इसे गंभीरता से लिया है ना ही इसके लिए काम ही किया।
जनपद तीन ओर से बिहार प्रांत की सीमाओं से सटा हुआ है। कहीं गंगा तो कही सरयू नदी यूपी-बिहार की सीमा पर बहती हैं। खासकर गंगा किनारे के गांवों के किसानों की जमीन गंगा के दियरांचल इलाके में है। बताया जाता है कि गंगा की धारा परिवर्तित होते रहने के कारण खेतों की भी भौगोलिक स्थिति बदलती रही जो यूपी व बिहार के किसानों के बीच टकराव का कारण बनती है। जिले में बड़का खेत दियारा लेकर हांसनगर तक करीब 10 हजार एकड़ की खेती पर हर साल दोनों तरफ बंदूकें भी तनती हैं और कई बार खूनी संघर्ष में किसानों की जान भी गई है। लेकिन इसको लेकर सरकारों की ओर से स्थाई समाधान नहीं किया जा रहा है। अब यह मामला मुद्दा बनता जा रहा है क्योंकि किसानों के खेत ही उनकी जीविका के मुख्य साधन हैं।
त्रिवेदी आयोग के सीमांकन वाले कई पिलर गायब
यूपी व बिहार के किसानों के बीच सात दशक से गंगा उस पार के मौजे को लेकर विवाद चल रहा है। काफी प्रयास के बाद वर्ष 1962 में यूपी-बिहार सीमा विवाद को सुलझाने के सीएम त्रिवेदी आयोग का गठन किया गया। आयोग ने दोनों पक्षों के कागजात आदि परखने के बाद वर्ष 1971 में जमीन की पैमाईश कर यूपी-बिहार के सीमाओं का सीमांकन पिलर स्थापित किया गया। आज भी कई इलाकों में यह पिलर देखने को मिल जाते हैं। लेकिन हांसनगर दियारा क्षेत्र के यूपी के गांव भड़सर, दुबहड़, धरनीपुर, अगरौली, हल्दी, बिहारीपुर, बाबू बेल, गायघाट, पचरुखिया, नारायणपुर, मीनापुर, दूबे छपरा, उदयीछपरा के डेरा और बिहार क्षेत्र के गांव नैनीजोर पूर्वी, पश्चिमी, छोटकी नैनीजोर, सपही, नीमेज, धर्मागतपुर आदि इलाके में यह पिलर नहीं मिलते। लोगों की मानें तो जानबूझ कर सीमांकन मिटाया गया।
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बिहार सीमा में स्थित खेतों को लेकर असहाय हो जाते हैं किसान
गंगा उस पार लंबे समय से चला आ रहा यूपी-बिहार सीमा विवाद ज्यों का त्यों है। कई इलाकों में किसान यूपी के हैं लेकिन उनका खेत बिहार की सीमा में हो गया है। हर साल इसका खामियाजा किसानों को भुगतना पड़ता है। फसल कटाई व बोआई के समय यूपी के किसानों की सांसें अटकी रहती हैं। बिहार के दबंग किसान कब आकर उनके खेतों की जोताई कर अपना बता देंगे या फसलों को बंदूक के बल पर काट ले जाएंगे, यह किसी को पता नहीं है। गंगा उस पार खेत होने के कारण किसान भी पूरी तरह से असहाय दिखते हैं। बतौर उदाहरण बाबू बेल दियारा में बिहार के दबंग किसान कभी खेतों की जोताई कर देते हैं तो कभी फसलों को बंदूक के बल पर काट ले जाते हैं। खेत बिहार में होने के कारण किसान असहाय हो जाते हैं क्योंकि पुलिस भी मदद नहीं कर पाती।
टकराव के बाद प्रशासन होता है सक्रिय
4200 एकड़ में फैले जिले के हांसनगर दियारा क्षेत्र में यूपी-बिहार के किसानों के बीच का सीमा विवाद 70 वर्षों से उलझ़ा है। यूपी के किसान फरियाद करते रहे, लेकिन अधिकारी या जनप्रतिनिधि प्रकरण पर गंभीर नहीं हुए। नतीजतन हर साल बोआई और कटाई के समय बंदूकें गरजतीं हैं। किसान अपनी भूमि के लिए मर मिटने पर अमादा हो जाते हैं। टकराव के बाद प्रशासन 10 दिनों के लिए जरूर सक्रिय होता है, लेकिन वह स्थाई समाधान नहीं है। यूपी-बिहार दोनों तरफ की सरकारें मिलकर पहल करें तो हजारों किसानों का भला हो सकता है, लेकिन अब तक कोई पहल नहीं हुई।
28 लोगों की जानें गई थीं खूनी संघर्ष में
बड़का खेत दियारा विवाद में दशकों पहले हुई खूनी संघर्ष में 28 लोगों की जानें चली गई थीं। आज भी वहां की खेती बंदूकों की साए में होती है और टकराव होने पर पुलिस को जाना पड़ता है। इसी तरहसीमा विवाद में हांसनगर दियारा के किसान विजयशंकर राय, गिरजा शंकर राय की 1978 में तब हत्या कम दी गई जब वे अपने खेत की जोताई करा रहे थे। वर्ष 2003 में किसान विजय तिवारी की हत्या फसल की कटाई के समय कर दी गई। यह तो महज उदाहरण हैं।
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जनपद तीन ओर से बिहार प्रांत की सीमाओं से सटा हुआ है। कहीं गंगा तो कही सरयू नदी यूपी-बिहार की सीमा पर बहती हैं। खासकर गंगा किनारे के गांवों के किसानों की जमीन गंगा के दियरांचल इलाके में है। बताया जाता है कि गंगा की धारा परिवर्तित होते रहने के कारण खेतों की भी भौगोलिक स्थिति बदलती रही जो यूपी व बिहार के किसानों के बीच टकराव का कारण बनती है। जिले में बड़का खेत दियारा लेकर हांसनगर तक करीब 10 हजार एकड़ की खेती पर हर साल दोनों तरफ बंदूकें भी तनती हैं और कई बार खूनी संघर्ष में किसानों की जान भी गई है। लेकिन इसको लेकर सरकारों की ओर से स्थाई समाधान नहीं किया जा रहा है। अब यह मामला मुद्दा बनता जा रहा है क्योंकि किसानों के खेत ही उनकी जीविका के मुख्य साधन हैं।
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त्रिवेदी आयोग के सीमांकन वाले कई पिलर गायब
यूपी व बिहार के किसानों के बीच सात दशक से गंगा उस पार के मौजे को लेकर विवाद चल रहा है। काफी प्रयास के बाद वर्ष 1962 में यूपी-बिहार सीमा विवाद को सुलझाने के सीएम त्रिवेदी आयोग का गठन किया गया। आयोग ने दोनों पक्षों के कागजात आदि परखने के बाद वर्ष 1971 में जमीन की पैमाईश कर यूपी-बिहार के सीमाओं का सीमांकन पिलर स्थापित किया गया। आज भी कई इलाकों में यह पिलर देखने को मिल जाते हैं। लेकिन हांसनगर दियारा क्षेत्र के यूपी के गांव भड़सर, दुबहड़, धरनीपुर, अगरौली, हल्दी, बिहारीपुर, बाबू बेल, गायघाट, पचरुखिया, नारायणपुर, मीनापुर, दूबे छपरा, उदयीछपरा के डेरा और बिहार क्षेत्र के गांव नैनीजोर पूर्वी, पश्चिमी, छोटकी नैनीजोर, सपही, नीमेज, धर्मागतपुर आदि इलाके में यह पिलर नहीं मिलते। लोगों की मानें तो जानबूझ कर सीमांकन मिटाया गया।
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बिहार सीमा में स्थित खेतों को लेकर असहाय हो जाते हैं किसान
गंगा उस पार लंबे समय से चला आ रहा यूपी-बिहार सीमा विवाद ज्यों का त्यों है। कई इलाकों में किसान यूपी के हैं लेकिन उनका खेत बिहार की सीमा में हो गया है। हर साल इसका खामियाजा किसानों को भुगतना पड़ता है। फसल कटाई व बोआई के समय यूपी के किसानों की सांसें अटकी रहती हैं। बिहार के दबंग किसान कब आकर उनके खेतों की जोताई कर अपना बता देंगे या फसलों को बंदूक के बल पर काट ले जाएंगे, यह किसी को पता नहीं है। गंगा उस पार खेत होने के कारण किसान भी पूरी तरह से असहाय दिखते हैं। बतौर उदाहरण बाबू बेल दियारा में बिहार के दबंग किसान कभी खेतों की जोताई कर देते हैं तो कभी फसलों को बंदूक के बल पर काट ले जाते हैं। खेत बिहार में होने के कारण किसान असहाय हो जाते हैं क्योंकि पुलिस भी मदद नहीं कर पाती।
टकराव के बाद प्रशासन होता है सक्रिय
4200 एकड़ में फैले जिले के हांसनगर दियारा क्षेत्र में यूपी-बिहार के किसानों के बीच का सीमा विवाद 70 वर्षों से उलझ़ा है। यूपी के किसान फरियाद करते रहे, लेकिन अधिकारी या जनप्रतिनिधि प्रकरण पर गंभीर नहीं हुए। नतीजतन हर साल बोआई और कटाई के समय बंदूकें गरजतीं हैं। किसान अपनी भूमि के लिए मर मिटने पर अमादा हो जाते हैं। टकराव के बाद प्रशासन 10 दिनों के लिए जरूर सक्रिय होता है, लेकिन वह स्थाई समाधान नहीं है। यूपी-बिहार दोनों तरफ की सरकारें मिलकर पहल करें तो हजारों किसानों का भला हो सकता है, लेकिन अब तक कोई पहल नहीं हुई।
28 लोगों की जानें गई थीं खूनी संघर्ष में
बड़का खेत दियारा विवाद में दशकों पहले हुई खूनी संघर्ष में 28 लोगों की जानें चली गई थीं। आज भी वहां की खेती बंदूकों की साए में होती है और टकराव होने पर पुलिस को जाना पड़ता है। इसी तरहसीमा विवाद में हांसनगर दियारा के किसान विजयशंकर राय, गिरजा शंकर राय की 1978 में तब हत्या कम दी गई जब वे अपने खेत की जोताई करा रहे थे। वर्ष 2003 में किसान विजय तिवारी की हत्या फसल की कटाई के समय कर दी गई। यह तो महज उदाहरण हैं।