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Ayodhya News: यहां हिंडोले पर एक साथ विराजते हैं चारों भाई..
Mon, 12 Aug 2024 12:08 AM IST
लखनऊ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, अयोध्या
संवाद न्यूज एजेंसी, अयोध्या
Updated Mon, 12 Aug 2024 12:08 AM IST
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श्रीरामजन्मभूमि परिसर में हिंडोले पर विराजमान भगवान के विग्रह।
अयोध्या। रामनगरी में सावन झूलनोत्सव की समृद्ध परंपरा सदियों से चली आ रही है। यहां सावन में भगवान श्रीराम के साथ माता जानकी के विग्रह सैकड़ों मंदिरों में हिंडोले पर विराजित किए जाते हैं। कुछ मंदिरों में झूलनोत्सव की परंपरा इससे इतर है। जहां प्रभु श्रीराम व माता जानकी के साथ भरत, लक्ष्मण व शत्रुहन को भी झूले पर विराजित किया जाता है। ऐसे मंदिरों में श्रीरामलला, दशरथमहल, रंगमहल व राजगोपाल प्रसिद्ध हैं।
श्रीराम जन्मभूमि में स्थापित रामलला का दरबार भी झूलनोत्सव से गुलजार है। रजत हिंडोले पर विराजमान भगवान श्रीरामलला प्रतिदिन झूला विहार कर रहे हैं। इस अवसर पर गीत-संगीत की महफिल भी सज रही है। श्रीरामलला के मुख्य अर्चक आचार्य सत्येंद्र दास बताते हैं कि रामलला के दरबार में झूलनोत्सव की विशिष्ट परंपरा है। यहां हिंडोले पर श्रीराम के साथ-साथ भरत, लक्ष्मण व शत्रुघ्न को भी झूले पर विराजमान कर झुलाया जाता है। रविवार को 1.50 लाख भक्तों ने रामलला के दरबार में हाजिरी लगाई।
रामकोट के पौराणिक मंदिरों में शामिल रंगमहल में भी झूलनोत्सव की विशिष्ट परंपरा है। रंगमहल की यह परंपरा रामनगरी के सिद्ध संतों में शामिल रहे स्वामी सरयू शरण के समय से ही प्रवाहमान है। यहां अन्य मंदिरों की तुलना में चार झूले पड़ते हैं। एक झूले पर राम-जानकी, अन्य पर भरत-मांडवी, लक्ष्मण-उर्मिला व शत्रुहन-श्रुतिकीर्ति के होते हैं। रंगमहल के महंत रामशरण दास बताते हैं कि भगवान श्रीराम सहित चारों भाई व उनकी पत्नियां सत्ता के पूरक और करीब होने के कारण प्रभु राम एवं सीता से अभिन्न हैं। इसी अभिन्नता की पुष्टि के लिए सावन में चार झूले स्थापित कर सभी को झुलाया जाता है। भव्य सांस्कृतिक संध्या उत्सव की भव्यता में इजाफा करती है। राजगोपाल मंदिर में भी झूले पर भगवान श्री राम समेत चारों भाइयों व माता सीता को विराजित कर झूलनोत्सव मनाने की परंपरा है।
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झूले पर विराजित किए जाते हैं आठ विग्रह
दशरथमहल के बारे में मान्यता है कि त्रेतायुग में यहां राजा दशरथ का महल था। भगवान श्रीरामलला का बचपन इसी महल में बीता है। करीब 300 वर्ष पूर्व त्रेतायुगीन इस विरासत को पहुंचे हुए संत रामप्रसादाचार्य ने पुर्नस्थापित किया था। किवंदती है कि बाबा रामप्रसादाचार्य को माता किशोरी ने स्वयं अपने हाथों से तिलक किया था, जो आजीवन अमिट रहा। बिंदु संप्रदाय का शुभारंभ भी यहीं से माना जाता है। दशरथ महल की विरासत के अनुरूप यहां भगवान की सेवा पूरे राजसी वैभव के साथ की जाती है। सावन माह में दशरथमहल की शोभा अत्यंत मनमोहक होती है। मंदिर के महंत बिंदुगाद्याचार्य स्वामी देवेंद्रप्रसादाचार्य बताते हैं कि स्वर्ण रजत जड़ित हिंडोले पर भगवान राम सहित चारों भाई एवं उनकी पत्नियों के आठ विग्रह स्थापित किए जाते हैं। इसके साथ ही प्रत्येक शाम इनके सम्मुख सांस्कृतिक संध्या सजती है।
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श्रीराम जन्मभूमि में स्थापित रामलला का दरबार भी झूलनोत्सव से गुलजार है। रजत हिंडोले पर विराजमान भगवान श्रीरामलला प्रतिदिन झूला विहार कर रहे हैं। इस अवसर पर गीत-संगीत की महफिल भी सज रही है। श्रीरामलला के मुख्य अर्चक आचार्य सत्येंद्र दास बताते हैं कि रामलला के दरबार में झूलनोत्सव की विशिष्ट परंपरा है। यहां हिंडोले पर श्रीराम के साथ-साथ भरत, लक्ष्मण व शत्रुघ्न को भी झूले पर विराजमान कर झुलाया जाता है। रविवार को 1.50 लाख भक्तों ने रामलला के दरबार में हाजिरी लगाई।
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रामकोट के पौराणिक मंदिरों में शामिल रंगमहल में भी झूलनोत्सव की विशिष्ट परंपरा है। रंगमहल की यह परंपरा रामनगरी के सिद्ध संतों में शामिल रहे स्वामी सरयू शरण के समय से ही प्रवाहमान है। यहां अन्य मंदिरों की तुलना में चार झूले पड़ते हैं। एक झूले पर राम-जानकी, अन्य पर भरत-मांडवी, लक्ष्मण-उर्मिला व शत्रुहन-श्रुतिकीर्ति के होते हैं। रंगमहल के महंत रामशरण दास बताते हैं कि भगवान श्रीराम सहित चारों भाई व उनकी पत्नियां सत्ता के पूरक और करीब होने के कारण प्रभु राम एवं सीता से अभिन्न हैं। इसी अभिन्नता की पुष्टि के लिए सावन में चार झूले स्थापित कर सभी को झुलाया जाता है। भव्य सांस्कृतिक संध्या उत्सव की भव्यता में इजाफा करती है। राजगोपाल मंदिर में भी झूले पर भगवान श्री राम समेत चारों भाइयों व माता सीता को विराजित कर झूलनोत्सव मनाने की परंपरा है।
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झूले पर विराजित किए जाते हैं आठ विग्रह
दशरथमहल के बारे में मान्यता है कि त्रेतायुग में यहां राजा दशरथ का महल था। भगवान श्रीरामलला का बचपन इसी महल में बीता है। करीब 300 वर्ष पूर्व त्रेतायुगीन इस विरासत को पहुंचे हुए संत रामप्रसादाचार्य ने पुर्नस्थापित किया था। किवंदती है कि बाबा रामप्रसादाचार्य को माता किशोरी ने स्वयं अपने हाथों से तिलक किया था, जो आजीवन अमिट रहा। बिंदु संप्रदाय का शुभारंभ भी यहीं से माना जाता है। दशरथ महल की विरासत के अनुरूप यहां भगवान की सेवा पूरे राजसी वैभव के साथ की जाती है। सावन माह में दशरथमहल की शोभा अत्यंत मनमोहक होती है। मंदिर के महंत बिंदुगाद्याचार्य स्वामी देवेंद्रप्रसादाचार्य बताते हैं कि स्वर्ण रजत जड़ित हिंडोले पर भगवान राम सहित चारों भाई एवं उनकी पत्नियों के आठ विग्रह स्थापित किए जाते हैं। इसके साथ ही प्रत्येक शाम इनके सम्मुख सांस्कृतिक संध्या सजती है।