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दादा व पिता का खूब निभाया साथ, अब जयंत को विरासत से बड़ी आस
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छपरौली के श्री विद्या मंदिर इंटर कालेज में आयोजित कार्यक्रम में पगड़ी पहनने के बाद उपस्थित लोगो ?
- फोटो : BAGHPAT
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दादा व पिता का खूब निभाया साथ, अब जयंत को बड़ी आस
- पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय चरण सिंह व स्वर्गीय अजित सिंह की कर्मभूमि बागपत में सबसे अहम है छपरौली विधानसभा सीट
- बागपत व बड़ौत के लोगों ने कई बार साथ छोड़ा, तब भी छपरौली के लोग हमेशा रालोद के साथ खड़े रहे
- रालोद अध्यक्ष जयंत चौधरी के सामने चरण सिंह व अजित सिंह के हिंदू-मुस्लिम एकता को कायम करना चुनौती
- अध्यक्ष बनने पर पहली बार आए जयंत चौधरी ने भावुक अपील करते हुए कहा, छपरौली के चिराग की रोशनी देश में पहुंचानी
अंकित चौहान
बागपत। जिस छपरौली की धरती पर रालोद अध्यक्ष जयंत चौधरी को विरासत संभालने के लिए पगड़ी पहनाई गई, उसने पूर्व प्रधानमंत्री स्व. चौधरी चरण सिंह व उनके बेटे पूर्व केंद्रीय मंत्री चौधरी अजित सिंह का खूब साथ निभाया है। यही वजह है कि दादा और पिता की विरासत से अब जयंत चौधरी को बड़ी आस है। बागपत व बड़ौत ने भले ही कई बार रालोद का साथ छोड़ा है, लेकिन छपरौली के लोग उनके साथ खड़े रहे।
छपरौली को पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह की कर्मभूमि ऐसे ही नहीं कहा जाता है। यहां से लोगों ने 84 साल पहले उनको विधानसभा में पहुंचाया था। छपरौली ने चौधरी चरण सिंह का साथ निभाना शुरू किया तो यह सिलसिला आज तक लगातार जारी है। अब वहां से चाहे चौधरी चरण के परिवार से कोई भी चुनाव लड़ा हो या उनकी पार्टी ने किसी अन्य को प्रत्याशी बनाकर उतारा हो, उसे लोगों ने हमेशा जीत दिलाकर ही भेजा है। चौधरी चरण सिंह के निधन के बाद भी छपरौली के लोगों ने पूर्व केंद्रीय मंत्री चौधरी अजित सिंह का हाथ थाम लिया और उनका भी पूरा साथ देते रहे। बड़ौत व बागपत ने कई बार इस परिवार का साथ छोड़ दिया और यह दोनों सीट कभी बसपा तो कभी भाजपा के खाते में पहुंचती रही। अब छपरौली से जयंत चौधरी को बड़ी उम्मीद है। रालोद अध्यक्ष बनने पर पहली बार छपरौली पहुंचे जयंत चौधरी को पगड़ी पहनाने के लिए जिस तरह से जनसैलाब उमड़ा है, उससे उनकी उम्मीद भी ज्यादा बढ़ गई है।
दादा व पिता की तरह हिंदू-मुस्लिम भाईचारा कायम करना चुनौती
रालोद को पिछले कई चुनावों में भारी नुकसान हो रहा है और उसका सबसे बड़ा कारण हिंदू-मुस्लिम भाईचारा बिगड़ना रहा है। जब तक यह भाईचारा कायम रहा, तब तक चौधरी अजित सिंह की राह भी आसान रही और उनके आखिरी दो चुनावों में भाईचारा बिगड़ा तो वह भी जीत की राह तक नहीं पहुंच सके। अब जयंत चौधरी के सामने भी सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि वह हिंदू-मुस्लिम भाईचारा किस तरह से कायम करते है। वह इसमें कामयाब हो जाते है तो यह रालोद के लिए बड़ी संजीवनी होगा।
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छपरौली में जल रहे चिराग की रोशनी देश में पहुंचानी है: जयंत
रालोद के राष्ट्रीय अध्यक्ष जयंत चौधरी ने कहा कि मैं लोगों की भावना देख रहा हूं। चौधरी साहब से लोगों का बड़ा जुड़ाव था और उनके जाने से किसान व कमेरे वर्ग को बड़ी क्षति हुई है। हम आगे उस क्षति को किस तरह से पूरी कर सकते है, यह देखा जाएगा। जयंत चौधरी ने कहा कि छपरौली में जल रहे चिराग की रोशनी पूरे देश में पहुंचती है। लेकिन अब लोगों को याद दिलाना है कि उनकी जड़े कहां है और वह मैं याद दिला रहा हूं। इसके बाद रोशनी दोबारा से पूरे देश में पहुंचेगी।
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- पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय चरण सिंह व स्वर्गीय अजित सिंह की कर्मभूमि बागपत में सबसे अहम है छपरौली विधानसभा सीट
- बागपत व बड़ौत के लोगों ने कई बार साथ छोड़ा, तब भी छपरौली के लोग हमेशा रालोद के साथ खड़े रहे
- रालोद अध्यक्ष जयंत चौधरी के सामने चरण सिंह व अजित सिंह के हिंदू-मुस्लिम एकता को कायम करना चुनौती
- अध्यक्ष बनने पर पहली बार आए जयंत चौधरी ने भावुक अपील करते हुए कहा, छपरौली के चिराग की रोशनी देश में पहुंचानी
अंकित चौहान
बागपत। जिस छपरौली की धरती पर रालोद अध्यक्ष जयंत चौधरी को विरासत संभालने के लिए पगड़ी पहनाई गई, उसने पूर्व प्रधानमंत्री स्व. चौधरी चरण सिंह व उनके बेटे पूर्व केंद्रीय मंत्री चौधरी अजित सिंह का खूब साथ निभाया है। यही वजह है कि दादा और पिता की विरासत से अब जयंत चौधरी को बड़ी आस है। बागपत व बड़ौत ने भले ही कई बार रालोद का साथ छोड़ा है, लेकिन छपरौली के लोग उनके साथ खड़े रहे।
छपरौली को पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह की कर्मभूमि ऐसे ही नहीं कहा जाता है। यहां से लोगों ने 84 साल पहले उनको विधानसभा में पहुंचाया था। छपरौली ने चौधरी चरण सिंह का साथ निभाना शुरू किया तो यह सिलसिला आज तक लगातार जारी है। अब वहां से चाहे चौधरी चरण के परिवार से कोई भी चुनाव लड़ा हो या उनकी पार्टी ने किसी अन्य को प्रत्याशी बनाकर उतारा हो, उसे लोगों ने हमेशा जीत दिलाकर ही भेजा है। चौधरी चरण सिंह के निधन के बाद भी छपरौली के लोगों ने पूर्व केंद्रीय मंत्री चौधरी अजित सिंह का हाथ थाम लिया और उनका भी पूरा साथ देते रहे। बड़ौत व बागपत ने कई बार इस परिवार का साथ छोड़ दिया और यह दोनों सीट कभी बसपा तो कभी भाजपा के खाते में पहुंचती रही। अब छपरौली से जयंत चौधरी को बड़ी उम्मीद है। रालोद अध्यक्ष बनने पर पहली बार छपरौली पहुंचे जयंत चौधरी को पगड़ी पहनाने के लिए जिस तरह से जनसैलाब उमड़ा है, उससे उनकी उम्मीद भी ज्यादा बढ़ गई है।
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दादा व पिता की तरह हिंदू-मुस्लिम भाईचारा कायम करना चुनौती
रालोद को पिछले कई चुनावों में भारी नुकसान हो रहा है और उसका सबसे बड़ा कारण हिंदू-मुस्लिम भाईचारा बिगड़ना रहा है। जब तक यह भाईचारा कायम रहा, तब तक चौधरी अजित सिंह की राह भी आसान रही और उनके आखिरी दो चुनावों में भाईचारा बिगड़ा तो वह भी जीत की राह तक नहीं पहुंच सके। अब जयंत चौधरी के सामने भी सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि वह हिंदू-मुस्लिम भाईचारा किस तरह से कायम करते है। वह इसमें कामयाब हो जाते है तो यह रालोद के लिए बड़ी संजीवनी होगा।
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छपरौली में जल रहे चिराग की रोशनी देश में पहुंचानी है: जयंत
रालोद के राष्ट्रीय अध्यक्ष जयंत चौधरी ने कहा कि मैं लोगों की भावना देख रहा हूं। चौधरी साहब से लोगों का बड़ा जुड़ाव था और उनके जाने से किसान व कमेरे वर्ग को बड़ी क्षति हुई है। हम आगे उस क्षति को किस तरह से पूरी कर सकते है, यह देखा जाएगा। जयंत चौधरी ने कहा कि छपरौली में जल रहे चिराग की रोशनी पूरे देश में पहुंचती है। लेकिन अब लोगों को याद दिलाना है कि उनकी जड़े कहां है और वह मैं याद दिला रहा हूं। इसके बाद रोशनी दोबारा से पूरे देश में पहुंचेगी।