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Azamgarh News: पशु अस्पतालों में डॉक्टरों की कमी, कहीं फार्मासिस्ट संभाल रहे व्यवस्था तो कहीं ताला
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राजकीय पशु चिकित्सालय पवई डॉक्टर के रूम में बंद ताला।संवाद
जिले में पशु अस्पतालों की संख्या तो 58 है, लेकिन डॉक्टरों की भारी कमी है। इसके कारण कहीं फार्मासिस्ट व्यवस्था देख रहे हैं तो कहीं ताला बंद रहता है। अस्पतालों में डॉक्टरों के न रहने से पशुओं का नियमित इलाज प्रभावित होता है।
पशुपालकों को निजी क्लिनिकों में अनट्रेंड लोगों से अपने पशुओं का इलाज कराना पड़ रहा है। पशुपालन विभाग के आंकड़ों के अनुसार, जिले में 5.50 लाख पशु हैं, वहीं डॉक्टर 30 हैं। इस तरह देखा जाए तो एक डॉक्टर पर करीब 18 हजार पशुओं के स्वास्थ्य की जिम्मेदारी है।
एक डॉक्टर पर अन्य अस्पतालों का भी अतिरिक्त प्रभार दे दिया गया है, लेकिन वह कभी-कभार ही वहां जाते हैं। मंगलवार को 10:30 बजे शाहगढ़ का पशु अस्पताल बंद मिला। दोपहर 12 बजे पशु चिकित्सालय डोढोपुर निजामाबाद खुला मिला, लेकिन डॉक्टर की कुर्सी खाली थी।
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कोई पशुधन प्रसार अधिकारी भी मौजूद नहीं था। अस्पताल में केवल चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी नजर आए। अस्पताल का संचालन एकमात्र चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के भरोसे होता नजर आया।
राजकीय पशु अस्पताल बरदह में तीन सालों से डॉक्टर नहीं है। यहां तैनात रहे पशु चिकित्साधिकारी डॉ. रंजीत पाल के स्थानांतरण के बाद से अब तक किसी स्थायी चिकित्सक की नियुक्ति नहीं की गई है।
अगस्त 2024 से चिकित्सालय का अतिरिक्त प्रभार ठेकमा के डॉ. सुरेश चंद्र पाल के पास है। इनके पास गोसाई बाजार का भी अतिरिक्त प्रभार है। इसके कारण कभी-कभार ही यह बरदह में आ पाते हैं। फार्मासिस्ट उपेंद्र ओम प्रकाश यादव ही पशुओं का इलाज करते हैं।
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आठ सालों से अहरौला में डॉक्टर नहीं
अहरौला। राजकीय पशु चिकित्सालय फार्मासिस्ट के भरोसे चल रहा है। यहां आठ सालों से कोई स्थायी डॉक्टर की तैनाती नहीं हो सकी। ब्लॉक के 94 गांवों में लगभग 26 हजार पशु हैं। इनके स्वास्थ्य व टीकाकरण की जिम्मेदारी डॉक्टरों की होती है। फार्मासिस्ट ब्रह्म प्रकाश ने बताया कि अलौवां पशु अस्पताल के डॉ. संदीप कुमार अहरौला का कार्यभार देखते हैं। संवाद
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डॉक्टर के रूम में लटका मिला ताला
पवई। राजकीय पशु चिकित्सालय पवई में सुबह 11:54 बजे पशु चिकित्साधिकारी कार्यालय का ताला बंद मिला। इसके कारण पशुपालकों को पशुओं के इलाज में परेशानी हुई। वहां मौजूद कर्मचारियों ने बताया कि पशु चिकित्साधिकारी डॉ. लालमन प्रजापति प्रतापपुर गांव में चल रहे टीकाकरण अभियान में गए हैं। संवाद
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मदियापार में चार सालों से डॉक्टर नहीं
बूढ़नपुर। पशु अस्पताल मदियापार और डीगुरपुर में चार सालों से डॉक्टर नहीं हैं। दोनों जगहों पर फार्मासिस्ट ही व्यवस्था देख रहे हैं। मुख्य पोस्टिंग कौड़िया अस्पताल में होने के बाद भी डॉ. संजय सिंह अतिरिक्त प्रभार वाले सरायमीर अस्पताल में बैठते हैं। इसके कारण कौड़िया में हमेशा ताला बंद रहता है। यही हाल गोपालगंज भेदौरा अस्पताल का है। यहां 10 वर्ष बाद डॉक्टर की तैनाती की गई, लेकिन वह अतिरिक्त प्रभार वाले देवगांव पशु अस्पताल में बैठते हैं। संवाद
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फोटो संख्या- 30
पशु चिकित्सालय कौड़िया में डॉक्टर की तैनाती तो है, लेकिन वह कभी यहां नहीं बैठते हैं। इसके कारण पशुओं का इलाज निजी चिकित्सकों से कराना पड़ता है। इससे अधिक खर्च आता है। -मुन्ना यादव, बूढ़नपुर।
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फोटो संख्या- 31
पशु अस्पतालों में चिकित्सक न होने के कारण परेशानी होती है। अतिरिक्त प्रभार वाले डॉक्टर अस्पताल में बैठते नहीं हैं। यही नहीं, सरकारी अस्पतालों में हमेशा दवाओं का भी अभाव रहता है। बाहर से ही दवा लेनी पड़ती है। -जय प्रकाश सिंह, बरदह।
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हर छह माह पर डॉक्टरों की कमी की रिपोर्ट शासन को भेजी जाती है। वहीं से ही डॉक्टरों की तैनाती होती है। जिले में 30 पशु चिकित्साधिकारी तैनात हैं और 58 राजकीय पशु चिकित्सालय हैं। जिन अस्पतालों पर डॉक्टर नहीं हैं, वहां के अन्य अस्पतालों के डॉक्टरों को अतिरिक्त प्रभार दिया गया है। इस समय गांवों में टीकाकरण अभियान चल रहा है। इसलिए डॉक्टर ज्यादा समय गांवों में ही दे रहे हैं। - डॉ. मुकेश गुप्ता, मुख्य पशु चिकित्साधिकारी।
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पशुपालकों को निजी क्लिनिकों में अनट्रेंड लोगों से अपने पशुओं का इलाज कराना पड़ रहा है। पशुपालन विभाग के आंकड़ों के अनुसार, जिले में 5.50 लाख पशु हैं, वहीं डॉक्टर 30 हैं। इस तरह देखा जाए तो एक डॉक्टर पर करीब 18 हजार पशुओं के स्वास्थ्य की जिम्मेदारी है।
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एक डॉक्टर पर अन्य अस्पतालों का भी अतिरिक्त प्रभार दे दिया गया है, लेकिन वह कभी-कभार ही वहां जाते हैं। मंगलवार को 10:30 बजे शाहगढ़ का पशु अस्पताल बंद मिला। दोपहर 12 बजे पशु चिकित्सालय डोढोपुर निजामाबाद खुला मिला, लेकिन डॉक्टर की कुर्सी खाली थी।
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कोई पशुधन प्रसार अधिकारी भी मौजूद नहीं था। अस्पताल में केवल चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी नजर आए। अस्पताल का संचालन एकमात्र चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के भरोसे होता नजर आया।
राजकीय पशु अस्पताल बरदह में तीन सालों से डॉक्टर नहीं है। यहां तैनात रहे पशु चिकित्साधिकारी डॉ. रंजीत पाल के स्थानांतरण के बाद से अब तक किसी स्थायी चिकित्सक की नियुक्ति नहीं की गई है।
अगस्त 2024 से चिकित्सालय का अतिरिक्त प्रभार ठेकमा के डॉ. सुरेश चंद्र पाल के पास है। इनके पास गोसाई बाजार का भी अतिरिक्त प्रभार है। इसके कारण कभी-कभार ही यह बरदह में आ पाते हैं। फार्मासिस्ट उपेंद्र ओम प्रकाश यादव ही पशुओं का इलाज करते हैं।
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आठ सालों से अहरौला में डॉक्टर नहीं
अहरौला। राजकीय पशु चिकित्सालय फार्मासिस्ट के भरोसे चल रहा है। यहां आठ सालों से कोई स्थायी डॉक्टर की तैनाती नहीं हो सकी। ब्लॉक के 94 गांवों में लगभग 26 हजार पशु हैं। इनके स्वास्थ्य व टीकाकरण की जिम्मेदारी डॉक्टरों की होती है। फार्मासिस्ट ब्रह्म प्रकाश ने बताया कि अलौवां पशु अस्पताल के डॉ. संदीप कुमार अहरौला का कार्यभार देखते हैं। संवाद
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डॉक्टर के रूम में लटका मिला ताला
पवई। राजकीय पशु चिकित्सालय पवई में सुबह 11:54 बजे पशु चिकित्साधिकारी कार्यालय का ताला बंद मिला। इसके कारण पशुपालकों को पशुओं के इलाज में परेशानी हुई। वहां मौजूद कर्मचारियों ने बताया कि पशु चिकित्साधिकारी डॉ. लालमन प्रजापति प्रतापपुर गांव में चल रहे टीकाकरण अभियान में गए हैं। संवाद
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मदियापार में चार सालों से डॉक्टर नहीं
बूढ़नपुर। पशु अस्पताल मदियापार और डीगुरपुर में चार सालों से डॉक्टर नहीं हैं। दोनों जगहों पर फार्मासिस्ट ही व्यवस्था देख रहे हैं। मुख्य पोस्टिंग कौड़िया अस्पताल में होने के बाद भी डॉ. संजय सिंह अतिरिक्त प्रभार वाले सरायमीर अस्पताल में बैठते हैं। इसके कारण कौड़िया में हमेशा ताला बंद रहता है। यही हाल गोपालगंज भेदौरा अस्पताल का है। यहां 10 वर्ष बाद डॉक्टर की तैनाती की गई, लेकिन वह अतिरिक्त प्रभार वाले देवगांव पशु अस्पताल में बैठते हैं। संवाद
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फोटो संख्या- 30
पशु चिकित्सालय कौड़िया में डॉक्टर की तैनाती तो है, लेकिन वह कभी यहां नहीं बैठते हैं। इसके कारण पशुओं का इलाज निजी चिकित्सकों से कराना पड़ता है। इससे अधिक खर्च आता है। -मुन्ना यादव, बूढ़नपुर।
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पशु अस्पतालों में चिकित्सक न होने के कारण परेशानी होती है। अतिरिक्त प्रभार वाले डॉक्टर अस्पताल में बैठते नहीं हैं। यही नहीं, सरकारी अस्पतालों में हमेशा दवाओं का भी अभाव रहता है। बाहर से ही दवा लेनी पड़ती है। -जय प्रकाश सिंह, बरदह।
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हर छह माह पर डॉक्टरों की कमी की रिपोर्ट शासन को भेजी जाती है। वहीं से ही डॉक्टरों की तैनाती होती है। जिले में 30 पशु चिकित्साधिकारी तैनात हैं और 58 राजकीय पशु चिकित्सालय हैं। जिन अस्पतालों पर डॉक्टर नहीं हैं, वहां के अन्य अस्पतालों के डॉक्टरों को अतिरिक्त प्रभार दिया गया है। इस समय गांवों में टीकाकरण अभियान चल रहा है। इसलिए डॉक्टर ज्यादा समय गांवों में ही दे रहे हैं। - डॉ. मुकेश गुप्ता, मुख्य पशु चिकित्साधिकारी।