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उम्मत-उल मोमनीन के वसूलों को अपनाएं
ब्यूरो, अमर उजाला, आजमगढ़
Updated Sat, 19 Nov 2016 11:53 PM IST
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पुस्तक का विमोचन करते अतिथिगण।
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शिब्ली नेशनल महाविद्यालय में शनिवार को सीरत-ए-उम्मत-उल मोमनीन विषय पर अंतर्राष्ट्रीय सेमिनार का आयोजन किया गया। इसमें विद्वानों ने हजरत मुहम्मद साहब की बीवियों का जिक्र करते हुए उम्मत-उल-मोमनीन के वसूलों को अपनाने और पश्चिमी सभ्यता से परहेज करने पर जोर दिया।
सम्मेलन की अध्यक्षता कर रहे अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के इस्लामिक रिसर्च विभाग के सेवानिवृत्त प्रोफेसर यासीन मलिक सिद्दीकी ने कहा कि आज की महिलाओं को उम्मत-उल-मोमनीन के वसूलों को अपनाना चाहिए। उन्होंने हजरत मुहम्मद साहब की बीवियों का जिक्र करते हुए कहा कि वह इस्लाम के बताए रास्ते पर चलती थीं। वे अल्लाह की इबादतगार होने के साथ ही गरीब परस्त थीं और सभी की मदद करती थीं।
कहा कि अल्लामा शिब्ली नोमानी ने इस कॉलेज की स्थापना 1883 ई. में की थी। उन्होंने शिक्षा के प्रति अपनी सोच को मिशन के रूप में अपनाया। शोपुर कश्मीर बारामुला विश्वविद्यालय की असिस्टेंट प्रोफेसर आबिदा कौशर ने कहा कि बच्चों का पालन-पोषण इस तरह से करना चाहिए कि वे अपने दीनी तालीम से दूर न हों और दुनियावी तालीम भी हासिल कर लें। जब बच्चा मां की सिकम (गर्भ) में रहे तो रोजा, नमाज करने के साथ जकात, खैरात करनी चाहिए, ताकि बच्चे पर इसका असर पड़े।
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मुख्य अतिथि मदीना के शेख अली अलफायज, विशिष्ट अतिथि छत्तीसगढ़ के पुलिस महानिदेशक एमडब्लू अंसारी, मुंबई के आसिफ फारूकी ने कहा कि हजरत मुहम्मद साहब की पत्नियाें के दर्शन का अनुसरण महिलाओं को करना चाहिए। इस्लाम में स्त्रियों के जीवन मूल्य को ऊंचा दर्शाया गया है। पश्चिमी सभ्यता का त्याग करने में ही सभी की भलाई है। संचालन कर रहे उर्दू विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. मोहम्मद ताहिर ने हिंदू-मुस्लिम एकता पर जोर देते हुए रोटी, कपड़ा, मकान के साथ दीनी तालीम की बात की। डॉ. एहसानुल्लाह फहद, डॉ. शकील अहमद, नइमुद्दीन इस्लाही ने शोध पत्र पढ़ा।
इस दौरान डॉ. मोहम्मद ताहिर की पुस्तक का विमोचन किया गया। इस मौके पर मौलाना ताहिर मदनी, शिब्ली एकेडमी के डायरेक्टर इश्तेयाक अहमद जिल्ली, पूर्व प्राचार्य इफ्तेखार अहमद, डॉ. मुमताज, डॉ. बीके सिंह, डॉ. फखरुल इस्लाम, डॉ. मोकर्रम, डॉ. बाबर अशफाक, डॉ. सलमान अंसारी आदि उपस्थित थे। कालेज के प्राचार्य ग्यास असद खान ने अतिथियों को प्रतीक चिह्न देकर सम्मानित किया।
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सम्मेलन की अध्यक्षता कर रहे अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के इस्लामिक रिसर्च विभाग के सेवानिवृत्त प्रोफेसर यासीन मलिक सिद्दीकी ने कहा कि आज की महिलाओं को उम्मत-उल-मोमनीन के वसूलों को अपनाना चाहिए। उन्होंने हजरत मुहम्मद साहब की बीवियों का जिक्र करते हुए कहा कि वह इस्लाम के बताए रास्ते पर चलती थीं। वे अल्लाह की इबादतगार होने के साथ ही गरीब परस्त थीं और सभी की मदद करती थीं।
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कहा कि अल्लामा शिब्ली नोमानी ने इस कॉलेज की स्थापना 1883 ई. में की थी। उन्होंने शिक्षा के प्रति अपनी सोच को मिशन के रूप में अपनाया। शोपुर कश्मीर बारामुला विश्वविद्यालय की असिस्टेंट प्रोफेसर आबिदा कौशर ने कहा कि बच्चों का पालन-पोषण इस तरह से करना चाहिए कि वे अपने दीनी तालीम से दूर न हों और दुनियावी तालीम भी हासिल कर लें। जब बच्चा मां की सिकम (गर्भ) में रहे तो रोजा, नमाज करने के साथ जकात, खैरात करनी चाहिए, ताकि बच्चे पर इसका असर पड़े।
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मुख्य अतिथि मदीना के शेख अली अलफायज, विशिष्ट अतिथि छत्तीसगढ़ के पुलिस महानिदेशक एमडब्लू अंसारी, मुंबई के आसिफ फारूकी ने कहा कि हजरत मुहम्मद साहब की पत्नियाें के दर्शन का अनुसरण महिलाओं को करना चाहिए। इस्लाम में स्त्रियों के जीवन मूल्य को ऊंचा दर्शाया गया है। पश्चिमी सभ्यता का त्याग करने में ही सभी की भलाई है। संचालन कर रहे उर्दू विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. मोहम्मद ताहिर ने हिंदू-मुस्लिम एकता पर जोर देते हुए रोटी, कपड़ा, मकान के साथ दीनी तालीम की बात की। डॉ. एहसानुल्लाह फहद, डॉ. शकील अहमद, नइमुद्दीन इस्लाही ने शोध पत्र पढ़ा।
इस दौरान डॉ. मोहम्मद ताहिर की पुस्तक का विमोचन किया गया। इस मौके पर मौलाना ताहिर मदनी, शिब्ली एकेडमी के डायरेक्टर इश्तेयाक अहमद जिल्ली, पूर्व प्राचार्य इफ्तेखार अहमद, डॉ. मुमताज, डॉ. बीके सिंह, डॉ. फखरुल इस्लाम, डॉ. मोकर्रम, डॉ. बाबर अशफाक, डॉ. सलमान अंसारी आदि उपस्थित थे। कालेज के प्राचार्य ग्यास असद खान ने अतिथियों को प्रतीक चिह्न देकर सम्मानित किया।