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बंदरों व छुट्टा पशुओं ने शहरवासियों की उड़ाई नींद, जिम्मेदार मौन
Updated Tue, 25 Sep 2018 12:08 AM IST
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आजमगढ़। शहर समेत ग्रामीणांचल में आवारा पशुओं का आतंक छाया हुआ है। बीच सड़क पर जमे यह आवारा पशु राहगीरों के लिए समस्या बन गए हैं वहीं बंदरों के आतंक भी लोगों को डराए हुए है। नगर निकाय प्रशासन अपनी जिम्मेदारी से मुंह मोड़े है।
शहरी क्षेत्र की बात की जाए तो नगर पालिका प्रशासन पर आवारा पशुओं और बंदरों पर लगाम लगाने की जिम्मेदारी है। नपा प्रशासन ने इसके लिए लाखों का कैटल कैचिंग वाहन भी खरीद रखा है, जो आने के बाद से ही शोपीस बनकर खड़ा है। अब तक शायद ही इस वाहन का प्रयोग किया गया हो। पूरा शहर बंदरों, आवारा कुत्तों व छुट्टा मवेशियों से परेशान है। बंदरों का आतंक तो इतना बढ़ गया है कि लोग अब अपने घरों के छतों पर जाना छोड़ दिए हैं। और कइयों ने तो सुरक्षा के लिए अपने छतों पर लोहे की बाड़ लगा ली है। शहर में कुत्तों की संख्या भी लोगों के लिए बड़ी परेशानी बन गई है। जो कब कहां किसे काट ले कहा नहीं जा सकता है। सड़क पर सुअरों का झुंड न सिर्फ हादसे की वजह बन रहा है बल्कि कूड़े के ढेर फैला देते हैं। वहीं सड़ा पर कब्जा जमाए मवेशी भी कम खतरनाक नहीं हैं। दिन में तो लोग इनसे बचकर निकल भी जाते हैं लेकिन रात को सड़क पर बैठे ये पशु नजर न आने की वजह से आए दिन हादसों की वजह बन रहे हैं। पहले शहर में जहां इक्का-दुक्का सांड़ ही दिखाते थे अब जगह-जगह जमघट लगा रहता है।
उपलब्ध नहीं है एंटी रेबीज इंजेक्शन
आजमगढ़। छुट्टा जानवरों में शामिल बंदर, कुत्ता आदि के काटने के बाद लगाया जाने वाला एंटी रेबीज इंजेक्शन सरकारी अस्पतालों पर जरूरतभर उपलब्ध नहीं है। जिला मुख्यालय पर स्थित मंडलीय अस्पताल के साथ ही ग्रामीणांचल में स्थित सीएचसी-पीएचसी पर इन जानवरों के काटने के बाद लगाने वाला इंजेक्शन उपलब्ध नहीं मिलता है। हालांकि स्वास्थ्य विभाग प्रचुर मात्रा में एंटी रेबीज के इंजेक्शन मौजूद होने का दावा कर रहा है, लेकिन जब मरीज अस्पताल पर इंजेक्शन लगवाने के लिए पहुंचता है तो उसे बैरंग ही वापस लौटना पड़ता है।
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अहरौला क्षेत्र में छुट्टा पशुओं का है आतंक
अहरौला। क्षेत्र में छुट्टा मवेशियों का ज्यादा आतंक है। थाना परिसर, अस्पताल, संसाधन केंद्र के आसपास हमेशा ही 40-50 की संख्या में इनका झुंड मौजूद होता है। कोई गलती से भी इनके पास से गुजर जाता है तो ये छुट्टा मवेशी उसे सिंग मार कर घायल कर देते है। इतना ही नहीं यह झुंड जब किसी खेत में घुस जाता है तो पूरे खेत की फसल को तहस नहस कर देता है। अभी कुछ दिनों पूर्व ही छुट्टा मवेशियों का झुंड थाना परिसर में घुस गया था और थाने पर तैनात पुलिस कर्मी इनके आतंक से बचने के लिए दुबक से गए थे। काफी मशक्कत के बाद इन आवारा मवेशियों को थाना परिसर से बाहर किया जा सका था। क्षेत्र के मतलूपुर गांव निवासी देवी पांडेय, जगदंबा शुक्ला, डरारी गांव निवासी काली शुक्ला को इन छुट्टा मवेशियों ने सिंग मार कर घायल कर दिया, जिसके चलते इन्हें कई दिनों तक अस्पताल में भर्ती होकर अपना इलाज तक कराना पड़ा। सीएचसी परिसर स्थित डॉक्टरों के आवास में तो यह हाल है कि यह छुट्टा मवेशी सीढिय़ों से होते हुए ऊपरी तल तक पहुंच जाते है। छुट्टा छोड़े गए इन मवेशियों के आतंक से राहगीर किसान सभी परेशान है।
कटहवां बंदर का था आतंक, ग्रामीणों ने मार डाला
लाटघाट। स्थानीय क्षेत्र में बंदरों का आतंक बहुत ज्यादा है। इसमें भी एक बंदर ऐसा भी था जो बच्चों को देखते हीत्न सीधे काटने के लिए दौड़ा लेता था। स्कूल जा रहे कई बच्चों व अन्य लोगों को वह काट चुका था। इस बंदर के काटने से 10 बच्चों समेत करीब 16 लोग घायल हो चुके थे। लोगों ने बार-बार जिम्मेदार अधिकारियों से इस बंदर के आतंक से मुक्ति दिलाने की मांग की लेकिन कहीं कोई सुनवाई नहीं हुई। दो दिन पहले इस बंदर ने दो वर्ष के मासूम पर हमला कर दिया तो लोगों का धैर्य जवाब दे गया और एकजुट होकर उन्होंने बंदर को मार डाला। हालांकि इलाके में बंदरों के झुंड की समस्या से अभी तक लोगों को राहत नहीं मिली है।
रेलवे स्टेशन पर यात्री होते है बंदरों से परेशान
पल्हनी। आजमगढ़ रेलवे स्टेशन की स्थिति तो यह है कि कब बंदरों की टोली हमला कर दे और समान लेकर फरार हो जाए कहा नहीं जा सकता है। ट्रेन के इंतजार में प्लेटफार्म पर बैठे यात्रियों ने यदि जरा सी लापरवाही बरती तो बंदरों की टोली इनके सामान उठा कर ऊपर लगे टीनशेड पर चढ़ जाते हे। ऐसी स्थिति में यदि ट्रेन के आने का समय हो गया होता है तो कई यात्रियों की ट्रेन बंदरों से सामान वापस लेने में छूट तक जाती है। रेलवे स्टेशन के साथ ही आसपास स्थित कालोनियों व ग्रामों में भी इनका जबदरस्त आतंक है। कई लोग तो इनके काटने से घायल भी हो चुके है।
सगड़ी तहसील में भी बंदरों का आतंक
सगड़ी। तहसील क्षेत्र में बंदरों का आतंक दिनप्रति दिन बढ़ता जा रहा है। छोटे बच्चे घरों से बाहर निकलने में डरते हैं। मालटारी, बोझिया, कठैचा, महुलिया, कसौली, भदांव, जीयनपुर सहित पूरे क्षेत्र में बंदरों का आतंक है। इसकी शिकायत गांव के सेवानिवृत्त सैनिक श्यामनरायन, जयप्रकाश मौर्य, श्रीप्रकाश, वीरेंद्र, मुकेश राय आदि लोगों ने एसडीएम को लिखित की थी, लेकिन इस पर कोई भी कार्रवाई नहीं की गई।
मैन पावर व पकड़े गए छुट्टा मवेशियों को रखने के लिए बाड़े का इंतजाम न होने के चलते ही हम इन बंदरों, कुत्तों, सुअरो और अन्य मवेशियों की धर पकड़ नहीं कर पा रहे है। जहां तक कैटिल कैचिंग वाहन की बात है तो यह पूर्ववर्ती अध्यक्ष के कार्यकाल में खरीदी गई है। ट्रेड कर्मी और रखने के स्थान न होने के चलते ही इसका उपयोग नहीं हो पा रहा है। सुअर पालकों को लगातार नोटिस दी जाती है और जुर्माना भी लगाया जाता है लेकिन जुर्माने की रकम काफी कम है, जिसके चलते वे जुर्माना जमा कर देते है और अपने सुअरों को छुट्टा छोड़ देते है।
शीला श्रीवास्तव, अध्यक्ष नगर पालिका परिषद आजमगढ़।
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शहरी क्षेत्र की बात की जाए तो नगर पालिका प्रशासन पर आवारा पशुओं और बंदरों पर लगाम लगाने की जिम्मेदारी है। नपा प्रशासन ने इसके लिए लाखों का कैटल कैचिंग वाहन भी खरीद रखा है, जो आने के बाद से ही शोपीस बनकर खड़ा है। अब तक शायद ही इस वाहन का प्रयोग किया गया हो। पूरा शहर बंदरों, आवारा कुत्तों व छुट्टा मवेशियों से परेशान है। बंदरों का आतंक तो इतना बढ़ गया है कि लोग अब अपने घरों के छतों पर जाना छोड़ दिए हैं। और कइयों ने तो सुरक्षा के लिए अपने छतों पर लोहे की बाड़ लगा ली है। शहर में कुत्तों की संख्या भी लोगों के लिए बड़ी परेशानी बन गई है। जो कब कहां किसे काट ले कहा नहीं जा सकता है। सड़क पर सुअरों का झुंड न सिर्फ हादसे की वजह बन रहा है बल्कि कूड़े के ढेर फैला देते हैं। वहीं सड़ा पर कब्जा जमाए मवेशी भी कम खतरनाक नहीं हैं। दिन में तो लोग इनसे बचकर निकल भी जाते हैं लेकिन रात को सड़क पर बैठे ये पशु नजर न आने की वजह से आए दिन हादसों की वजह बन रहे हैं। पहले शहर में जहां इक्का-दुक्का सांड़ ही दिखाते थे अब जगह-जगह जमघट लगा रहता है।
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उपलब्ध नहीं है एंटी रेबीज इंजेक्शन
आजमगढ़। छुट्टा जानवरों में शामिल बंदर, कुत्ता आदि के काटने के बाद लगाया जाने वाला एंटी रेबीज इंजेक्शन सरकारी अस्पतालों पर जरूरतभर उपलब्ध नहीं है। जिला मुख्यालय पर स्थित मंडलीय अस्पताल के साथ ही ग्रामीणांचल में स्थित सीएचसी-पीएचसी पर इन जानवरों के काटने के बाद लगाने वाला इंजेक्शन उपलब्ध नहीं मिलता है। हालांकि स्वास्थ्य विभाग प्रचुर मात्रा में एंटी रेबीज के इंजेक्शन मौजूद होने का दावा कर रहा है, लेकिन जब मरीज अस्पताल पर इंजेक्शन लगवाने के लिए पहुंचता है तो उसे बैरंग ही वापस लौटना पड़ता है।
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अहरौला क्षेत्र में छुट्टा पशुओं का है आतंक
अहरौला। क्षेत्र में छुट्टा मवेशियों का ज्यादा आतंक है। थाना परिसर, अस्पताल, संसाधन केंद्र के आसपास हमेशा ही 40-50 की संख्या में इनका झुंड मौजूद होता है। कोई गलती से भी इनके पास से गुजर जाता है तो ये छुट्टा मवेशी उसे सिंग मार कर घायल कर देते है। इतना ही नहीं यह झुंड जब किसी खेत में घुस जाता है तो पूरे खेत की फसल को तहस नहस कर देता है। अभी कुछ दिनों पूर्व ही छुट्टा मवेशियों का झुंड थाना परिसर में घुस गया था और थाने पर तैनात पुलिस कर्मी इनके आतंक से बचने के लिए दुबक से गए थे। काफी मशक्कत के बाद इन आवारा मवेशियों को थाना परिसर से बाहर किया जा सका था। क्षेत्र के मतलूपुर गांव निवासी देवी पांडेय, जगदंबा शुक्ला, डरारी गांव निवासी काली शुक्ला को इन छुट्टा मवेशियों ने सिंग मार कर घायल कर दिया, जिसके चलते इन्हें कई दिनों तक अस्पताल में भर्ती होकर अपना इलाज तक कराना पड़ा। सीएचसी परिसर स्थित डॉक्टरों के आवास में तो यह हाल है कि यह छुट्टा मवेशी सीढिय़ों से होते हुए ऊपरी तल तक पहुंच जाते है। छुट्टा छोड़े गए इन मवेशियों के आतंक से राहगीर किसान सभी परेशान है।
कटहवां बंदर का था आतंक, ग्रामीणों ने मार डाला
लाटघाट। स्थानीय क्षेत्र में बंदरों का आतंक बहुत ज्यादा है। इसमें भी एक बंदर ऐसा भी था जो बच्चों को देखते हीत्न सीधे काटने के लिए दौड़ा लेता था। स्कूल जा रहे कई बच्चों व अन्य लोगों को वह काट चुका था। इस बंदर के काटने से 10 बच्चों समेत करीब 16 लोग घायल हो चुके थे। लोगों ने बार-बार जिम्मेदार अधिकारियों से इस बंदर के आतंक से मुक्ति दिलाने की मांग की लेकिन कहीं कोई सुनवाई नहीं हुई। दो दिन पहले इस बंदर ने दो वर्ष के मासूम पर हमला कर दिया तो लोगों का धैर्य जवाब दे गया और एकजुट होकर उन्होंने बंदर को मार डाला। हालांकि इलाके में बंदरों के झुंड की समस्या से अभी तक लोगों को राहत नहीं मिली है।
रेलवे स्टेशन पर यात्री होते है बंदरों से परेशान
पल्हनी। आजमगढ़ रेलवे स्टेशन की स्थिति तो यह है कि कब बंदरों की टोली हमला कर दे और समान लेकर फरार हो जाए कहा नहीं जा सकता है। ट्रेन के इंतजार में प्लेटफार्म पर बैठे यात्रियों ने यदि जरा सी लापरवाही बरती तो बंदरों की टोली इनके सामान उठा कर ऊपर लगे टीनशेड पर चढ़ जाते हे। ऐसी स्थिति में यदि ट्रेन के आने का समय हो गया होता है तो कई यात्रियों की ट्रेन बंदरों से सामान वापस लेने में छूट तक जाती है। रेलवे स्टेशन के साथ ही आसपास स्थित कालोनियों व ग्रामों में भी इनका जबदरस्त आतंक है। कई लोग तो इनके काटने से घायल भी हो चुके है।
सगड़ी तहसील में भी बंदरों का आतंक
सगड़ी। तहसील क्षेत्र में बंदरों का आतंक दिनप्रति दिन बढ़ता जा रहा है। छोटे बच्चे घरों से बाहर निकलने में डरते हैं। मालटारी, बोझिया, कठैचा, महुलिया, कसौली, भदांव, जीयनपुर सहित पूरे क्षेत्र में बंदरों का आतंक है। इसकी शिकायत गांव के सेवानिवृत्त सैनिक श्यामनरायन, जयप्रकाश मौर्य, श्रीप्रकाश, वीरेंद्र, मुकेश राय आदि लोगों ने एसडीएम को लिखित की थी, लेकिन इस पर कोई भी कार्रवाई नहीं की गई।
मैन पावर व पकड़े गए छुट्टा मवेशियों को रखने के लिए बाड़े का इंतजाम न होने के चलते ही हम इन बंदरों, कुत्तों, सुअरो और अन्य मवेशियों की धर पकड़ नहीं कर पा रहे है। जहां तक कैटिल कैचिंग वाहन की बात है तो यह पूर्ववर्ती अध्यक्ष के कार्यकाल में खरीदी गई है। ट्रेड कर्मी और रखने के स्थान न होने के चलते ही इसका उपयोग नहीं हो पा रहा है। सुअर पालकों को लगातार नोटिस दी जाती है और जुर्माना भी लगाया जाता है लेकिन जुर्माने की रकम काफी कम है, जिसके चलते वे जुर्माना जमा कर देते है और अपने सुअरों को छुट्टा छोड़ देते है।
शीला श्रीवास्तव, अध्यक्ष नगर पालिका परिषद आजमगढ़।