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Ayodhya News: शस्त्र धारी स्वरूप, लेकिन भोजन के समय सौम्य राम

Sat, 05 Jul 2025 08:52 PM IST
लखनऊ ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, अयोध्या
संवाद न्यूज एजेंसी, अयोध्या Updated Sat, 05 Jul 2025 08:52 PM IST
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Weapon-carrying form, but gentle Ram during mealtime
अयोध्या। राम मंदिर के प्रथम तल पर स्थापित राजाराम का स्वरूप शस्त्र धारी है। श्रीराम के हाथ में सदा धनुष रहता है, जो रक्षक रूप का प्रतीक है। लेकिन हाल ही में सोशल मीडिया पर राम दरबार की ऐसी तस्वीरें वायरल हुई, जिनमें उनके हाथ में धनुष नहीं था। तस्वीर के सामने आते ही तरह-तरह की चर्चाएं शुरू हो गईं। किसी ने सुरक्षा का सवाल उठाया, तो किसी ने परंपरा की बात कही। इस पर मंदिर के पुजारियों का कहना है कि यह कोई लापरवाही या भूल नहीं, बल्कि मंदिर की शास्त्र सम्मत परंपरा है।
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राम मंदिर के भूतल पर रामलला पांच साल के बालक के रूप में विराजमान हैं। प्रथम तल पर राजाराम के रूप में सपरिवार विराजमान हैं। दोनों मूर्तियों की खासियत यह है कि श्रीराम ने धनुष-बाण धारण कर रखा है। रामलला को प्रतिदिन भोग अर्पण किया जाता है, जिसमें उनका राजसी सत्कार होता है। शास्त्रों में उल्लेख है कि भोजन के समय राजा को शस्त्र धारण नहीं करने चाहिए, यह शांति और सौहार्द का प्रतीक माना गया है। इसी परंपरा का पालन करते हुए जब रामलला और राजाराम को भोग अर्पित किया जाता है, तो उनके हाथों से अस्थायी रूप से धनुष हटाया जाता है।
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राम मंदिर के एक पुजारी ने बताया कि भोजन के उपरांत, जैसे ही श्रीविग्रह का नवीन (शृंगार होता है, शस्त्र दोबारा स्थापित कर दिए जाते हैं। यह प्रक्रिया प्रतिदिन की सेवा का हिस्सा है और इसमें कोई अनियमितता नहीं है। पुजारियों का कहना है कि शस्त्र धारण केवल युद्ध या रक्षण के समय आवश्यक होता है। जब प्रभु भक्तों को प्रसन्न करने के लिए भोजन स्वीकार कर रहे होते हैं, तब वे शांत भाव रखते हैं। इसी भाव को मूर्ति सेवा में भी उतारा गया है। पुजारियों ने भक्तों से अपील की है कि वे आधी-अधूरी जानकारियों के आधार पर भ्रम न फैलाएं। रामलला की सेवा विधि पूर्णतः शास्त्रों और परंपराओं के अनुरूप है।
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राजाराम की मूर्ति गढ़ने वाले मूर्तिकार सत्यनारायण पांडेय भी इसे उपासना सेवा का हिस्सा मानते हैं। उन्होंने कहा कि उन्होंने मूर्ति के साथ धनुष नहीं बनाया है। धनुष राम मंदिर ट्रस्ट ने अलग से बनवाया है, जो चांदी से निर्मित और स्वर्ण मंडित है। पुजारी इसे जब चाहें मूर्ति से अलग कर सकते हैं। कहा कि जहां श्रद्धा है, वहां सवाल भी होंगे, पर उत्तर भी वही देंगे, जहां मर्यादा बसती है। अयोध्या की हर परंपरा के पीछे कोई न कोई शास्त्रीय संवेदना छिपी होती है, बस उसे समझने की जरूरत है।
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