{"_id":"65b55550eed4e2cf520cbad4","slug":"patent-published-for-biodegradable-diaper-pump-auraiya-news-c-211-1-aur1002-107979-2024-01-28","type":"story","status":"publish","title_hn":"Auraiya News: बायोडिग्रेडेबल डायपर पिमपेम का पेटेंट पब्लिश","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Auraiya News: बायोडिग्रेडेबल डायपर पिमपेम का पेटेंट पब्लिश
Sun, 28 Jan 2024 12:41 AM IST
कानपुर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, औरैया
संवाद न्यूज एजेंसी, औरैया
Updated Sun, 28 Jan 2024 12:41 AM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
औरैया। शहर के गोविंद नगर मोहल्ला निवासी वेद प्रकाश व शिक्षका अर्चना गुप्ता की पुत्री गरिमा पोरवाल मथुरा में जीएलए यूनीवर्सिटी में अध्ययनरत है। वर्तमान में गरिमा एमएससी बाॅयोटेक्नोलॉजी की द्वितीय वर्ष की छात्रा है। गरिमा ने बायोडिग्रेडेबल डायपर को लेकर अपने विचार साझा किए। गरिमा के इस विचार का पेटेंट पब्लिश हो गया है।
गोविंद नगर मोहल्ला निवासी वेद प्रकाश परचून की दुकान किए हैं। तो वहीं मां अर्चना एक प्राइवेट स्कूल में शिक्षक हैं। गरिमा कहती हैं कि अक्सर देखा जाता है कि डायपर पहनने के बाद अधिकतर रैशेज की समस्या से बच्चे दर्द की समस्या से जूझते हैं। इसके अलावा प्रयोग में लाए गए डायपर को यूं ही फेंक दिया जाता है। जो वर्षों तक नष्ट नहीं हो पाता है। इसको लेकर एक नया आइडिया तैयार किया। जिसको न्यूजेन आइईडीसी के कोआर्डिनेटर डॉ. मनोज कुमार के दिशा निर्देशन में पेटेंट पब्लिश हुआ।
गरिमा दावा करते हुए कहती हैं कि वर्तमान में जो डायपर बाजार में बिक रहे हैं उनमें सोडियम पॉलीएक्रालाइट केमिकल का प्रयोग किया जाता है। जो बच्चों की त्वचा के लिए नुकसानदेह साबित हो रहा है। इसके अलावा वर्षों तक यह डायपर नष्ट भी नहीं होते हैं। बताया कि उसके द्वारा शेयर किए गए आइडिया से बच्चों की परवरिश और प्रकृति के संरक्षण पर काफी विचार विमर्श किया गया।
विज्ञापन
गरिमा ने अपने तैयार किए गए आइडिया पर बताया कि बायोडिग्रेडेबल अवयव से मिलकर तैयार होने वाले डायपर में काइटोसन एवं सोडियम एल्गिनेट जैसे रसायनों का प्रयोग किया जाएगा। जो बच्चों को रैशेज की समस्या और प्रकृति के संरक्षण में अहम साबित होंगे। बताया कि बायोडिग्रेडेबल डायपर जल्द ही नष्ट हो जाएगा। बताया कि इस आइडिया को जमीं पर लाने के लिए भी कार्य किए जाएंगे। साथ ही पेटेंट ग्रांट के लिए अपने प्रयास रहेंगे।
विज्ञापन
गोविंद नगर मोहल्ला निवासी वेद प्रकाश परचून की दुकान किए हैं। तो वहीं मां अर्चना एक प्राइवेट स्कूल में शिक्षक हैं। गरिमा कहती हैं कि अक्सर देखा जाता है कि डायपर पहनने के बाद अधिकतर रैशेज की समस्या से बच्चे दर्द की समस्या से जूझते हैं। इसके अलावा प्रयोग में लाए गए डायपर को यूं ही फेंक दिया जाता है। जो वर्षों तक नष्ट नहीं हो पाता है। इसको लेकर एक नया आइडिया तैयार किया। जिसको न्यूजेन आइईडीसी के कोआर्डिनेटर डॉ. मनोज कुमार के दिशा निर्देशन में पेटेंट पब्लिश हुआ।
विज्ञापन
गरिमा दावा करते हुए कहती हैं कि वर्तमान में जो डायपर बाजार में बिक रहे हैं उनमें सोडियम पॉलीएक्रालाइट केमिकल का प्रयोग किया जाता है। जो बच्चों की त्वचा के लिए नुकसानदेह साबित हो रहा है। इसके अलावा वर्षों तक यह डायपर नष्ट भी नहीं होते हैं। बताया कि उसके द्वारा शेयर किए गए आइडिया से बच्चों की परवरिश और प्रकृति के संरक्षण पर काफी विचार विमर्श किया गया।
विज्ञापन
गरिमा ने अपने तैयार किए गए आइडिया पर बताया कि बायोडिग्रेडेबल अवयव से मिलकर तैयार होने वाले डायपर में काइटोसन एवं सोडियम एल्गिनेट जैसे रसायनों का प्रयोग किया जाएगा। जो बच्चों को रैशेज की समस्या और प्रकृति के संरक्षण में अहम साबित होंगे। बताया कि बायोडिग्रेडेबल डायपर जल्द ही नष्ट हो जाएगा। बताया कि इस आइडिया को जमीं पर लाने के लिए भी कार्य किए जाएंगे। साथ ही पेटेंट ग्रांट के लिए अपने प्रयास रहेंगे।