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सरकारी एंबुलेंस तो है, फिर भी प्राइवेट एंबुलेसों का कब्जा
Updated Sat, 20 Jan 2018 12:17 AM IST
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आजमगढ़। मंडलीय अस्पताल परिसर पर इन दिनों प्राइवेट एंबुलेंस का अड्डा बन गया है। सरकारी एंबुलेंस होने के बाद भी ये प्राइवेट एंबुलेंस मुख्य गेट तक कब्जा जमाए रहते है। अस्पताल प्रशासन की अनदेखी के चलते अक्सर ही मरीजों को इन प्राइवेट एंबुलेंस संचालकों के शोषण का शिकार होना पड़ता है। कई-कई बार तो सेटिंग के प्राइवेट अस्पतालों पर रेफर मरीज को ले जाने के लिए एंबुलेंस चालकों में आपस में ही भिड़त तक हो जाती है।
शासन ने मरीजों को बेहतर चिकित्सकीय सुविधा उपलब्ध कराने के लिए सरकारी अस्पतालों में एंबुलेंस की व्यवस्था की है। जिससे मरीजों को घर से अस्पताल और अस्पताल से घर ले जाने का प्रावधान किया गया है। इतना ही नहीं अस्पताल से रेफर किए जाने के बाद मरीजों को दूसरे बड़े अस्पतालों पर भी ले जाने के लिए सरकारी एंबुलेंस ही सेवा प्रदान करती है। इसके बाद भी मंडलीय अस्पताल परिसर में प्राइवेट एंबुलेंस का अवैध कब्जा है। हालत तो यह है कि ये प्राइवेट एंबुलेंस चालक अस्पताल के मुख्य गेट तक कब्जा जमाए रहते है। वहीं सरकारी एंबुलेंस जिसे अस्पताल के गेट के पास मौजूद होना चाहिए वह परिसर में इधर-उधर खड़ा होने को मजबूर है। जैसे ही कोई मरीज रेफर हुआ कि उसे प्राइवेट एंबुलेंस संचालक जबरन अपने-अपने एंबुलेंस में बैठाने के लिए आपस में ही भिड़ जाते है। अस्पताल प्रशासन इन प्राइवेट एंबुलेंस संचालकों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं कर रहा है। जिसके चलते प्राइवेट एंबुलेंस मनमाना कब्जा जमाए है। सूत्रों की माने तो अस्पताल के अंदर भी इन प्राइवेट एंबुलेंस संचालकों की अच्छी सेटिंग है, जिससे रेफर हुए मरीजों की सूचना इन तक आसानी से पहुंच जाती है।
इनसेट-
प्राइवेट एंबुलेंस संचालकों को मिलती है कमीशन
आजमगढ़। मंडलीय अस्पताल से रेफर मरीजों को प्राइवेट एंबुलेंस चालक अपनी गाड़ी पर लाद कर सीधे सेटिंग वाले प्राइवेट अस्पतालों पर ले जाते है। एक तो तीमारदार एंबुलेंस का निर्धारित चार्ज वहन करते है तो वहीं प्राइवेट अस्पताल वाले भी मरीज की स्थिति के हिसाब से इन एंबुलेंस संचालकों को मोटी कमीशन मरीज पहुंचाने के नाम देते है।
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कोट--
अस्पताल परिसर में खड़े होने वाले प्राइवेट एंबुलेंस पूरी तरह से अनाधिकृत रूप से खड़े होते है। इन्हें अस्पताल के बाहर करने के लिए कई बार शहर कोतवाली व बलरामपुर चौकी पुलिस को लिखित पत्र दिया जा चुका है। अस्पताल प्रशासन सिर्फ पुलिस से इन्हें बाहर करने के लिए कह ही सकता है। हम जबरन इन्हें अस्पताल से बाहर नहीं निकाल सकते। डॉ. जीएल केशरवानी, प्रमुख चिकित्सा अधीक्षक, मंडलीय अस्पताल, आजमगढ़।
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शासन ने मरीजों को बेहतर चिकित्सकीय सुविधा उपलब्ध कराने के लिए सरकारी अस्पतालों में एंबुलेंस की व्यवस्था की है। जिससे मरीजों को घर से अस्पताल और अस्पताल से घर ले जाने का प्रावधान किया गया है। इतना ही नहीं अस्पताल से रेफर किए जाने के बाद मरीजों को दूसरे बड़े अस्पतालों पर भी ले जाने के लिए सरकारी एंबुलेंस ही सेवा प्रदान करती है। इसके बाद भी मंडलीय अस्पताल परिसर में प्राइवेट एंबुलेंस का अवैध कब्जा है। हालत तो यह है कि ये प्राइवेट एंबुलेंस चालक अस्पताल के मुख्य गेट तक कब्जा जमाए रहते है। वहीं सरकारी एंबुलेंस जिसे अस्पताल के गेट के पास मौजूद होना चाहिए वह परिसर में इधर-उधर खड़ा होने को मजबूर है। जैसे ही कोई मरीज रेफर हुआ कि उसे प्राइवेट एंबुलेंस संचालक जबरन अपने-अपने एंबुलेंस में बैठाने के लिए आपस में ही भिड़ जाते है। अस्पताल प्रशासन इन प्राइवेट एंबुलेंस संचालकों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं कर रहा है। जिसके चलते प्राइवेट एंबुलेंस मनमाना कब्जा जमाए है। सूत्रों की माने तो अस्पताल के अंदर भी इन प्राइवेट एंबुलेंस संचालकों की अच्छी सेटिंग है, जिससे रेफर हुए मरीजों की सूचना इन तक आसानी से पहुंच जाती है।
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प्राइवेट एंबुलेंस संचालकों को मिलती है कमीशन
आजमगढ़। मंडलीय अस्पताल से रेफर मरीजों को प्राइवेट एंबुलेंस चालक अपनी गाड़ी पर लाद कर सीधे सेटिंग वाले प्राइवेट अस्पतालों पर ले जाते है। एक तो तीमारदार एंबुलेंस का निर्धारित चार्ज वहन करते है तो वहीं प्राइवेट अस्पताल वाले भी मरीज की स्थिति के हिसाब से इन एंबुलेंस संचालकों को मोटी कमीशन मरीज पहुंचाने के नाम देते है।
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अस्पताल परिसर में खड़े होने वाले प्राइवेट एंबुलेंस पूरी तरह से अनाधिकृत रूप से खड़े होते है। इन्हें अस्पताल के बाहर करने के लिए कई बार शहर कोतवाली व बलरामपुर चौकी पुलिस को लिखित पत्र दिया जा चुका है। अस्पताल प्रशासन सिर्फ पुलिस से इन्हें बाहर करने के लिए कह ही सकता है। हम जबरन इन्हें अस्पताल से बाहर नहीं निकाल सकते। डॉ. जीएल केशरवानी, प्रमुख चिकित्सा अधीक्षक, मंडलीय अस्पताल, आजमगढ़।