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Bahraich News: जयंती पर याद किए गए नोबेल पुरस्कार विजेता रवींद्रनाथ टैगोर
Thu, 08 May 2025 12:09 AM IST
लखनऊ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, बहराइच
संवाद न्यूज एजेंसी, बहराइच
Updated Thu, 08 May 2025 12:09 AM IST
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बहराइच के सेनानी भवन में रवींद्र नाथ टैगोर की जयंती मनाते सेनानी उत्तराधिकारी संंगठन के लोग।
बहराइच। नोबेल पुरस्कार विजेता रहे गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर की जयंती बुधवार को सेनानी भवन के सभागार में मनाई गई। कार्यक्रम में उनके साहित्यिक योगदान तथा राजनीतिक उपलब्धता पर गंभीर चर्चा की गई। कार्यक्रम की शुरुआत गुरुदेव के चित्र पर माल्यार्पण कर की गई।
कार्यक्रम में संगठन के संरक्षक अनिल त्रिपाठी ने कहा कि रवींद्रनाथ टैगोर एकमात्र ऐसे कवि हैं, जिनकी कविता दो देशों का राष्ट्रगान बनी। उन्होंने बंगाली साहित्य में नए गद्य व पद्य रूप और बोलचाल की भाषा का प्रयोग किया। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गीतांजलि टैगोर का सबसे प्रसिद्ध कविता संग्रह है, जिसके लिए उन्हें 1913 में साहित्य में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। प्रदेश कार्यवाहक महामंत्री रमेश कुमार मिश्र ने कहा कि रविंद्रनाथ टैगोर का मानना था कि प्रकृति मानव तथा अंतरराष्ट्रीय संबंधों में परस्पर मेल एवं प्रेम होना चाहिए। टैगोर का विश्वास था कि शिक्षा प्राप्त करते समय बालक को स्वतंत्र वातावरण मिलना आवश्यक है।
संगठन के संयुक्त अध्यक्ष वेदव्रत श्रीवास्तव ने कहा कि 1915 में रवींद्रनाथ टैगोर ने मोहनदास करमचंद गांधी को महात्मा की पदवी दी। उनका निधन 80 वर्ष की आयु में 07 अगस्त 1941 को हुआ। कार्यक्रम में राम दीन गौतम, राम सागर आर्य, विश्वनाथ प्रसाद आर्य, चंद्र प्रकाश, अंगनू राम, जगराम जायसवाल, विशेश्वर नाथ अवस्थी, संगठन के जिला महामंत्री राजू मिश्र उर्फ मुन्ना भैया, ननकऊ, परमजीत सहित तमाम सेनानी उत्तराधिकारी मौजूद रहे।
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कार्यक्रम में संगठन के संरक्षक अनिल त्रिपाठी ने कहा कि रवींद्रनाथ टैगोर एकमात्र ऐसे कवि हैं, जिनकी कविता दो देशों का राष्ट्रगान बनी। उन्होंने बंगाली साहित्य में नए गद्य व पद्य रूप और बोलचाल की भाषा का प्रयोग किया। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गीतांजलि टैगोर का सबसे प्रसिद्ध कविता संग्रह है, जिसके लिए उन्हें 1913 में साहित्य में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। प्रदेश कार्यवाहक महामंत्री रमेश कुमार मिश्र ने कहा कि रविंद्रनाथ टैगोर का मानना था कि प्रकृति मानव तथा अंतरराष्ट्रीय संबंधों में परस्पर मेल एवं प्रेम होना चाहिए। टैगोर का विश्वास था कि शिक्षा प्राप्त करते समय बालक को स्वतंत्र वातावरण मिलना आवश्यक है।
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संगठन के संयुक्त अध्यक्ष वेदव्रत श्रीवास्तव ने कहा कि 1915 में रवींद्रनाथ टैगोर ने मोहनदास करमचंद गांधी को महात्मा की पदवी दी। उनका निधन 80 वर्ष की आयु में 07 अगस्त 1941 को हुआ। कार्यक्रम में राम दीन गौतम, राम सागर आर्य, विश्वनाथ प्रसाद आर्य, चंद्र प्रकाश, अंगनू राम, जगराम जायसवाल, विशेश्वर नाथ अवस्थी, संगठन के जिला महामंत्री राजू मिश्र उर्फ मुन्ना भैया, ननकऊ, परमजीत सहित तमाम सेनानी उत्तराधिकारी मौजूद रहे।
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