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Azamgarh News: डिजिटल युग में भी रामानंद सरस्वती पुस्तकालय में किताबें पढ़ने आते हैं छात्र

Wed, 23 Apr 2025 12:01 AM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Wed, 23 Apr 2025 12:01 AM IST
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Even in the digital age, students come to Ramanand Saraswati library to read books
निजामाबाद/लाटघाट। महाकवि अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध की धरती पर साहित्य प्रेम अभी भी बरकरार है। हालांकि डिजिटल युग में जहां युवाओं और लोगों का रुझान पहले जैसा नहीं रहा। पुस्तकों को रखने के लिए नए पुस्तकालय तो कम खुले। लेकिन एक पुस्तकालय है जहां प्रतियोगी छात्र और साहित्य प्रेमी रोजाना पहुंचते हैं। हम बता रहे जोकहरा स्थित रामानंद सरस्वती पुस्तकालय के बारे में। इस पुस्तकालय की देखरेख का जिम्मा कभी करीम लाला गैंग शूटर रहे सुधीर शर्मा संभाल रहे हैं।
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अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ का जन्म आज़मगढ़ ज़िले के निज़ामाबाद में 1865 में हुआ था। उनकी प्रतिष्ठा खड़ी बोली को काव्य-भाषा के रूप में स्थापित करने वाले प्रमुख कवियों के रूप में है और इस क्रम में उनकी कृति ‘प्रिय प्रवास’ को खड़ी बोली का पहला महाकाव्य कहा जाता है। उनके पैतृक स्थान को पुस्तकालय के रूप में विकसित करने की मांग काफी दिनों से उठ रही है, लेकिन आज तक यह मांग पूरी नहीं हो सकी है। इस संबंध में निजामाबाद कस्बे के जनता इंटर कॉलेज में हिंदी के प्रवक्ता डॉक्टर दिनेश प्रताप सिंह ने बताया कि हरिऔध ने खड़ी बोली मैं अपना पहला महाकाव्य प्रियप्रवास देकर हिंदी साहित्य जगत में जो योगदान दिया है वह बहुत महत्वपूर्ण है हर कक्षाओं में इनका जीवन परिचय के साथ कुछ महत्वपूर्ण बिंदुओं को देना चाहिए जो छात्र के जीवन में हिंदी साहित्य के जगत के लिए महत्वपूर्ण है। दूसरी ओर युवा वर्ग जहां तेजी से डिजिटल की ओर से भाग रहा है। मोबाइल और लैपटॉप पर ही उनकी पढ़ाई हो रही है। इसका परिणाम है कि युवाओं में पढ़ने की क्षमता कम हो रही है। वहीं पुस्तकों के प्रति उनका मोह भंग हो रहा है।
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40 हजार से अधिक किताबें हैं पुस्तकालय में
डिजिटल युग के दौर में सगड़ी तहसील का रामानंद पुस्तकालय आज भी युवाओं में अपनी पहचान बनाए हुए हैं। प्रतियोगी परीक्षा की तैयारियों में जुटे युवा यहां प्रतिदिन पहुंचकर अपनी तैयारी करते हैं। आज सुधीर शर्मा जरायम की दुनिया को छोड़कर इस पुस्तकालय को सजाने संवारने में जुटे रहते हैं। पुस्तकालय की निदेशिका हिना देसाई ने कहा कि श्री रामानंद सरस्वती पुस्तकालय आज जनपद में अपनी अलग पहचान बनाए हुए है। आज जहां युवाओं का किताबों से मोह भंग हो रहा है वहीं इस ग्रामीण इलाके में प्रतिदिन 20 से 25 बच्चे यहां पढ़ने के लिए पहुंचते हैं। यहां 40 हजार से अधिक किताबें हैं। इनमें प्रतियोगी परीक्षाओं से लेकर साहित्य की किताबें शामिल हैं। वहीं जो किताबें उपलब्ध नहीं हैं, उसके लिए 20 कंप्यूटर हैं। जिस पर किताबों को पढ़ने की ऑनलाइन सुविधा भी निशुल्क मिलती है। इतना ही नहीं कई शोध छात्र भी आते हैं।
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