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दुनिया से रुखसत हो गया आजाद हिंद फौज का सिपाही
ब्यूरो/अमर उजाला, बड़ौत
Updated Tue, 24 Nov 2015 01:39 AM IST
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स्वतंत्रता संग्राम सेनानी कर्ण सिंह तोमर (93) का दिल्ली के अस्पताल में उपचार के दौरान सोमवार की सुबह मौत हो गई। उनके निधन से पूरे जिले में शोक की लहर दौड़ गई। दिल्ली से शाम को उनका शव गांव में पहुंचते ही कोहराम मच गया। राजकीय सम्मान के साथ उनका मंगलवार की सुबह अंतिम संस्कार होगा।
बावली निवासी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी कर्ण सिंह तोमर किसान परिवार से जुड़े थे। कर्ण सिंह तीन भाई थे। वे और उनके भाई महावीर और अजब सिंह सन् 1942 में तीनों भाई देश को आजाद कराने के लिए अलग-अलग हिस्सों में चले गए। सन 1945 में कर्ण सिंह आजाद हिंद फौज में शामिल हो गए थे।
सुभाषचंद्र बोस के साथ देश की आजादी की लड़ाई लड़ी। सन् 1942 में उन्होंने सिंगापुर में लड़ाई लड़ी। उनके साथी बावली गांव निवासी हरिपाल ने बताया कि इस लड़ाई लड़ने के बाद कर्ण सिंह जाट रेजीमेंट फौज में शामिल हो गए थे। उन्होंने सन् 1965 में चीन के साथ लड़ाई लड़ी।
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बम विस्फोट के बाद उनकी श्रवण शक्ति कमजोर हो गई थी। इन्हें फौज से सेवानिवृत्त कर दिया गया था। सन 1947 में आजादी के बाद इनके दोनों भाई महावीर व अजब सिंह भी दोनों गांव आ गए थे, लेकिन उनकी कुछ वर्ष पहले मौत हो चुकी है। सेवानिवृत्त होने के बाद भी कर्ण सिंह घर पर खेती पर काफी कार्य करते थे।
आठ दिन पूर्व वे गंभीर रूप से बीमार हो गए थे। उन्हें दिल्ली में भर्ती कराया गया था। अस्पताल में उपचार के दौरान सोमवार की सुबह उनकी मौत हो गई। शाम को उनका शव बावली गांव पहुंचा और उनके अंतिम दर्शन के लिए गांव के लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी। उनका अंतिम संस्कार मंगलवार की सुबह राजकीय सम्मान के साथ होगा।
लड़ाई में घास की रोटियां भी खाई
बड़ौत। 17 साल की उम्र में ही कर्ण सिंह देश की आजादी का जज्बा लेकर घर से निकल पड़े थे। उन्होंने सन् 1965 में हुई चीन से हुई लड़ाई में घास की रोटियां भी खाई।
आश्रित कार्ड के लिए भटकते रहे
बड़ौत। देश की आजादी के लिए अपना पूरा जीवन न्योछावर करने वाले कर्ण सिंह तोमर बीमार होने से पूर्व तक आश्रित कार्ड बनवाने के लिए अधिकारियों के चक्कर काटता रहे, लेकिन उनका कार्ड नहीं बना।
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बावली निवासी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी कर्ण सिंह तोमर किसान परिवार से जुड़े थे। कर्ण सिंह तीन भाई थे। वे और उनके भाई महावीर और अजब सिंह सन् 1942 में तीनों भाई देश को आजाद कराने के लिए अलग-अलग हिस्सों में चले गए। सन 1945 में कर्ण सिंह आजाद हिंद फौज में शामिल हो गए थे।
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सुभाषचंद्र बोस के साथ देश की आजादी की लड़ाई लड़ी। सन् 1942 में उन्होंने सिंगापुर में लड़ाई लड़ी। उनके साथी बावली गांव निवासी हरिपाल ने बताया कि इस लड़ाई लड़ने के बाद कर्ण सिंह जाट रेजीमेंट फौज में शामिल हो गए थे। उन्होंने सन् 1965 में चीन के साथ लड़ाई लड़ी।
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बम विस्फोट के बाद उनकी श्रवण शक्ति कमजोर हो गई थी। इन्हें फौज से सेवानिवृत्त कर दिया गया था। सन 1947 में आजादी के बाद इनके दोनों भाई महावीर व अजब सिंह भी दोनों गांव आ गए थे, लेकिन उनकी कुछ वर्ष पहले मौत हो चुकी है। सेवानिवृत्त होने के बाद भी कर्ण सिंह घर पर खेती पर काफी कार्य करते थे।
आठ दिन पूर्व वे गंभीर रूप से बीमार हो गए थे। उन्हें दिल्ली में भर्ती कराया गया था। अस्पताल में उपचार के दौरान सोमवार की सुबह उनकी मौत हो गई। शाम को उनका शव बावली गांव पहुंचा और उनके अंतिम दर्शन के लिए गांव के लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी। उनका अंतिम संस्कार मंगलवार की सुबह राजकीय सम्मान के साथ होगा।
लड़ाई में घास की रोटियां भी खाई
बड़ौत। 17 साल की उम्र में ही कर्ण सिंह देश की आजादी का जज्बा लेकर घर से निकल पड़े थे। उन्होंने सन् 1965 में हुई चीन से हुई लड़ाई में घास की रोटियां भी खाई।
आश्रित कार्ड के लिए भटकते रहे
बड़ौत। देश की आजादी के लिए अपना पूरा जीवन न्योछावर करने वाले कर्ण सिंह तोमर बीमार होने से पूर्व तक आश्रित कार्ड बनवाने के लिए अधिकारियों के चक्कर काटता रहे, लेकिन उनका कार्ड नहीं बना।