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35 फीसदी तक महंगी हो गईं कॉपी-किताबें
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बहराइच। बढ़ी महंगाई का असर इस बार नौनिहालों के स्कूल बैग पर भी दिखाई पड़ रहा है। कॉपी-किताब व स्टेशनरी के मूल्यों में हुई वृद्धि से अभिभावक मायूस नजर आ रहे हैं। बीते लगभग दो वर्षों के बाद अब विद्यालय पुन: संचालित होने शुरू हुए हैं। नया सत्र शुरू होते ही अभिभावक बच्चों के लिए कॉपी, किताब व स्टेशनरी खरीदने में जुट गए हैं, लेकिन बीते सत्रों की अपेक्षा सभी वस्तुएं लगभग 30 से 35 प्रतिशत अधिक मूल्य पर मिलने से अभिभावक खासे मायूस नजर आ रहे हैं। इससे उनका बजट भी बिगड़ता दिख रहा है।
कागज के दामों में हुई वृद्धि से शिक्षा से जुड़ी हर चीज के भाव आसमान छू रहे हैं। कॉपी-किताबों के दामों में लगभग 30 प्रतिशत हुई वृद्धि से अभिभावकों पर भार बढ़ गया है। बीते दो वर्षों से विद्यालय बंद रहने के बाद भी स्कूली फीस की मार झेल रहे अभिभावक कॉपी व किताब के बढ़े मूल्यों से भी खासे परेशान नजर आ रहे हैं। बीते वर्षों की अपेक्षा इस वर्ष कॉपियों के दामों में 25 से 30 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। जबकि किताबों के दामों में 15 से 20 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। ब्रांडेड कंपनियों ने कॉपियों के दाम बढ़ाने की अपेक्षा कॉपियों के पेज कम कर दिए हैं, जबकि कुछ कंपनियों ने लंबाई व चौड़ाई कम कर दी है। जैसे 128 पेज की कॉपी 120 पेज की कर दी गई है। वहीं कुछ कंपनियों ने पेज कम करने के साथ ही मूल्य भी बढ़ा दिए हैं। पहले 64 पेज की जो कॉपी दस रुपये में आती थी वह अब 48 पेज की होने के साथ ही 15 रुपये की हो गई है। स्टेशनरी विक्रेता इसकी मुख्य वजह कागज की कीमतों में हुई वृद्धि बता रहे हैं। अगले जुलाई माह तक नया स्टॉक आने पर कीमतें और भी बढ़ने की संभावना व्यक्त की जा रही है।
कॉपियों के दामों ने लगाई भारी छलांग
164 पेज की कॉपी पहले 30 रुपये में आती थी जिसका दाम बढ़कर अब 35 से 40 रुपये हो गया है। 28 पेज की कॉपी पांच रुपये में आती थी जो अब 20 पेज की होने के साथ ही आठ से दस रुपये में आ रही है। वहीं दस रुपए वाली रॉयल कॉपी पेज कम होने के बाद भी 15 रुपये में बेंची जा रही है। रफ कॉपी पहले काले पेज की 20 रुपये में आती थी इसके दाम अब बढ़कर 25 से 30 रुपये हो गए हैं। इसी प्रकार 192 पेज की कॉपी 25 से 35 रुपये की हो गई। जो कॉपी 120 पेज की 15 रुपए की थी वह अब 20 रुपये में बिक रही है।
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प्रिंटिग व इंक पर जीएसटी बढ़ने से बढ़ी परेशानी
अभिभावकों को अपने बच्चों की कॉपी व किताब खरीदने के लिए छह हजार से 12 हजार रुपये तक खर्च करने पड़ रहे हैं। जिससे उनका बजट गडबड़ा रहा है। वैसे तो किताबें जीएसटी से मुक्त हैं, लेकिन प्रिंटिंग में प्रयोग होने वाली इंक व कागज पर भारी भरकम जीएसटी लगने से किताबों पर भी महंगाई की मार पड़ रही है। इस वर्ष कागज पर 12 प्रतिशत व इंक पर 18 प्रतिशत जीएसटी है। अबकी बार किताबें 15 से 20 प्रतिशत तक महंगी होने से अभिभावकों की कमर टूट रही है।
अभिभावकों की पीड़ा
परेशानियों का करना पड़ रहा सामना
कॉपी व किताबों के दामों में प्रतिवर्ष भारी बढ़ोत्तरी हो रही है। जिससे अभिभावकों को परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। सरकार को इस ओर ध्यान देना चाहिए। इस समस्या का शीघ्र समाधान निकाला जाए। जिससे अभिभावकों को राहत मिल सके।
-बुद्धीलाल जायसवाल, अभिभावक।
हर साल न बदला जाए स्लेबस
निजी स्कूल प्रतिवर्ष अपनी किताबों के स्लेबस में कुछ बदलाव कर देते हैं। जिससे पुरानी किताबें अच्छी हालत में होने के बाद भी नये विद्यार्थियों के उपयोग में नहीं आ पाती हैं। जिससे प्रतिवर्ष छात्र-छात्राओं को नई किताबें खरीदने के लिए विवश होना पड़ता है। इससे निजात मिलनी चाहिए।
-चंद्रकेतु सिंह, अभिभावक।
अधिक लिया जा रहा मूल्य
विभिन्न विद्यालयों द्वारा किताबें व कॉपियां विद्यालयों से ही प्रदान की जाती हैं। उनका मूल्य भी निर्धारित लागत से काफी अधिक लिया जाता है। शासन व प्रशासन को इस पर रोक लगाने के लिए कदम उठाने चाहिए। जिससे अभिभावकों का शोषण रुक सके।
-मुन्ना जायसवाल, अभिभावक।
स्लेबस से बाहर हो किताबें
छोटे-छोटे बच्चों की कक्षाओं में विद्यालयों द्वारा अधिक स्लेबस निर्धारित कर दिया गया है। कई पुस्तकें ऐसी होती हैं। जिनका कोई खास लाभ बच्चों को नहीं मिलता। यह पुस्तकें काफी महंगी भी होती हैं। ऐसी पुस्तकों को स्लेबस से बाहर करना चाहिए।
-विनोद गुप्ता, अभिभावक।
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कागज के दामों में हुई वृद्धि से शिक्षा से जुड़ी हर चीज के भाव आसमान छू रहे हैं। कॉपी-किताबों के दामों में लगभग 30 प्रतिशत हुई वृद्धि से अभिभावकों पर भार बढ़ गया है। बीते दो वर्षों से विद्यालय बंद रहने के बाद भी स्कूली फीस की मार झेल रहे अभिभावक कॉपी व किताब के बढ़े मूल्यों से भी खासे परेशान नजर आ रहे हैं। बीते वर्षों की अपेक्षा इस वर्ष कॉपियों के दामों में 25 से 30 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। जबकि किताबों के दामों में 15 से 20 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। ब्रांडेड कंपनियों ने कॉपियों के दाम बढ़ाने की अपेक्षा कॉपियों के पेज कम कर दिए हैं, जबकि कुछ कंपनियों ने लंबाई व चौड़ाई कम कर दी है। जैसे 128 पेज की कॉपी 120 पेज की कर दी गई है। वहीं कुछ कंपनियों ने पेज कम करने के साथ ही मूल्य भी बढ़ा दिए हैं। पहले 64 पेज की जो कॉपी दस रुपये में आती थी वह अब 48 पेज की होने के साथ ही 15 रुपये की हो गई है। स्टेशनरी विक्रेता इसकी मुख्य वजह कागज की कीमतों में हुई वृद्धि बता रहे हैं। अगले जुलाई माह तक नया स्टॉक आने पर कीमतें और भी बढ़ने की संभावना व्यक्त की जा रही है।
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कॉपियों के दामों ने लगाई भारी छलांग
164 पेज की कॉपी पहले 30 रुपये में आती थी जिसका दाम बढ़कर अब 35 से 40 रुपये हो गया है। 28 पेज की कॉपी पांच रुपये में आती थी जो अब 20 पेज की होने के साथ ही आठ से दस रुपये में आ रही है। वहीं दस रुपए वाली रॉयल कॉपी पेज कम होने के बाद भी 15 रुपये में बेंची जा रही है। रफ कॉपी पहले काले पेज की 20 रुपये में आती थी इसके दाम अब बढ़कर 25 से 30 रुपये हो गए हैं। इसी प्रकार 192 पेज की कॉपी 25 से 35 रुपये की हो गई। जो कॉपी 120 पेज की 15 रुपए की थी वह अब 20 रुपये में बिक रही है।
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प्रिंटिग व इंक पर जीएसटी बढ़ने से बढ़ी परेशानी
अभिभावकों को अपने बच्चों की कॉपी व किताब खरीदने के लिए छह हजार से 12 हजार रुपये तक खर्च करने पड़ रहे हैं। जिससे उनका बजट गडबड़ा रहा है। वैसे तो किताबें जीएसटी से मुक्त हैं, लेकिन प्रिंटिंग में प्रयोग होने वाली इंक व कागज पर भारी भरकम जीएसटी लगने से किताबों पर भी महंगाई की मार पड़ रही है। इस वर्ष कागज पर 12 प्रतिशत व इंक पर 18 प्रतिशत जीएसटी है। अबकी बार किताबें 15 से 20 प्रतिशत तक महंगी होने से अभिभावकों की कमर टूट रही है।
अभिभावकों की पीड़ा
परेशानियों का करना पड़ रहा सामना
कॉपी व किताबों के दामों में प्रतिवर्ष भारी बढ़ोत्तरी हो रही है। जिससे अभिभावकों को परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। सरकार को इस ओर ध्यान देना चाहिए। इस समस्या का शीघ्र समाधान निकाला जाए। जिससे अभिभावकों को राहत मिल सके।
-बुद्धीलाल जायसवाल, अभिभावक।
हर साल न बदला जाए स्लेबस
निजी स्कूल प्रतिवर्ष अपनी किताबों के स्लेबस में कुछ बदलाव कर देते हैं। जिससे पुरानी किताबें अच्छी हालत में होने के बाद भी नये विद्यार्थियों के उपयोग में नहीं आ पाती हैं। जिससे प्रतिवर्ष छात्र-छात्राओं को नई किताबें खरीदने के लिए विवश होना पड़ता है। इससे निजात मिलनी चाहिए।
-चंद्रकेतु सिंह, अभिभावक।
अधिक लिया जा रहा मूल्य
विभिन्न विद्यालयों द्वारा किताबें व कॉपियां विद्यालयों से ही प्रदान की जाती हैं। उनका मूल्य भी निर्धारित लागत से काफी अधिक लिया जाता है। शासन व प्रशासन को इस पर रोक लगाने के लिए कदम उठाने चाहिए। जिससे अभिभावकों का शोषण रुक सके।
-मुन्ना जायसवाल, अभिभावक।
स्लेबस से बाहर हो किताबें
छोटे-छोटे बच्चों की कक्षाओं में विद्यालयों द्वारा अधिक स्लेबस निर्धारित कर दिया गया है। कई पुस्तकें ऐसी होती हैं। जिनका कोई खास लाभ बच्चों को नहीं मिलता। यह पुस्तकें काफी महंगी भी होती हैं। ऐसी पुस्तकों को स्लेबस से बाहर करना चाहिए।
-विनोद गुप्ता, अभिभावक।