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मुंशी प्रेमचंद ने तीन साल जीआईसी में शिक्षक रहे
Updated Mon, 30 Jul 2018 10:32 PM IST
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बहराइच। साहित्य जगत में अपने उपन्यास और कहानियों से राज करने वाले मुंशी प्रेमचंद का जुड़ाव बहराइच से भी रहा है। इसकी जानकारी कम लोगों को ही है। उन्होंने जिले के राजकीय इंटर कॉलेज में तीन माह तक शिक्षण कार्य किया।
इसके बाद भी साहित्य के इस पुरोधा की एक भी पहचान बहराइच राजकीय इंटर कॉलेज में नहीं है। विद्यालय व जिला प्रशासन उनके हस्ताक्षर तक नहीं सहेज सका। अब सिर्फ मन मस्तिष्क में मुंशीजी की यादें शेष है।
विद्यालय में काम करने वाले या रिटायर हो चुके शिक्षक अपने आपको गौरवान्वित जरूर महसूस करते हैं। जब पूस की रात, कलम का सिपाही, ईदगाह कहानियों का नाम आता है तो मुंशी प्रेमचंद की किताबों के मुख्य पृष्ठ पर बनी तस्वीर आंखों के सामने कौंध जाती है।
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मुंशी प्रेमचंद की कहानियां और उपन्यास समाज से सीधे सरोकार कराती हैं। गोदान व गबन सामाजिक विसंगति व परंपराओं का एहसास कराती है।
ऐसी तमाम रचनाओं के रचनाकार मुंशी प्रेमचंद के जीवन की शुरुआत शिक्षक के रूप में हुई थी। हिंदी साहित्य के इतिहास व प्रेमचंद की जीवनी पर नजर डालें तो 31 जुलाई 1880 को जन्म लेने वाले प्रेमचंद ने वर्ष 1900 में 20 वर्ष की आयु में शिक्षण कार्य से दाल रोटी के लिए संघर्ष शुरू किया था।
चिनार में 18 रुपये प्रति माह पर एक निजी विद्यालय में हेडमास्टर के पद पर तैनात हुए। यहां से छह माह बाद उनका चयन तत्कालीन डिस्ट्रिक्ट स्कूल बहराइच वर्तमान में राजकीय इंटर कॉलेज में हो गया था।
बहराइच में पांचवें शिक्षक के रूप में मुंशी प्रेमचंद को तैनाती मिली थी। लेकिन यहां पर सिर्फ तीन महीने ही मुंशी प्रेचमंद ने शिक्षण कार्य किया। इसके बाद उनका तबादला डिस्ट्रिक्ट स्कूल प्रतापगढ़ में हेडमास्टर के पद पर हुआ। इन तीन महीनों में बहराइच की सरजमीं पर ही मुंशी प्रेमचंद ने साहित्य की ओर अपने जीवन की दिशा को मोड़ा था।
उपन्यास अजर-ए-मुआविद की रूपरेखा बहराइच में लिखी थी
जिले के साहित्यसेवियों की मानें तो उपन्यास अजर-ए-मुआविद की रूपरेखा बहराइच में शिक्षण कार्य के दौरान ही मुंशीजी ने गढ़ी थी।
प्रतापगढ़ में इस उपन्यास को पूरा किया था। प्रेमचंद बहराइच में बतौर शिक्षक तैनात जरूर रहे, लेकिन उनकी निशानी अब शेष नहीं है। सिर्फ गजेटियर में उल्लेख मिलता है।
राजकीय इंटर कॉलेज में वह उपस्थिति पंजिका भी अब मौजूद नहीं है, जिसमें मुंशी प्रेमचंद हस्ताक्षर करते थे। स्कूल के जिम्मेदार बताते हैं कि रख रखाव की स्थिति ठीक न होने से इन कागजों को दीमक चट कर गए।
डिस्ट्रिक्ट स्कूल था पुराना महाराज सिंह का भवन
राजकीय इंटर कालेज बहराइच के प्रवक्ता पद से सेवानिृवत्त हुए वीएस श्रीवास्तव उम्र के चौथे पायदान पर हैं। उनसे जब मुंशी प्रेमचंद के बारे में बात की गई तो बोले की वर्ष 1900 में डिस्ट्रिक्ट स्कूल वहां था, जहां इस समय पुराना महाराज सिंह का भवन है।
आजादी के बाद स्कूल भवन स्थानांतरित हुआ था। इसके बाद राजकीय इंटर कॉलेज का संचालन छावनी बाजार क्षेत्र में होने लगा। कॉलेज के पूर्व प्रधानाचार्य वीके टंडन बताया करतेे थे कि उनके समय में एक कैटलॉग मुंशी प्रेमचंद द्वारा लिखित मिली थी। जिसे अलमारी में रखवा दिया था। लेकिन उनके सेवानिवृत्ति के बाद कहां गई पता नहीं चला।
गौरवान्वित हैं राजकीय इंटर कॉलेज के शिक्षक
राजकीय इंटर कालेज के प्रवक्ता सुभाष चंद्र पांडेय मूलत: पयागपुर के हैं। उन्होंने बताया कि उनके पिता और बाबा बताया करते थे कि प्रेमचंद ने बहराइच में राजकीय इंटर कॉलेज में अध्यापन किया है।
सौभाग्य से उन्हें भी विद्यालय में शिक्षण कार्य करने का मौका मिला। इसलिए वह अपने को गौरवान्वित महसूस करते हैं। शिक्षक ओमप्रकाश त्रिपाठी का भी कहना है कि मुंशी प्रेमचंद की कर्मस्थली जीआईसी बहराइच होने से वे सभी गौरवान्वित हैं।
मुंशी प्रेमचंद ने बहराइच में अध्यापन कार्य किया, इसकी जानकारी नहीं थी। कुछ दिनों पहले ही पता चला था। उनकी यादों को सहेजने के लिए पुराने अभिलेख की खोज करवा रहे हैं।
-राजेंद्र कुमार पांडेय, डीआईओएस
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इसके बाद भी साहित्य के इस पुरोधा की एक भी पहचान बहराइच राजकीय इंटर कॉलेज में नहीं है। विद्यालय व जिला प्रशासन उनके हस्ताक्षर तक नहीं सहेज सका। अब सिर्फ मन मस्तिष्क में मुंशीजी की यादें शेष है।
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विद्यालय में काम करने वाले या रिटायर हो चुके शिक्षक अपने आपको गौरवान्वित जरूर महसूस करते हैं। जब पूस की रात, कलम का सिपाही, ईदगाह कहानियों का नाम आता है तो मुंशी प्रेमचंद की किताबों के मुख्य पृष्ठ पर बनी तस्वीर आंखों के सामने कौंध जाती है।
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मुंशी प्रेमचंद की कहानियां और उपन्यास समाज से सीधे सरोकार कराती हैं। गोदान व गबन सामाजिक विसंगति व परंपराओं का एहसास कराती है।
ऐसी तमाम रचनाओं के रचनाकार मुंशी प्रेमचंद के जीवन की शुरुआत शिक्षक के रूप में हुई थी। हिंदी साहित्य के इतिहास व प्रेमचंद की जीवनी पर नजर डालें तो 31 जुलाई 1880 को जन्म लेने वाले प्रेमचंद ने वर्ष 1900 में 20 वर्ष की आयु में शिक्षण कार्य से दाल रोटी के लिए संघर्ष शुरू किया था।
चिनार में 18 रुपये प्रति माह पर एक निजी विद्यालय में हेडमास्टर के पद पर तैनात हुए। यहां से छह माह बाद उनका चयन तत्कालीन डिस्ट्रिक्ट स्कूल बहराइच वर्तमान में राजकीय इंटर कॉलेज में हो गया था।
बहराइच में पांचवें शिक्षक के रूप में मुंशी प्रेमचंद को तैनाती मिली थी। लेकिन यहां पर सिर्फ तीन महीने ही मुंशी प्रेचमंद ने शिक्षण कार्य किया। इसके बाद उनका तबादला डिस्ट्रिक्ट स्कूल प्रतापगढ़ में हेडमास्टर के पद पर हुआ। इन तीन महीनों में बहराइच की सरजमीं पर ही मुंशी प्रेमचंद ने साहित्य की ओर अपने जीवन की दिशा को मोड़ा था।
उपन्यास अजर-ए-मुआविद की रूपरेखा बहराइच में लिखी थी
जिले के साहित्यसेवियों की मानें तो उपन्यास अजर-ए-मुआविद की रूपरेखा बहराइच में शिक्षण कार्य के दौरान ही मुंशीजी ने गढ़ी थी।
प्रतापगढ़ में इस उपन्यास को पूरा किया था। प्रेमचंद बहराइच में बतौर शिक्षक तैनात जरूर रहे, लेकिन उनकी निशानी अब शेष नहीं है। सिर्फ गजेटियर में उल्लेख मिलता है।
राजकीय इंटर कॉलेज में वह उपस्थिति पंजिका भी अब मौजूद नहीं है, जिसमें मुंशी प्रेमचंद हस्ताक्षर करते थे। स्कूल के जिम्मेदार बताते हैं कि रख रखाव की स्थिति ठीक न होने से इन कागजों को दीमक चट कर गए।
डिस्ट्रिक्ट स्कूल था पुराना महाराज सिंह का भवन
राजकीय इंटर कालेज बहराइच के प्रवक्ता पद से सेवानिृवत्त हुए वीएस श्रीवास्तव उम्र के चौथे पायदान पर हैं। उनसे जब मुंशी प्रेमचंद के बारे में बात की गई तो बोले की वर्ष 1900 में डिस्ट्रिक्ट स्कूल वहां था, जहां इस समय पुराना महाराज सिंह का भवन है।
आजादी के बाद स्कूल भवन स्थानांतरित हुआ था। इसके बाद राजकीय इंटर कॉलेज का संचालन छावनी बाजार क्षेत्र में होने लगा। कॉलेज के पूर्व प्रधानाचार्य वीके टंडन बताया करतेे थे कि उनके समय में एक कैटलॉग मुंशी प्रेमचंद द्वारा लिखित मिली थी। जिसे अलमारी में रखवा दिया था। लेकिन उनके सेवानिवृत्ति के बाद कहां गई पता नहीं चला।
गौरवान्वित हैं राजकीय इंटर कॉलेज के शिक्षक
राजकीय इंटर कालेज के प्रवक्ता सुभाष चंद्र पांडेय मूलत: पयागपुर के हैं। उन्होंने बताया कि उनके पिता और बाबा बताया करते थे कि प्रेमचंद ने बहराइच में राजकीय इंटर कॉलेज में अध्यापन किया है।
सौभाग्य से उन्हें भी विद्यालय में शिक्षण कार्य करने का मौका मिला। इसलिए वह अपने को गौरवान्वित महसूस करते हैं। शिक्षक ओमप्रकाश त्रिपाठी का भी कहना है कि मुंशी प्रेमचंद की कर्मस्थली जीआईसी बहराइच होने से वे सभी गौरवान्वित हैं।
मुंशी प्रेमचंद ने बहराइच में अध्यापन कार्य किया, इसकी जानकारी नहीं थी। कुछ दिनों पहले ही पता चला था। उनकी यादों को सहेजने के लिए पुराने अभिलेख की खोज करवा रहे हैं।
-राजेंद्र कुमार पांडेय, डीआईओएस