{"_id":"588ce2a84f1c1bbb7ecf7e85","slug":"this-course-is-the-creation-of-a-new-generation-funeral","type":"story","status":"publish","title_hn":"पाठ्यक्रम ऐसा जिससे हो नई पीढ़ी में संस्कार सृजन","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
पाठ्यक्रम ऐसा जिससे हो नई पीढ़ी में संस्कार सृजन
ब्यूरो, अमर उजाला, आजमगढ़
Updated Sat, 28 Jan 2017 11:57 PM IST
विज्ञापन
आचार्य हरिहर कृपालु
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
भारतीय संस्कृति और सभ्यता की रक्षा के लिए पाठ्यक्रम में बदलाव जरूरी है। विभिन्न कक्षाओं का पाठ्यक्रम ऐसा होना चाहिए जिससे नई पीढ़ी में संस्कार का सृजन हो सके और नई पीढ़ी को पाश्चात्य संस्कृति के अंधानुकरण से बचाया जा सके। पद्मश्री सम्मान से नवाजे गए आचार्य हरिहर कृपालु ने अमर उजाला से बातचीत में कहीं।
जिले के अजमतगढ़ में स्थित कुरहंत आश्रम के आचार्य और श्री महारथी संस्कृत महाविद्यालय के प्राचार्य हरिहर को पद्मश्री भारतीय सभ्यता, संस्कृति और संस्कृति के प्रचार-प्रसार की दिशा में किए गए उल्लेखनीय कार्य के लिए दिया गया है। एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि पाश्चात्य संस्कृति के अंधानुकरण से देशज संस्कृति को क्षति पहुंच रही है।
नई पीढ़ी अपनी संस्कृति और सभ्यता से विमुख हो रही है। कहा कि भारतीय संस्कृति, सभ्यता और संस्कृत के प्रचार प्रसार के लिए वह अंतिम दम तक प्रयासरत रहेंगे। उन्होंने केंद्र सरकार से अपेक्षा की है कि पाठ्यक्रम ऐसा होना चाहिए जिससे संस्कारों का सृजन हो सके और नई पीढ़ी को पाश्चात्य संस्कृति के अंधानुकरण से बचाया जा सके। उन्होंने तत्वबोधिनी शेखर तुलनात्मक अध्ययन पुस्तक लिखी है। विराट पत्रिका और स्त्रोत्रमणि का संपादन भी किया।
विज्ञापन
उल्लेखनीय है कि उन्होंने अध्यात्म के जरिये लोगों को सदमार्ग पर ले जाने, संस्कृति और संस्कृत के प्रचार के साथ विकलांगों की मदद करने का काम किया है। अध्यात्म के क्षेत्र उन्होंने वाराणसी के पटिया में 2000 में अष्टदशभुजा माता मंदिर की स्थापना की।
विज्ञापन
जिले के अजमतगढ़ में स्थित कुरहंत आश्रम के आचार्य और श्री महारथी संस्कृत महाविद्यालय के प्राचार्य हरिहर को पद्मश्री भारतीय सभ्यता, संस्कृति और संस्कृति के प्रचार-प्रसार की दिशा में किए गए उल्लेखनीय कार्य के लिए दिया गया है। एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि पाश्चात्य संस्कृति के अंधानुकरण से देशज संस्कृति को क्षति पहुंच रही है।
विज्ञापन
नई पीढ़ी अपनी संस्कृति और सभ्यता से विमुख हो रही है। कहा कि भारतीय संस्कृति, सभ्यता और संस्कृत के प्रचार प्रसार के लिए वह अंतिम दम तक प्रयासरत रहेंगे। उन्होंने केंद्र सरकार से अपेक्षा की है कि पाठ्यक्रम ऐसा होना चाहिए जिससे संस्कारों का सृजन हो सके और नई पीढ़ी को पाश्चात्य संस्कृति के अंधानुकरण से बचाया जा सके। उन्होंने तत्वबोधिनी शेखर तुलनात्मक अध्ययन पुस्तक लिखी है। विराट पत्रिका और स्त्रोत्रमणि का संपादन भी किया।
विज्ञापन
उल्लेखनीय है कि उन्होंने अध्यात्म के जरिये लोगों को सदमार्ग पर ले जाने, संस्कृति और संस्कृत के प्रचार के साथ विकलांगों की मदद करने का काम किया है। अध्यात्म के क्षेत्र उन्होंने वाराणसी के पटिया में 2000 में अष्टदशभुजा माता मंदिर की स्थापना की।