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पारसी थिएटर से जीवंत हो सकती है नौटंकी : रंजीत
ब्यूरो, अमर उजाला, आजमगढ़
Updated Thu, 17 Mar 2016 11:57 PM IST
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रंजीत कपूर
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देशज में हिस्सा लेने आए मशहूर वरिष्ठ रंगकर्मी रंजीत कपूर ने स्वीकारा कि नौटंकी में थिएटर विधा का समावेश आवश्यक है। इससे दोनों जीवंत हो जाएंगे क्योंकि आज ये दोनों विधा लगभग देश के ज्यादातर हिस्से से विलुप्त हो चुकी है।
रंजीत कपूर के पिता मदन लाल कपूर के पास खुद का थिएटर था। साथ ही इनके भाई अन्नू कपूर फिल्म अभिनेता हैं। रंजीत कपूर को नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा वेस्ट निर्देशन के लिए गोल्ड मेडल भी दे चुका है। रंजीत ने जय हो डेमोक्रेसी, चिंटू जी आदि फिल्मों में सफल निर्देशन किया है। उन्होंने स्वीकारा की नौटंकी विलुप्त हो रही है। उसके लिए, उन्होंने इस विधा में व्याप्त परंपरागत तथ्यों और शिल्प को जिम्मेदार माना।
उन्होंने कहा कि आज भी विदेशों के साथ महाराष्ट्र, असम, कर्नाटक और बंगाल में लोग पारसी थिएटर को प्राथमिकता देते है। वहां प्ले देखने के लिए बमुश्किल से टिकट मिल पाता है। जबकि सिनेमा के टिकट आसानी से मिल जाएंगे। बोले, अगर नौटंकी में पारसी थिएटर के कुछ अंश को समावेशित कर दिया जाए तो दोनों कलाएं पूरे देश में एक बार फिर से जीवंत हो सकती है।
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प्रश्र नौटंकी सहित अन्य लोकविधाओं के मंच के विलुप्त होने में सिनेमा के योगदान को स्वीकारा, बोले यह सही है। कहा कि विलुप्त होने के पीछे इस विधा को समय से संरक्षण और मंच का न मिलना भी है। अब अकादमी ने संरक्षण दिया है तो लोग पुन: इससे परिचित होंगे।
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रंजीत कपूर के पिता मदन लाल कपूर के पास खुद का थिएटर था। साथ ही इनके भाई अन्नू कपूर फिल्म अभिनेता हैं। रंजीत कपूर को नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा वेस्ट निर्देशन के लिए गोल्ड मेडल भी दे चुका है। रंजीत ने जय हो डेमोक्रेसी, चिंटू जी आदि फिल्मों में सफल निर्देशन किया है। उन्होंने स्वीकारा की नौटंकी विलुप्त हो रही है। उसके लिए, उन्होंने इस विधा में व्याप्त परंपरागत तथ्यों और शिल्प को जिम्मेदार माना।
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उन्होंने कहा कि आज भी विदेशों के साथ महाराष्ट्र, असम, कर्नाटक और बंगाल में लोग पारसी थिएटर को प्राथमिकता देते है। वहां प्ले देखने के लिए बमुश्किल से टिकट मिल पाता है। जबकि सिनेमा के टिकट आसानी से मिल जाएंगे। बोले, अगर नौटंकी में पारसी थिएटर के कुछ अंश को समावेशित कर दिया जाए तो दोनों कलाएं पूरे देश में एक बार फिर से जीवंत हो सकती है।
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प्रश्र नौटंकी सहित अन्य लोकविधाओं के मंच के विलुप्त होने में सिनेमा के योगदान को स्वीकारा, बोले यह सही है। कहा कि विलुप्त होने के पीछे इस विधा को समय से संरक्षण और मंच का न मिलना भी है। अब अकादमी ने संरक्षण दिया है तो लोग पुन: इससे परिचित होंगे।