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हरिऔध जन्मस्थली खंडहर में तब्दील
अमर उजाला ब्यूरो/आजमगढ
Updated Tue, 28 Jun 2016 12:01 AM IST
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जन्म स्थली
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समाज को उसका ही सच दिखाने के लिए कभी चुभते चौपदे लिखने वाले कवि अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध से जुड़ी स्मृतियां आज उनके ही जन्म स्थल पर बदहाल स्थिति में हैं। खड़ी बोली का प्रथम महाकाव्य प्रियप्रवास जैसी कृति लिखने वाले इस कवि सम्राट की जन्मस्थली अब खंडहर में तब्दील हो गई है। कभी किसी ने परवाह नहीं की, शासन को कभी ख्याल नहीं आया और कस्बे के लोगों ने पचड़े में न पड़कर महज उन पर गर्व कर लेना भर ही ठीक समझा।
जिला मुख्यालय से 15 किलोमीटर दूर निजामाबाद कस्बे में पहुंचते ही कई ऐसे लोग मिल जाते हैं, जो यह गर्व करने से नहीं चूकते कि यह कवि सम्राट हरिऔध की धरती है। इस कस्बे में यह हर आदमी जानता है कि हरिऔध की खंडहर हो चुकी जन्मस्थली कहां है लेकिन उस खंडहर को संवारने और कवि सम्राट की स्मृतियों को सहेजने के लिए उनके कस्बे वालों ने कोई प्रयास क्यों नहीं किया। कवि हरिऔध के टूटे-फूटे घर के ठीक बगल में जगत प्रसिद्ध चरणपादुका गुरुद्धारा है। जहां गुरु तेग बहादुर और गुरुगोविंद जी आकर तपस्या कर चुके हैं। यहां हर वर्ष मार्च माह में हजारों सिख श्रद्धालु देश भर से आते हैं।
शायद यही वजह है कि कवि हरिऔध के पुश्तैनी मकान तक जाने के लिए पक्की सड़क उपलब्ध हो जाती है। इस गुरुद्धारे से कवि का रिश्ता भी रहा है। वे यहां भी रहकर अपना लेखन कार्य किया करते थे। हिंदी कविता में खड़ी बोली को सशक्त स्थान दिलाने वालों में प्रमुख स्थान रखने वाले कवि हरिऔध के इस कस्बे में अभी तक एक भी महाविद्यालय स्थापित नहीं हो सका है। इसके लिए किसी ने कभी सार्थक प्रयास भी नहीं किया। लिहाजा कवि हरिऔध की जन्मस्थली खंडहर में बदल गई है।
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उनके एक मात्र वारिस उनके प्रपौत्र विनोद चंद शर्मा लखनऊ में रहते हैं और कभी-कभार यहां आते हैं। यहां के जनप्रतिनिधियों ने कस्बे के एक छोर पर कवि की छोटी सी प्रतिमा लगवाकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर लिया गया। निजामाबाद में कवि के एक प्रेमी ने अपने बल पर उनके नाम से दो स्कूल स्थापित किया है। इस स्कूल में कभी कवि की प्रतिमा लगाने और वाचनालय स्थापित करने की बात चली थी।
शासन की ओर से हुई इस पहल पर फाइलें भी दौड़ी लेकिन वे फाइलें फिर कहां गई कुछ पता नहीं चला। यहां के लोग यह भी नहीं जानते कि जिन्हें लोग कवि सम्राट कहते हैं उन्होंने अधखिला फूल नामक उपन्यास भी लिखकर हिंदी साहित्य को अनोखे ढंग से समृद्ध किया है। कभी बोलचाल नामक ग्रंथ लिखकर हिंदी मुहावरों के प्रयोग की राह दिखाने वाले हरिऔध की स्मृतियां आज खुद कई-कई मुहावरों का चुभते हुए पर्याय बनकर रह गई है। यह बात तो चुभती है कि निजामाबाद के लोगों की स्मृति में भले ही गर्व के साथ पंडित अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध मिल जाएं लेकिन निजामाबाद की धरती पर उनकी स्मृति कहीं नजर नहीं आती है।
अभी तक शासन स्तर से सुधार की कोई कवायद नहीं की गई है। जबकि यह स्थान नगर पंचायत निजामाबाद में पड़ता है तो प्रथम दृष्ट्या यह मामला नगर पंचायत का है। वहीं से सुधार की व्यवस्था शुरू हो सकती है। - अनिल कुमार सिंह, उपजिलाधिकारी, निजामाबाद
संतोष कुमार गोंड ने कहा कि भाजपा शासन काल में बाईपास तिराहे पर इनकी आदमकद प्रतिमा लगाई गई लेकिन आज तक उसकी रंगाई पुताई नहीं हो सकी। उनका घर खंडहर में तब्दील है। उस स्थान पर पुस्तकालय का निर्माण होना चाहिए। जहां इनकी लिखित पुस्तकें रखी जाएं। जिन्हें पढ़कर लोग इनके बारे में जान सकें।
कस्बा निवासी विजय सोनकर ने कहा कि नगर पंचायत ने इस महान व्यक्ति के लिए आज तक कुछ नहीं किया। इसके कारण नगर से इनकी पहचान समाप्त हो रही है। जबकि इनके पैतृक आवास को सहेजने पर नगर पंचायत को बल देना चाहिए।
शिक्षक राहुल सिंह ने कहा कि अब तो किताबों से भी इनका जीवन परिचय गायब हो चुका है। जिसके कारण नई पीढ़ी इनके बारे में जानने से वंचित है। शासन स्तर से गलत हुआ है। ऐसे महान व्यक्ति के जीवन परिचय को किताबों में सम्मिलित करना चाहिए।
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जिला मुख्यालय से 15 किलोमीटर दूर निजामाबाद कस्बे में पहुंचते ही कई ऐसे लोग मिल जाते हैं, जो यह गर्व करने से नहीं चूकते कि यह कवि सम्राट हरिऔध की धरती है। इस कस्बे में यह हर आदमी जानता है कि हरिऔध की खंडहर हो चुकी जन्मस्थली कहां है लेकिन उस खंडहर को संवारने और कवि सम्राट की स्मृतियों को सहेजने के लिए उनके कस्बे वालों ने कोई प्रयास क्यों नहीं किया। कवि हरिऔध के टूटे-फूटे घर के ठीक बगल में जगत प्रसिद्ध चरणपादुका गुरुद्धारा है। जहां गुरु तेग बहादुर और गुरुगोविंद जी आकर तपस्या कर चुके हैं। यहां हर वर्ष मार्च माह में हजारों सिख श्रद्धालु देश भर से आते हैं।
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शायद यही वजह है कि कवि हरिऔध के पुश्तैनी मकान तक जाने के लिए पक्की सड़क उपलब्ध हो जाती है। इस गुरुद्धारे से कवि का रिश्ता भी रहा है। वे यहां भी रहकर अपना लेखन कार्य किया करते थे। हिंदी कविता में खड़ी बोली को सशक्त स्थान दिलाने वालों में प्रमुख स्थान रखने वाले कवि हरिऔध के इस कस्बे में अभी तक एक भी महाविद्यालय स्थापित नहीं हो सका है। इसके लिए किसी ने कभी सार्थक प्रयास भी नहीं किया। लिहाजा कवि हरिऔध की जन्मस्थली खंडहर में बदल गई है।
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उनके एक मात्र वारिस उनके प्रपौत्र विनोद चंद शर्मा लखनऊ में रहते हैं और कभी-कभार यहां आते हैं। यहां के जनप्रतिनिधियों ने कस्बे के एक छोर पर कवि की छोटी सी प्रतिमा लगवाकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर लिया गया। निजामाबाद में कवि के एक प्रेमी ने अपने बल पर उनके नाम से दो स्कूल स्थापित किया है। इस स्कूल में कभी कवि की प्रतिमा लगाने और वाचनालय स्थापित करने की बात चली थी।
शासन की ओर से हुई इस पहल पर फाइलें भी दौड़ी लेकिन वे फाइलें फिर कहां गई कुछ पता नहीं चला। यहां के लोग यह भी नहीं जानते कि जिन्हें लोग कवि सम्राट कहते हैं उन्होंने अधखिला फूल नामक उपन्यास भी लिखकर हिंदी साहित्य को अनोखे ढंग से समृद्ध किया है। कभी बोलचाल नामक ग्रंथ लिखकर हिंदी मुहावरों के प्रयोग की राह दिखाने वाले हरिऔध की स्मृतियां आज खुद कई-कई मुहावरों का चुभते हुए पर्याय बनकर रह गई है। यह बात तो चुभती है कि निजामाबाद के लोगों की स्मृति में भले ही गर्व के साथ पंडित अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध मिल जाएं लेकिन निजामाबाद की धरती पर उनकी स्मृति कहीं नजर नहीं आती है।
अभी तक शासन स्तर से सुधार की कोई कवायद नहीं की गई है। जबकि यह स्थान नगर पंचायत निजामाबाद में पड़ता है तो प्रथम दृष्ट्या यह मामला नगर पंचायत का है। वहीं से सुधार की व्यवस्था शुरू हो सकती है। - अनिल कुमार सिंह, उपजिलाधिकारी, निजामाबाद
संतोष कुमार गोंड ने कहा कि भाजपा शासन काल में बाईपास तिराहे पर इनकी आदमकद प्रतिमा लगाई गई लेकिन आज तक उसकी रंगाई पुताई नहीं हो सकी। उनका घर खंडहर में तब्दील है। उस स्थान पर पुस्तकालय का निर्माण होना चाहिए। जहां इनकी लिखित पुस्तकें रखी जाएं। जिन्हें पढ़कर लोग इनके बारे में जान सकें।
कस्बा निवासी विजय सोनकर ने कहा कि नगर पंचायत ने इस महान व्यक्ति के लिए आज तक कुछ नहीं किया। इसके कारण नगर से इनकी पहचान समाप्त हो रही है। जबकि इनके पैतृक आवास को सहेजने पर नगर पंचायत को बल देना चाहिए।
शिक्षक राहुल सिंह ने कहा कि अब तो किताबों से भी इनका जीवन परिचय गायब हो चुका है। जिसके कारण नई पीढ़ी इनके बारे में जानने से वंचित है। शासन स्तर से गलत हुआ है। ऐसे महान व्यक्ति के जीवन परिचय को किताबों में सम्मिलित करना चाहिए।